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विशेष
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और लोकप्रियकरण
वैज्ञानिक
'विज्ञानप्रसार'
मनीष मोहन गोरे
वैज्ञानिक विज्ञान प्रसार
28
फरवरी को
राष्ट्रीय
विज्ञान
दिवस के
रूप में
मनाया जाता
रहा है। यह
क्षण हमारे
वैज्ञानिक
उत्सर्ग के
प्रति हमें
सजग और
गौरवान्वित
करता है।
इस अवसर पर
हम विशेष
रूप से
युवा
वैज्ञानिक
लेखक मनीष
मोहन गोरे
का यह आलेख
प्रस्तुत
कर रहे
हैं।
भारत
में
वैज्ञानिक
दृष्टिकोण
की एक
समृद्ध
परंपरा रही
है। भारतीय
वेद, पुराण
और अन्य
ऋचाएं इस
बात को
प्रमाणित
करती हैं।
चरक,
सृश्रुत,
बाराहमिहिर,
आर्यभट्ट
से लेकर सी.वी.रमन
तक भारतीय
विज्ञान की
एक सतत
धारा है।
महान
भारतीय संत
कबीर के
विचारों
में भी
हमें
वैज्ञानिक
दृष्टिकोण
के कण गाहे-बगाहे
मिलते हैं।
आधुनिक
भारत में
वैज्ञानिक
दृष्टिकोण
के विकास
और विज्ञान
लोकप्रियकरण
को एक
आंदोलन का
रूप देने
में पंडित
नेहरू का
यशस्वी
योगदान रहा
है। नेहरू
के
वैज्ञानिक
भारत के
सपने को
साकार करने
में होमी
जहाँगीर
भाभा, के.एस.कृष्णन
और राजा
रमन्ना
जैसे
वैज्ञानिकों
के योगदान
को विस्मृत
नहीं किया
जा सकता
है।
जहां
तर्क की
स्पष्ट
धारा
बुराइयों
के दलदल
में
दिग्भ्रमित
न हो,
जहां
सतत् प्रखर
हो रहे
विचार और
कार्य की
ओर हमारा
मन उन्मुख
हो,
परमपिता
से मेरी
प्रार्थना
है कि वे
ऐसी आजादी
से
परिपूर्ण
स्वर्ग में
मेरे देश
को उदित
करें।
गुरुदेव
रवीन्द नाथ
टैगोर ने
अपनी कृति
गीताजंलि
की 'मेरा
स्वर्ग'
शीर्षक
कविता में
उपरोक्त
विचार और
तद्नुसार
कार्य-कलाप
की चर्चा
की है।
भारतीय
साहित्य
में
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
का यह एक
लघु मगर
नायाब
प्रसंग है।
महाभारत और
उपनिषद
जैसे हमारे
भारतीय
वाङ्गमय
चर्चा,‚परिचर्चाओं,
बहसों,
विवादों,
प्रश्नों
और संवादों
से भरे हुए
हैं। दरअसल
चर्चा बहस
और
विश्लेषण
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
के अभिन्न
अंग होते
हैं।
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
तर्क
आधारित
दैनिक जीवन
के निर्णय
लेने की
प्रवफत्ति
का मूलाधार
होता है।
इसमें
पक्षपात और
पूर्वाग्रहों
का कोई
स्थान नहीं
होता है।
विज्ञान
सत्य का
उद्घाटन
करता है और
प्रकृति
तथा उसमें
दिन-रात
होने वाली
घटनाएं
सत्य का ही
स्वरूप
होती हैं।
इसलिए हम
इस
निष्कर्ष
तक पहुंच
सकते हैं
कि विज्ञान
प्रकृति
में छिपे
रहस्यों पर
से पर्दा
हटाता है।
सही मायने
में यह
इतना आसान
काम नहीं
है।
प्राकृतिक
रहस्य को
समझना और
उसके बारे
में एक
व्यक्ति के
मन में उठी
जिज्ञासा
को
पूर्ववर्ती
अवधारणाओं
से जांचना‚परखना
भी आवश्यक
है। दूसरे
शब्दों में
कहेंगे कि
किसी भी
तथ्य या
नियम को तब
तक सच नहीं
मानना
चाहिए जब
तक कि उसकी
पूरी जांच‚परख
करके उसे
सत्यापित न
कर लिया
जाए। यह
विज्ञान
विधि का
आरंभिक
पड़ाव है।
प्रेक्षण
द्वारा
आंकड़े
एकत्र करना,
प्रयोग
करना,
पूर्ववर्ती
अवधारणाओं
से
तुलनात्मक
अध्ययन
करना और
अंत में
किसी
विज्ञानसम्मत
(तर्कसम्मत)
निष्कर्ष
पर पहुंचना
विज्ञान
विधि के
अन्य
प्रमुख चरण
(पड़ाव)
होते हैं।
विज्ञान
विधि
वास्तव में
जांच‚पड़ताल
या पूछताछ
की विधि
होती है।
इस विधि
द्वारा
प्रकृति
में निहित
घटना के
होने का
कारण जानने
की कोशिश
की जाती है
या पहले से
ज्ञात किसी
प्राकृतिक/वैज्ञानिक
तथ्य में
सुधार‚संशोधन
या
परिवर्धन
किया जाता
है। दुनिया
में
सर्वप्रथम
ग्रीक
दार्शनिक
अरस्तू (384-322
ईसा पूर्व)
ने विज्ञान
विधि को
अपनाते हुए
जीव‚जंतुओं
का
वर्गीकरण
उनके
प्रेक्षण‚विश्लेषण
और
तुलनात्मक
अध्ययन के
आधार पर
किया था।
अरस्तू की
वैज्ञानिक
कृति
हिस्टोरिया
एनिमेलिया
और उसकी
रचना में
निहित
विज्ञान
विधि
आधुनिक
विज्ञान
जगत के लिए
एक आदर्श
और
प्रेरणास्रोत
है।
अरस्तू
के बाद
इब्न‚अल‚हेथम
(965-1039),
गैलीलियो
गैलीली (1564-1642),
जोहानेस
केपलर (1571-1630) और
निकोलस
कोपरनिकस
(1473-1543) जैसे
विश्व
प्रसिद्ध
वैज्ञानिकों
ने विज्ञान
और विज्ञान
विधि के
आदर्श
स्वरूप को
दुनिया के
सामने रखा।
हजारों
साल पहले
जब विज्ञान
और विज्ञान
विधि की
जानकारी
किसी को
नहीं रही
होगी, उस
समय लोग
समस्त
प्राकृतिक
घटनाओं को
ईश्वर से
जोड़कर
देखते थे
और उसी के
द्वारा
नियंत्रित
अलौकिक
घटना मानते
थे।
प्रकृति
में होने
वाली
घटनाओं को
लेकर कुछ
लोगों के
मन में
सवाल उठने
लगे। ये उन
सवालों के
समाधान
जानना
चाहते थे।
कुछ ने
वर्षों के
अध्ययन‚अवलोकन
के बाद
अपने
तार्किक
निष्कर्ष
भी दिए
लेकिन
धर्मावलंबी
सत्ता
विज्ञान की
बात को
सिरे से
खारिज करती
रही,
क्योंकि वह
विश्व का
नियंत्रक
ईश्वर को
मानती थी।
विज्ञान और
धर्म के
संघर्ष में
ब्रूनो
नामक
वैज्ञानिक
को घोर
यातनाएं
सहनी
पड़ीं। मगर
धीरे-धीरे
