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              इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए अंक 188,वर्ष 22,फरवरी 2010
 
 
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वर्ष विशेष

वर्ष 2009 : हौसलो से जीता जहां

हर साल की तरह वर्ष 2009 भी बीत गया, और दे गया कुछ खट्टी-मीठी यादें, जो हमेशा के लिये इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज हो गई हैं। पिछला साल हर क्षेत्र में अपनी-अपनी प्रमुख घटना के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। विज्ञान की दुनिया के लिये वर्ष 2009 अभूतपूर्व उपलब्धियों वाला रहा है। एक ओर जहाँ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था 'इसरो' द्वारा प्रक्षेपित यान चंदयान-1 ने चाँद पर पानी खोज कर पूरी दुनिया को भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं का लोहा मनवाया तो वहीं दूसरी ओर भारतवंशी वैज्ञानिक डॉ. वेंकटरमण रामकृष्णन ने अपनी खोज ''राइबोसोम की संरचना और कार्यविधि'' के लिये रसायन विज्ञान का नोबल पुरस्कार 2009 जीत कर दुनिया के सामने और भी फप्र से सर ऊँचा करने का मौका दिया। इन्हीं सब सफलताओं के बीच पिछला साल गैलीलियो द्वारा 1609 में पहली टेलिस्कोप के माध्यम से अंतरिक्ष का अध्ययन करने के उपलक्ष्य में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ द्वारा घोषित 'खगोलकीय वर्ष 2009' के रूप में मनाया गया। विज्ञान पत्रिका ''इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिये'' भी वर्ष 2009 खास रहा। अपने सभी विज्ञान लेखकों के सहयोग से उत्कृष्ट पठन सामग्री प्रकाशित कर पत्रिका ने विज्ञान को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की, जिसके लिये पत्रिका को कोडई कनाल में ''राष्ट्रीय राजभाषा शील्ड सम्मान 2009'' से छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री नरसिम्हन व पांडिचेरी के ले.गवर्नर श्री इकबाल सिंह द्वारा नव़ाजा गया। विज्ञान के क्षेत्र में गत वर्ष की इन्हीं कुछ विशिष्ट उपलिब्धयों को लेकर हम इस अंक में विशेष सामग्री का संकलन प्रकाशित कर रहे हैं। .... और अंत में, वर्ष 2009 में विज्ञान की दुनिया के सुनहरे हस्ताक्षर स्व. श्री गुणाकर मुळे के निधन की दुःखद घटना भी घटित हुई। इस अंक के माध्यम से हम उनके विज्ञान क्षेत्र में दिये गये अभूतपूर्व योगदान को भी याद कर रहे हैं।

मिसाल

नोबल पुरस्कार विजेता : श्री वेंकटरमण रामकृष्णन

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की एम.आर.सी. लेबोरेटःाrज ऑफ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के स्टःक्चरल स्टडीज विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक भारतवंशी वेंकटरमण रामक़ृजणन को रसायन शास्त्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2009 का रसायन क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार दो अन्य रसायन विज्ञानियों थॉमस ई. स्टेज (सं. रा. अमेरिका) तथा अदायोनथ (इसरायल) के साथ संयुक्त रूप से मिला है विज्ञान की विधा में इसके पूर्व तीन अन्य भारतीय सर चन्द्रशेखर वेंकटरमन (1930, भौतिकी, रमन इफेक्ट के लिए), हरगोविन्द