विज्ञान
रूपी सत्य
के प्रकाश
ने उन
अंधेरे
दिमागों
में भी
उजियारा
फैला दिया
जो ईश्वर
नियंत्रित
दुनिया के
अनुयायी
थे।
विकासवाद
के जनक
चार्ल्स
डार्विन जो
पहले स्वयं
जीवों के
विकास के
लिए
ईश्वरीय
तत्व को
जिम्मेदार
मानते थे,
उन्होंने
जब बीगल पर 5
वर्षीय
प्राकृतिक
भ्रमण किया
और जीवों
की भिन्न-भिन्न
जातियां
देखीं तब
जाकर उनके
बीच
रिश्तों के
प्राकृतिक
सूत्र को
वह समझ
पाए। उसके
बाद
उन्होंने
दुनिया को
प्राकृतिक
चयन नामक
क्रांतिकारी
सिद्धांत
दिया।
विज्ञान
अनेक
त्रुटियों
से होते
हुए और
उनको दूर
करते हुए
किसी
वैज्ञानिक
संकल्पना
की स्थापना
तक पहुंचता
है।
त्रुटियों
का सामना
करते हुए
सकारात्मक
सोच के साथ
अंतिम
लक्ष्य (वैज्ञानिक
निष्पत्ति)
तक पहुंचना
ही
वैज्ञानिक
वफत्ति है।
विद्युत
बल्ब के
आविष्कारक
एडीसन ने 1199
असफल
प्रयोगों
के बाद
बल्व का
सफल
आविष्कार
किया था।
एक पत्रकार
ने उनसे इस
बारे में
पूछा तो
एडीसन ने
जवाब दिया
कि दरअसल
उन्हें 1199
प्रयोगों
में असफलता
नहीं मिली
है, बल्कि
वे 1199 ऐसे
प्रयोगों
के बारे
में जान गए
हैं जिनसे
बल्व का
आविष्कार
नहीं किया
जा सकता।
है न
सकारात्मक
सोच।
वर्षों
या कभी-कभी
सदियों से
चली आ रही
त्रुटिपूर्ण
अवधारणाओं
में किसी
वैज्ञानिक
के प्रयत्न
द्वारा
अनायास
अथवा सायास
सुधार
सम्भव हो
पाता है।
अरस्तू ने
बताया था
कि
गुरुत्वाकर्षण
बल के
प्रभाव में
नीचे की ओर
गिरती
वस्तु का
वेग उसके
भार के
समानुपाती
होता है।
अरस्तू का
यह
सिद्धांत
त्रुटिपूर्ण
था जिसे
सत्रहवीं
शताब्दी
में
गैलीलियो
ने सुधार
करके यह
सिद्ध किया
कि गुरुत्व
बल के
प्रभाव से
नीचे की ओर
गिर रही
वस्तु पर
उसके भार
का कोई
प्रभाव
नहीं पड़ता,
केवल वायु
प्रतिरोध
के कारण
उसकी गति
में एक
मामूली
अंतर आ
सकता है।
जिज्ञासा
विज्ञान
विधि का
अभिन्न घटक
होता है।
इस
जिज्ञासा
ने ही
दुनिया में
इतने सारे
महान और
उपयोगी
आविष्कार
कराए हैं।
सहज
जिज्ञासा
का एक अदना
सा उदाहरण
मैं यहाँ
देना चाहता
हूं। एक
नन्हा बालक
चिड़ियों
को देखकर
बहुत खुश
होता था।
उसके मन
में
जिज्ञासा
उठी कि ये
पंछी उड़ते
कैसे हैं?
उसने अपनी
कक्षा में
अध्यापक से
भी मन की इस
जिज्ञासा
का हल
जानना
चाहा। बालक
को सपाट
जवाब मिला
क्योंकि
उनके पंख
होते हैं।
बालक
संतुष्ट
नहीं हुआ।
उसने
दुबारा
पूछा, ''मगर
हवाई जहाज
के तो कोई
पंख नहीं
होते, फिर
भी वह आकाश
में उड़ता
है, वह कैसे?
अध्यापक को
वह बालक
सिरफिरा
लगा इसलिए
उन्होंने
उसे स्कूल
से निकाल
दिया। वह
बालक घर पर
अपनी मां
के
मार्गदर्शन
में पढ़ने
लगा। उस
बालक की
जिज्ञासा
अभी शांत
नहीं हुई
थी। उसने
एक दिन
देखा कि
चिड़िया
जमीन पर
आकर कीड़े
खाती है और
फुर्रर्र...
उड़ जाती
है। बालक
के
मस्तिष्क
में विचार
कौंधा कि
चिड़िया
शायद इसलिए
उड़ पाती
है क्योंकि
वह कीड़े
खाती है।
उसने कुछ
कीड़े
पकड़कर
उसका काढ़ा
बनाया और
अपने घर की
नौकरानी की
छोटी लड़की
को खाने के
लिए दिया
और फिर
उसके उड़ने
का इंतजार
करने लगा।
बेचारी
नौकरानी की
लड़की हवा
में उड़ने
की जगह
बीमार पड़
गई। इस
करतूत के
लिए बालक
को मां की
डांट मिली।
अति
जिज्ञासु
उस बालक का
नाम शायद
आप जानना
चाहेंगे।
उसका नाम
थामस अल्वा
एडीसन था,
जो बड़ा
होकर
दुनिया का
एक महान
वैज्ञानिक
बना।
जिज्ञासा
कमोबेश हर
व्यक्ति
में होती
है। इसका
अर्थ यह है
कि
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
का मूलाधार
सबमें
निहित है
केवल उसे
अभ्यास की
मदद से
जीवन के
साथ जोड़ना
अपेक्षित
है। जिस
मनुष्य ने
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
को आत्मसात
कर लिया है
उसका
मस्तिष्क
अति जिज्ञासु
और
ग्रहणशील
हो जाता
है। इसके
बाद वह
किसी भी
बात को आंख
मूंद कर
स्वीकार
नहीं करता
बल्कि वह
सबसे पहले
खुद उस
मुद्दे पर
चिन्तन‚मनन
करता है और
तद्नुसार
अपने विवेक
से निर्णय
लेता है।
जीवन के हर
मोड़ पर, हर
निर्णय में
तार्किक
ढंग से
विचार करना
और उस पर
चलना ही
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
होता है।
यदि
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
किसी
व्यक्ति
समुदाय या
समाज में आ
गया तो
वहां मौजूद
अंधविश्वास
स्वत: धीरे-धीरे
निर्मूल
होने
लगेंगे।
विज्ञान
विधि और
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
का यदि मनन
करें तो हम
पाएंगे कि
विज्ञान का
सरोकार
विज्ञान
विधि से तो
हो सकता है
मगर
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
से नहीं।
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
शब्द का
प्रयोग
पंडित
नेहरू ने
विज्ञान
एवं
प्रौद्योगिकी
के उपयोग
द्वारा
भारत के
संपूर्ण
विकास के
संदर्भ में
किया था।
भारत में
आज यह शब्द
अति
प्रचलित हो
चला है।
नेहरू
की विज्ञान
में रुचि
उनके
ट्यूटर एफ.टी.
ब्रुक्स ने
जगाई थी।
ब्रुक्स ने
बालक नेहरू
के लिए एक
छोटी सी
प्रयोगशाला
की रचना की
थी जहां
नेहरू अपनी
जिज्ञासाओं
का शमन
करते थे।
स्कूली
दिनों में
नेहरू ने
अध्ययन के
लिए
भूविज्ञान,
रसायन और
वनस्पति
विज्ञान को
चुना था।
वह स्वयं
वैज्ञानिक
तो नहीं
बने मगर
विज्ञान के
अध्ययन ने
उनके भीतर
विज्ञान से
अटूट लगाव
और
वैज्ञानिक
सोच विकसित
किया और इस
वैज्ञानिक
सोच के
जरिए
उन्होंने
भारत की
समस्याओं
का समाधान
ढूंढने का
प्रयत्न
किया।
नेहरू ने
यह अनुभव
किया था कि
विज्ञान के
द्वारा ही
भारत से
अंधविश्वास
और
रुढ़ियों
को दूर
किया जा
सकता है और
विकास की
ऊंचाइयों
तक पहुंचा
जा सकता
है।

लंबे
समय के
कारावास ने
नेहरू को
पढ़ने का
सुनहरा
अवसर दिया
और इस
दौरान
उन्होंने
समाजवाद,
विश्व
राजनीति
सहित एल्डस
हक्सले,
बटैंड रसेल,
नीधम,
हागबन और
हाल्डेन
जैसे
प्रगतिशील
ब्रिटिश
वैज्ञानिकों
को भी
पढ़ा। इस
अध्ययन ने
नेहरू को
विज्ञान की
भावना के
काफी करीब
पहुंचाया।
'स्वतंत्र
भारत के
लिए
विज्ञान'
और 'वैज्ञानिक
दफष्टिकोण'
जैसे विचार‚सूत्र
नेहरू के
मन में
कारावास
जीवन के
दौरान ही
उपजे थे।
आजादी के
बाद जब वे
देश के
प्रधानमंत्री
बने तो
उनके सभी
कार्यें
में इसी
विचार‚दृष्टि
का पुट
निहित था।
वैज्ञानिक
और
औद्योगिक
अनुसंधान
परिषद (सी.एस.आई.आर.)
के अंतर्गत
विज्ञान के
विविध
आयामों में
मौलिक
अनुसंधान
हेतु भारत
में
उन्होंने
प्रयोगशालाओं
की शंफखला
स्थापित
करके महान
काम किया।
विज्ञान
में उनकी
सहज रुचि
इस बात से
जाहिर होती
है कि
उन्होंने
भारतीय
विज्ञान के
कुंभ 'भारतीय
विज्ञान
कांगेस' के
प्रत्येक
सम्मेलन
में
भागीदारी
की।
उद्योग
और कृषि
में
अनुसंधान
के जरिए
नेहरू
वास्तव में
देश की
आर्थिक,
परमाणविक,
वैज्ञानिक
और
आध्यात्मिक
उन्नति का
सपना देख
रहे थे।
इसके अलावा
वह भारतीय
समाज की
जड़ों में
व्याप्त
सदियों
पुरानी
धर्मांधता
का उन्मूलन
वाया
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
करना चाहते
थे। यह
नेहरू की
ही देन थी
कि भारतीय
संविधान के
मूल
कर्त्तव्य
के भाग 4 क
में
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
को स्थान
दिया गया।
इस स्थान
पर स्पष्ट
उल्लेख है
कि
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण,
मानववाद और
ज्ञानार्जन
तथा सुधार
की भावना
का विकास
करें।
समाज
में
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
का विकास
करने अथवा
विज्ञान की
गूढ़
जानकारी को
सरल और
सुबोध भाषा‚शैली
में आम
आदमी तक
पहुंचाने
की विधि को
विज्ञान
लोकप्रियकरण,
विज्ञान
संचार,
विज्ञान की
जन समझ,
जैसे कई
नामों से
जाना जाता
है। इन
सबका अर्थ
और
उद्देश्य
न्यूनाधिक
एक समान ही
है।
विज्ञान
लोकप्रियकरण
की चर्चा
के दौरान
अक्सर
वैज्ञानिक
साक्षरता,
वैज्ञानिक
मूल्य और
वैज्ञानिक
संस्कृति
की बात भी
होती है।
विज्ञान
की
संकल्पनाएं,
सिद्धांत
आदि गूढ़
होने के
कारण ये
साधारण
पढ़े‚लिखे
व्यक्ति के
अधिक पल्ले
नहें
पड़ता।
वहीं
संबंधित
क्षेत्र का
वैज्ञानिक
इन्हें
सुगमता से
आत्मसात कर
लेता है।
विज्ञान
संचार,
विज्ञान
लोकप्रियकरण
या
लोकप्रिय
विज्ञान
लेखन में
विज्ञान की
इसी गूढ़ता
या जटिलता
को निकालकर
उसके स्थान
पर रोचकता
और
बोधगम्यता
का समावेश
कर दिया
जाता है।
भाषा और
शैली
सुरुचिपूर्ण
होने से
विज्ञान के
जटिल
सिद्धांत
को एक आम
पाठक आसानी
से समझ
लेता है।
'नेचर'
में
प्रकाशित
लेख
लोकप्रिय
विज्ञान
लेखन की
श्रेणी में
नहीं आता
बल्कि 'विज्ञान
प्रगति '
जैसी
विज्ञान
संचार
केन्दित
पत्रिका
में
प्रकाशित
लेख इस
श्रेणी में
स्थान रखता
है।
विज्ञान
संचार या
विज्ञान
लोकप्रियकरण
के
उद्देश्य
की पूर्ति
के लिए
अनेक
विधाएं
प्रचलन में
हैं। इनमें
विज्ञान
लेख,
विज्ञान
समाचार,
रिपोर्ट,
फीचर,
विज्ञान
कथा, नाटक,
कविता,
साक्षात्कार
सांइटून,
नुक्कड़‚नाटक,
कठपुतली
प्रदर्शन,
लोकगीत,
लोकनफत्य,
संगोष्ठी,
विज्ञान
प्रदर्शनी,
विज्ञान
मेले,
विज्ञान
क्लब,
कार्यशालाएं,
वैज्ञानिक
सम्मेलन,
विज्ञान
जत्था,
विज्ञान
कांग्रेस
आदि अपना
महत्वपूर्ण
स्थान रखते
हैं।
विज्ञान
कथा और
कविता
बच्चों और
युवाओं के
लिए अधिक
ज्ञानवर्धक
तथा उपयोगी
विज्ञान
संचार
विधाएं
सिद्ध हुई
हैं।
भारत
में अखिल
भारतीय जन
विज्ञान
नेटवर्क
द्वअभियान
के रूप में
विज्ञान
जत्थे चलाए
गए हैं
जिनसे
विज्ञान
लोकप्रियकरण
को बहुत बल
मिला है।
इन जत्थों
का
उद्देश्य
अशिक्षा और
अंधविश्वास
उन्मूलन के
साथ भारतीय
समाज में
वैज्ञानिक
जागरूकता
का प्रसार
करना भी
रहा है।
बच्चों
में
वैज्ञानिक
अभिरुचि और
नवाचारी
प्रवफत्ति
का विकास
करने के
उद्देश्य
से एन.सी.एस.टी.सी.
नेटवर्क
प्रत्येक
वर्ष देश
के किसी एक
स्थान पर
राष्ट्रीय
बाल
विज्ञान
कांग्रेस
का
महाआयोजन
करता है।
इसमें
बच्चे
आशातीत
वैज्ञानिक
प्रयोग
करके
दिखाते
हैं।
विज्ञान
संचार का
एक अभिन्न
मकसद आम जन
में
विज्ञान की
न्यूनतम
समझ का
विकास करना
भी है।
न्यूनतम
विज्ञान को
इस उदाहरण
से समझने
की कोशिश
करते हैं।
कागज का
प्रकृति
में
पुनर्चक्रण
हो जाता है
परन्तु
प्लास्टिक
का नहीं
अर्थात यदि
प्लास्टिक
को मिट्टी
में फेंक
दें तो
इसके घटक
तत्व
मिट्टी में
समाहित
होकर
प्रकृति
में
पुनर्चक्रित
नहीं होते
और वर्षें
तक मिट्टी
में पड़े
रहते हैं
तथा
प्राकृतिक
संतुलन को
बिगाड़ते
हैं।
उपरोक्त
तथ्य जानने
के बाद
जागरुक
व्यक्ति को
प्लास्टिक
का न्यूनतम
उपयोग करने
की आदत
डालनी
चाहिए।
दैनिक जीवन
में
सामान्य
विज्ञान की
समझ को
न्यूनतम
विज्ञान
कहेंगे
जिसका आम
जन में
विकास
विज्ञान
संचार का
अभीष्ट
होता है।

विश्व
में
वैज्ञानिक
अन्वेषण के
साथ-साथ
विज्ञान
संचार की
भी परम्परा
पुराने समय
से रही है।
विज्ञान को
आम जन से
जोड़ने में
असंख्य
वैज्ञानिकों
ने
महत्वपूर्ण
कार्य किए
हैं। इसमें
चार्ल्स
डार्विन,
माइकल
फैराडे से
लेकर जे.बी.एस.
हाल्डेन और
जॉर्ज गैमो
के नाम
प्रमुखता
से लिए जा
सकते हैं।
यदि
भारतीय
संदर्भ में
विज्ञान
संचार की
बात करें
तो इस
क्षेत्र
में
आरम्भिक
प्रयास
करने वाले
व्यक्ति
महेन्द लाल
सरकार (1833‚1904)
रहे हैं।
सरकार ने 1876
में इंडियन
एसोसिएशन
फॉर द
कल्टिवेशन
ऑफ साइंस
की कलकत्ता
(अब
कोलकाता)
में
स्थापना की
थी। इस
संस्था का
उद्देश्य
विज्ञान की
विभिन्न
विधाओं में
मौलिक शोध
के अलावा
भारत के
प्रख्यात
शिक्षाशास्त्रियों
और
वैज्ञानिकों
के
लोकप्रिय
विज्ञान
व्याख्यानों
का आयोजन
करना भी
था।
पंजाब
में
विज्ञान के
लोकप्रियकरण
में
प्रोफेसर
रुचि राम
साहनी (1883‚1948) का
योगदान
अतुलनीय
है। प्रो.
साहनी ने
विज्ञान के
प्रचार‚प्रसार
की
गतिविधियों
को
लोकप्रिय
विज्ञान
व्याख्यान
के रूप में
आरम्भ किया
था।
उन्होंने
अंग्रेजी
और पंजाबी
में करीब 500
व्याख्यान
दिए।
विज्ञान
लोकप्रियकरण
के अपने
प्रयासों
में प्रो.
साहनी को
अनेक
परेशानियें
का सामना
करना पड़ा
था।
राष्ट्रीय
विज्ञान
एवं
प्रौद्योगिकी
संचार
परिषद और
विज्ञान
प्रसार ने 1994
में प्रो.
साहनी की
आत्मकथा 'विज्ञान
यात्रा:
पंजाब के
अग्रणी
विज्ञान
संचारक
रुचिराम
साहनी के
संस्मरण`
को सामने
लाकर
विज्ञान
संचार जगत
को एक
विस्मफत
विज्ञान
संचारक से
परिचित
कराया है।
भारत
और एशिया
में
विज्ञान के
पहले नोबेल
का परचम
लहराकर
चंदशेखर
वेंकट रमन
(1880-1970) ने
पश्चिमी
जगत को यह
एहसास करा
दिया था कि
भारत
अध्यात्म,
दर्शन के
साथ ही साथ
विज्ञान का
मस्तिष्क
भी रखता
है।
विज्ञान
में रमन की
अगाध रुचि
थी। प्रकाश
विज्ञान,
चुंबकत्व,
क्रिस्टल
भौतिकी,
ध्वनि
विज्ञान पर
उनके 400 से
अधिक शोध‚पत्र
प्रकाशित
हुए थे। एक
वैज्ञानिक
के साथ-साथ
रमन महान
विज्ञान
संचारक भी
थे। सजीव
प्रदर्शनों
से युक्त
अपने
लोकप्रिय
विज्ञान
व्याख्यानों
के माध्यम
से वह
विज्ञान
लोकप्रियकरण
करते थे।
रमन के ये
विज्ञान
व्याख्यान
श्रोताओं
की विज्ञान
में रुचि
जगाने के
लिए
पर्याप्त
होते थे।
विज्ञान
प्रसार ने
रमन का एक
महत्वपूर्ण
विज्ञान
व्याख्यान
(व्हाई द
स्काई इज
ब्लू)
अंग्रेजी
और हिन्दी
दोनों ही
भाषाओं में
प्रकाशित
किया है।
इसकी मांग
इस कदर बनी
रहती है कि
अब तक इसके
अनेक
संस्करण
विज्ञान
प्रसार
द्वारा लाए
जा चुके
हैं।
विज्ञान
व्याख्यान
के
अतिरिक्त
रमन ने
विज्ञान के
विभिन्न
पहलुओं पर
लोकप्रिय
शैली में
अनेक
रेडियो
वार्ताएं
भी
प्रसारित
की थीं।
रमन
ने 28 फरवरी 1928
को वह
महत्वपूर्ण
खोज की थी
जिसे 'रमन
प्रभाव '
कहते हैं।
इसी खोज के
लिए उन्हें
वर्ष 1930 में
भौतिकी का
नोबेल
पुरस्कार
दिया गया।
चूंकि 28
फरवरी को
रमन की
क्रांतिकारी
खोज ने
भारत को
नोबेल के
सम्मान से
विभूषित
किया था
इसलिए इस
तिथि को
प्रत्येक
वर्ष भारत
में
राष्ट्रीय
विज्ञान
दिवस के
रूप में
मनाया जाता
है।
रमन
युवा
वैज्ञानिकों
को यह सलाह
दिया करते
थे कि अपने
आंख‚कान
खोलकर
प्रकृति का
अवलोकन करो
औरइसके बाद
स्वयं को
प्रयोगशाला
में बंद कर
लो।
खगोल
भौतिकी के
अग्रदूत
मेघनाद
साहा (1893-1956) एक
प्रखर
वैज्ञानिक
के साथ-साथ
उत्कृष्ट
विज्ञान
संचारक भी
थे। उन्हें
यह बराबर
चिंता रहती
थी कि
विद्यार्थियों
और
शिक्षकों
को
ज्ञानवान
होना चाहिए
ताकि वे
देश और
समाज के
विकास में
विज्ञान की
भूमिका को
आत्मसात कर
सकें।
शिक्षण और
शोध से
जुड़ी अपनी
व्यस्त
दिनचर्या
के बावजूद
वह पत्र-पत्रिकाओं
में
लोकप्रिय
विज्ञान
लेख लिखने
का समय
निकाल लेते
थे। साहा
द्वारा
लिखित पहला
लोकप्रिय
विज्ञान
लेख 'टाईम
एंड स्पेश‚द
न्यू
साइंटिफिक
थ्योरी` 13
नवम्बर 1919 को
कलकता के
स्टेट्समैन
पत्र में
प्रकाशित
हुआ था। यह
लेख 29 मई 1919 को
लगे पूर्ण
सूर्य
ग्रहण पर
केन्दित
था।
वर्ष
1934 में जब
नाभिकीय
विखंडन की
वैज्ञानिक
अवधारणा की
खोज हुई थी
तो साहा ने
विस्तारपूर्वक
लोकप्रिय
भाषा‚शैली
में आम
पाठकों तक
इस विषय को
पहुंचाने
के लिए एक
लेख‚शंफखला
लिखी थी।
दुनिया के
विभिन्न
हिस्सों
में
प्रचलित
अनेक सौर
और चंद
कैलेंडरों
के इतिहास
तथा इनके
गुण‚दोषों
के विषय
में भी
उन्होंने
असंख्य
विज्ञान
लेख लिखे
थे।
अल्बर्ट
आइंस्टाइन,
नील्स बोर,
लार्ड
अर्नेस्ट
रदरफोर्ड,
आचार्य
प्रफुल्ल
चंद राय और
एम.
विश्वेश्वरैया
जैसे अनेक
महान
वैज्ञानिकों
की प्रेरक
जीवनियां
भी
उन्होंने
लिखी थीं।

क्वांटम
सांख्यिकी
के जनक और
महान
भारतीय
वैज्ञानिक
सत्येन्द
नाथ बसु
मूल
विज्ञान के
साथ-साथ
इसके
प्रचार‚प्रसार
गतिविधियों
से गहरे
जुड़े थे।
वह इस बात
पर बल देते
थे कि आम
आदमी को
विज्ञान
उसी की
मातफभाषा
में
प्रस्तुत
किया जाना
चाहिए ताकि
उसे वह
सहजता से
आत्मसात कर
सके।
विज्ञान को
लोकप्रिय
करने के
लिए बसु ने
इसलिए अपनी
मातफभाषा
बंगला का
सहारा
लिया।
विज्ञान
लोकप्रियकरण
की
गतिविधियों
में संलग्न
पंजीकृत
संस्था
साइंस
एसोसिएशन
ऑफ बंगाल
का गठन बसु
के ही अथक
प्रयासों
का प्रतिफल
था। इस
संस्था ने 'ज्ञान‚विज्ञान`
शीर्षक से
एक पत्रिका
का प्रकाशन
भी शुरू
किया था।
मातफभाषा
में
विज्ञान को
लोकप्रिय
बनाने के
उद्देश्य
से बसु ने
स्नात्कोत्तर
कक्षा के
विद्यार्थियों
को
आइंस्टाइन
का
आपेक्षिकता
सिद्धांत
बंगला भाषा
में पढ़ाना
शुरू किया
था जो एक
क्रांतिकारी
प्रयास था।
भारत
में
विज्ञान
लोकप्रियकरण
और विज्ञान
लेखन के
क्षेत्र
में शंकर
बालकृष्ण
दीक्षित,
प्रो.
फूलदेव
सहाय वर्मा,
स्वामी
सत्यप्रकाश
सरस्वती,
महावीर
प्रसाद
श्रीवास्तव,
डॉ. गोरख
प्रसाद, डॉ.
आत्माराम,
जगपति
चतुर्वेदी,
डॉ. रघुवीर,
गुणाकर
मुळे, डॉ.
शिवगोपाल
मिश्र,
प्रेमचंद
श्रीवास्तव,
श्याम
सुंदर
शर्मा, डॉ.
रमेश दत्त
शर्मा,
शुकदेव
प्रसाद,
देवेन्द
मेवाड़ी,
डॉ. दिनेश
मणि, डॉ.
अरविन्द
मिश्र, डॉ.
मनोज
पटैरिया,
डॉ.
रायअवधेश
कुमार
श्रीवास्वत,
डॉ.
बफजमोहन
गुप्ता,
हरीश
अग्रवाल
श्री तुरशन
पाल पाठक,
विश्वमोहन
तिवारी, डॉ.
जगदीप
सक्सेना,
प्रदीश
शर्मा, डॉ.
दुर्गादत्त
ओझा, डॉ.
सुबोध
महंती,
दीक्षा
बिष्ट, बाल
फोंडके,
लक्ष्मण
लोंढे, स्व.
ललित किशोर
पाण्डेय,
कुलदीप
शर्मा,
मोहम्मद
खलील,
अरविन्द
गुप्ता, ए.
पी.
देशपांडे,
स्व. दिलीप
एम. साल्वी,
मधु पंत,
बिमान बसु,
हरिकृष्ण
देवसरे, डॉ.
मनमोहन
बाला, विजय
खंडूरी, आर.
डी.
रिखाड़ी,
रणकिशोर
सहाय, बिमल
श्रीवास्तव,
राधा कांत
अंथवाल,
कृष्ण
कुमार
मिश्र, डॉ.पी.के.
मुखर्जी,
प्रतापमल
देवपुरा,
सुभाष
लखेड़ा, डॉ.
चन्दमोहन
नौटियाल,
बी.के.
त्यागी,
नवनीत
कुमार
गुप्ता,
कालीशंकर,
दीपक कोहली,
विनोद
कुमार
मिश्र,
अरविन्द
दुबे, डॉ.
राजीव रंजन
उपाध्याय,
कपिल
त्रिपाठी,
निमिष कपूर,
विनीता
सिंघल आदि
के योगदान
को विस्मफत
नहीं किया
जा सकता।
श्रीमती
इंदिया
गांधी जब
भारत की
प्रधानमंत्री
बनीं तो
उन्होंने
अपने पिता
नेहरू की
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
की पंरपरा
को आगे
बढ़ाया।
श्रीमती
गांधी के
कार्यकाल
में वर्ष 1982
में
विज्ञान
एवं
प्रौद्योगिकी
विभाग,
भारत सरकार
के
अन्तर्गत
राष्ट्रीय
विज्ञान
एवं
प्रौद्योगिकी
संचार
परिषद (एन.सी.एस.टी.सी.)
का गठन
किया गया,
जिसका
उद्देश्य
विज्ञान को
लोकप्रिय
बनाकर समाज
में
वैज्ञानिक
जागफति
लाना है।
एन.सी.एस.टी.सी.
अपने
उद्देश्य
का पीछा
करते हुए
लगातार
विज्ञान को
केन्द में
रखकर
कार्यशाला,
संगोष्ठी,
नुक्कड़‚नाटक,
टी.वी.‚रेडियो
धारावाहिक
आदि जैसे
कार्यक्रमों
का आयोजन
कर रहा है।
विज्ञान
को बड़े
पैमाने पर
लोकप्रिय
बनाने के
उद्देश्य
से वर्ष 1989
में
विज्ञान
एवं
प्रौद्योगिकी
विभाग भारत
सरकार के
अन्तर्गत
एक और
स्वायत्त
संस्थान 'विज्ञान
प्रसार` की
स्थापना की
गई जो देश
की विभिन्न
एजेंसियों,
वैज्ञानिक
संस्थाओं,
विज्ञान
संग्रहालयों,
शिक्षण एवं
अकादमिक
निकायों,
व्यापारिक
संस्थाओं
आदि के साथ
जुड़कर
वैज्ञानिक
जागरूकता
के प्रसार
को अभियान
का रूप
देने में
सतत संलग्न
है।
विभिन्न
प्रभावशाली
संचार
माध्यमों
में अपनी
उपस्थिति
दर्ज कराकर
विज्ञान
प्रसार
अपने
संकल्पों
को पूरा कर
रहा है।
जनमानस
में
वैज्ञानिक
अभिरुचि का
विकास करने
के लिए
विज्ञान
प्रसार ने
असंख्य
महत्वपूर्ण
और
लोकप्रिय
विज्ञान
साहित्य का
प्रकाशन और
पुनर्मुदण
किया है।
विश्व
के महान
वैज्ञानिकों
द्वारा
रचित
प्रेरणादायी
श्रेष्ठ
साहित्य
शंफखला के
अन्तर्गत
विज्ञान
प्रसार ने
द केमिकल
हिस्ट्री
ऑफ कैंडल,
ऑन द
वेरियस
फोर्सेस्
ऑफ नेचर (माइकल
फैराडे),
सोप बबल्स
एंड द
फोर्सेस्
व्हिच
मोल्ड देम (सी.वी.ब्वायज),
माई फैंड
मि. लीकी,
एवरीथिंग
हैज ए
हिस्ट्री,
साइंस एंड
एवरीडे
लाइफ (जे.बी.एस.हाल्डेन),
द इंसेक्ट
वर्ल्ड ऑफ
जे. हेनरी
फेबर (जे.
हेनरी फेबर),
चार्ल्स
डार्विन`स
ऑटोबायोग्राफी
(चार्ल्स
डार्विन)
और परमाणु
से सितारों
तक (जॉर्ज
गैमो) नामक
कालजयी
कृतियों का
प्रकाशन
किया है।
इसके अलावा
विज्ञान
प्रसार ने
स्वास्थ्य,
ग्रहण,
प्रकृति
विज्ञान,
भारत की
वैज्ञानिक
विरासत,
स्वयं करो
शंफखला के
अन्तर्गत
अनेक
ज्ञानवर्धक,
उपयोगी और
अद्वितीय
लोकप्रिय
विज्ञान
साहित्य
तैयार किए
हैं।
दो
दशक पहले
अधिकांश
लोग
सूर्यग्रहण
के दिन घर
से बाहर
नहीं
निकलते थे।
लेकिन
विज्ञान
प्रसार ने
लोगों के
मन से
सूर्यग्रहण
से जुड़ी
मिथ्या
धारणाओं को
निकालने
में
अभूतपूर्व
सफलता
हासिल की
है। अब लोग
इस आकाशीय
घटना को
देखने के
लिए घर से
बेधड़क
बाहर
निकलते
हैं।
विज्ञान
और
प्रौद्योगिकी
की सूचनाओं
को आम जन तक
पहुंचाने
के लिए
विज्ञान
प्रसार
अपनी
स्थापना के
बाद से ही
विपरिस (विज्ञान
प्रसार
इन्फारमेशन
सिस्टम) और
क्लिपसेट
जैसे
विज्ञान
जागरुकता
कार्यक्रम
चलाता आ
रहा है।
देश के
बच्चों और
युवाओं में
वैज्ञानिक
संस्कृति
और
विचारधारा
के विकास
के निमित्त
विज्ञान
प्रसार ने
देश के
कोने-कोने
में विपनेट
(विज्ञान
प्रसार
नेटवर्क ऑफ
साइंस क्लब)
क्लबों की
स्थापना की
है। इन
क्लबों से
जुड़े
नन्हें और
युवा
विज्ञानी
अपने
क्षेत्र
विशेष से
जुड़ी
नवाचारी
वैज्ञानिक
गतिविधियों
की शोधपरक
रिपोर्ट
विज्ञान
प्रसार को
भेजते हैं
जिनका
आंकड़ा रखा
जाता है और
उन्हें समय‚समय
पर
मार्गदर्शन
दिया जाता
है। अब तक
देश में
ऐसे 12 हजार
विपनेट
क्लबों का
गठन किया
जा चुका
है। विपनेट
के विषय
में
विज्ञान
प्रगति के
पाठकों को
कुछ समय
पहले निमिष
कपूर
द्वारा
लिखित एक
प्रमुख लेख
के माध्यम
से
सम्पूर्ण
जानकारी दी
गई थी।
विज्ञान
प्रसार ने
रेडियो और
टी.वी. पर भी
अपनी
उपस्थिति
दर्ज कराकर
देश के
सुदूर
हिस्से तक
अपनी पहुंच
बनाई है। 108
कड़ियों
वाला मानव
का विकास
नामक
धारावाहिक
विज्ञान
प्रसार का
आरम्भिक
रेडियो‚धारावाहिक
था जिसे एन.सी.एस.टी.सी.
और ऑल
इंडिया
रेडियो के
सहयोग से
निर्मित
किया गया
था। इस
धारावाहिक
के 18 भारतीय
भाषाओं में
ऑडियो
कैसेट
सेटों का
भी बाद में
निर्माण
कराया गया
था। यह
धारावाहिक
खासा
लोकप्रिय
हुआ था।
धरती मेरी
धरती और
तारों की
सैर भी
विज्ञान
प्रसार
द्वारा
निर्मित
लोकप्रिय
रेडियो
धारावाहिक
हैं।
1998
से विज्ञान
प्रसार
संस्थान
अपने मासिक
न्यूजलेटर
'ड्रीम 2047` का
निरन्तर
प्रकाशन
करता आ रहा
है। यह
न्यूजलेटर
भारत के 30
हजार
स्कूलों को
भेजा जाता
है और
वर्तमान
में इसकी
प्रसार
संख्या
करीब 52 हजार
है। यह
पत्रिका
अपनी
सामग्री
खासकर
वैज्ञानिकों
की प्रेरक
जीवनियों
के लिए
बेहद
लोकप्रिय
है।
विज्ञान
रेल (पहियों
पर चलती‚फिरती
विज्ञान
प्रदर्शनी)
के बारे
में आपने
अवश्य सुना
होगा। इसे
विज्ञान
प्रसार ने
ही 2003-04 में
पूरे देश
में चलाया
था।
सांस्कृतिक
एकता का
प्रतीक रेल
देश के हर
अंचल को
स्पर्श
करता है।
इसी विचार
से
अभिपेरित
होकर
विज्ञान
प्रसार
सोसायटी के
तत्कालीन
अध्यक्ष एम.
वी. कामथ ने
रेल
मंत्रालय
सहित 18
विभागों को
लेकर
विज्ञान
रेल की
योजना को
मूर्त रूप
दिया और
फिर 15
दिसम्बर 2003
को चल
निकली 12
डिब्बों से
सुसज्जित
भारतीय
विज्ञान की
चलती‚फिरती
रेल।
विज्ञान
रेल 8
महीनों में
57 छोटे‚बड़े
शहरों में
रुकी और
इसने लाखों
दर्शकों को
विज्ञान की
जानकारी
बांटी।
विज्ञान
परिषद
प्रयाग,
इलाहाबाद
की स्थापना
1913 में हुई थी
जिसका
प्राथमिक
उद्देश्य
विज्ञान लोकप्रियकरण
है। 1915 में
विज्ञान
परिषद
प्रयाग ने 'विज्ञान`
नामक
पत्रिका का
प्रकाशन
शुरू किया
था जो आज भी
निरन्तर
प्रकाशित
हो रही है।
देश में
लगभग सभी
महान
विज्ञान
संचारक इस
संस्था से
जुड़े रहे
हैं।
संप्रति
इसके
प्रधानमंत्री
डॉ.
शिवगोपाल
मिश्र हैं
जो एक
अनुभवी
विज्ञान
लेखक‚सम्पादक
हैं।
विज्ञान और
प्रौद्योगिकी
की विभिन्न
शाखाओं से
सम्बंधित
शब्दों के
मानक
स्वरूप के
निर्धारण
के लिए
मानव
संसाधन
विकास
मंत्रालय
ने
वैज्ञानिक
और तकनीकी
शब्दावली
आयोग
स्थापित
किया है।
इस आयोग ने
भी विज्ञान
लोकप्रियकरण
अभियान को
बल दिया
है।
प्रकृति
ने अपने
आंगन में
असंख्य
सुंदर
कविताएं रख
छोड़ी हैं
ताकि हम
मनुष्य
सूक्ष्मदर्शी
और
दूरदर्शी
की मददसे
उनका आनंद
उठा सकें।
ये कविताएं
दरअसल
विज्ञान की
मदद से
पढ़ी, समझी
और
गुनगुनाई
जा सकती
हैं।
वैज्ञानिक
इन कविताओं
में
प्रयुक्त
शब्द और लय
का उद्घाटन
करते हैं
और विज्ञान
संचारक इस
ज्ञान को
आम जन तक
पहुंचाने
के लिए पुल
का काम
करते हैं।
भारत में
विज्ञान
लोकप्रियकरण
आंदोलन ने
यहां के
समाज में
वैज्ञानिक
दफष्टिकोण
का बीज बो
दिया है, इस
बीज से
नन्हा पौधा
भी बाहर
निकल आया
है, इसे
सशक्त
वफक्ष बनना
शेष है।
दुनिया
के महान
विज्ञान
संचारक
दुनिया
के अनेक
महान
वैज्ञानिकों
ने विज्ञान
संचारक की
भूमिका भी
निभाई है।
प्रकृति और
विज्ञान के
पीछे छिपे
रहस्य को
दुनिया के
लोगों से
साझा करने
के लिए इन
वैज्ञानिकों
ने
लोकप्रिय
विज्ञान
लेखन,
लोकप्रिय
विज्ञान
व्याख्यान
जैसी
विधाओं का
सहारा
लिया। इनका
उद्देश्य
स्पष्टत:
विज्ञान
लोकप्रियकरण
था। यहां
दुनिया के
कुछ
अप्रतिम
विज्ञान
संचारकों
के बारे
में
संक्षेप
में चर्चा
की जा रही
है।
चार्ल्स
डार्विन (1809-1882)
ने जीवों
के विकास
और इसके
अलावा
चिड़ियों,
मछलियों,
पालतू
जंतुओं के
स्वभाव,
जीवाश्म
तथा पौधों
के बारे
में अनेक
पुस्तकें
लिखी थीं।
उन्होंने
आत्मकथा भी
लिखी थी
जिसे उनके
पुत्र ने
मरणोपरांत
प्रकाशित
कराया था।
डार्विन की
लेखन शैली
बहुत रोचक
और बोधगम्य
थी इसलिए
उन्हें
विज्ञान
संचारक का
दर्जा बेशक
दिया जा
सकता है।
माइकल
फैराडे (1791-1867)
दुनिया के
एक महान
वैज्ञानिक
और विज्ञान
संचारक थे।
उन्होंने
प्रकृति के
रहस्यों को
प्रयोग
विधि
द्वारा
समझने और
समझाने के
क्षेत्र
में अपूर्व
योगदान
दिया था।
फैराडे
दुनिया के
सर्वश्रेष्ठ
प्रयोगकर्ताओं
में से एक
थे।
उन्होंने
किशोर
श्रेाताओं
के समक्ष
प्रायोगिक
प्रदर्शनों
की मदद से
विज्ञान के
सिद्धांतों
को
प्रस्तुत
किया और इन
पर अनेक
व्याख्यान
दिए थे।
वैज्ञानिक
अध्ययन में
प्रयोगों
के महत्व
पर फैराडे
ने हमेशा
विशेष बल
दिया।
विज्ञान को
लोक तक
पहुंचाने
में फैराडे
का योगदान
उल्लेखनीय
है।
''मैं
सोचता हूं
कि एक
वैज्ञानिक
को, अगर
सम्भव हो
सके तो
विज्ञान को
आम आदमियों
के लिए
सरलता से
समझने
योग्य
बनाना
चाहिए और
मैंने अपने
कार्यों
में इसे
लोकप्रिय
बनाने का
प्रयत्न
किया है।``
यह विचार
हैं महान
वैज्ञानिक
और विज्ञान
संचारक जे.बी.एस.
हाल्डेन (1892-1964)
के जो
जनसंख्या
आनुवांशिकी
के
संस्थापकों
में से एक
थे और
विकास का
गणितीय
सिद्धांत
उनका
उल्लेखनीय
योगदान
माना जाता
है।
हाल्डेन
बहुमुखी
प्रतिभासंपन्न
वैज्ञानिक
थे।
उन्होंने
विज्ञान को
विकास और
समाज से
जोड़कर
अपना विचार
दिया था
जिसे
महत्वपूर्ण
माना जाता
है। नेहरू
हाल्डेन के
इन्हीं
विचारों से
प्रेरित
हुए थे।
हाल्डेन की
विचारधाराएं
आज भी
प्रासंगिक
हैं। वह
भारतीय
वैज्ञानिक
पी.सी.
महालनोबिस
के आमंत्रण
पर 1957 में
भारत आए और
भारतीय
सांख्यिकी
संस्थान
में शोध
परियोजनाओं
को एक नई
दिशा दी।
हाल्डेन को
भारतीय
दर्शन में
गहरी रूचि
थी और
उन्हें
संस्कृत का
अच्छा
ज्ञान भी
था।
उन्होंने 1961
में भारतीय
नागरिकता
ग्रहण कर
ली थी।
हाल्डेन
एक सक्रिय
विज्ञान
संचारक थे।
उन्होंने
अपने लेखों
में
विज्ञान की
समाज के
प्रति
जिम्मेदारियें
पर हमेशा
बल दिया।
उन्होंने
स्वयं
विशुद्ध
विज्ञान और
लोकप्रिय
विषयों पर 24
पुस्तकें
और 400 से भी
अधिक शोध
पत्र एवं
असंख्य
आलेख लिखे
थे। ऑन
बीइंग द
राइट साइज,
माई फ्रैंड
मिस्टर
लीकी,
साइंस एंड
यू और
साइंस एंड
एवरीडे
लाइफ
लोकप्रिय
विज्ञान पर
लिखी उनकी
उल्लेखनीय
पुस्तकें
हैं।
एवरीथिंग
हैज ए
हिस्ट्री
शीर्षक
पुस्तक में
हाल्डेन ने
मजदूरों,
कारीगरों
और आम आदमी
के लिए ऐसे
लेख लिखे
थे ताकि वे
अपने आस-पास
की चीजों
से जुड़ी
वैज्ञानिक
जानकारी
हासिल कर
सकें।
जार्ज गैमो
(1904-1968) दुनिया
के प्रमुख
विज्ञान
संचारकों
में से एक
हैं।
भौतिकी,
खगोलिकी और
जीव
विज्ञान
में
उन्होंने
अनेक
महत्वपूर्ण
खोज की
हैं। बचपन
में पिता
द्वारा
भेंट किए
गए
टेलीस्कोप
से वह रात
में घंटों
आकाश में
तारों को
निहारते
रहते थे।
यहीं से
उनमें
विज्ञान
में
दिलचस्पी
जागी। गैमो
को विज्ञान
के जटिल
सिद्धान्तों
को सरल,
रोचक और
मनोरंजक
शैली में
ढालकर आम
पाठकों के
सम्मुख
प्रस्तुत
करने में
महारत
हासिल था। 1956
में उन्हें
विज्ञान
लोकप्रियकरण
के लिए
यूनेस्को
द्वारा
दिये जाने
वाले
दुनिया के
प्रतिष्ठित
'कलिंग
पुरस्कार`
से
सम्मानित
किया गया।
लोकप्रिय
विज्ञान पर
गैमो ने 30
पुस्तकें
लिखीं
जिनमें द
बॉयोग्राफ्री
ऑफ द अर्थ
वन, टू, थ्री.....इन्फिनिटी
और द मून
उल्लेखनीय
हैं। गैमो
की 1968 में
मफत्यु के
बाद उनकी
पत्नी और
कोलरेडो
विश्वविद्यालय
के भौतिकी
विभाग ने
मिलकर उनकी
स्मफति में
जॉर्ज गैमो
व्याख्यान
शफंखला की
शुरुआत की
है।
विज्ञान
प्रसार,
विज्ञान
एवं
प्रौद्योगिकी
विभागए‚
इंस्टीट्यूशनल
एरिया,
सेक्टर‚
62, नोएडा‚201307
(उ.प्र.)
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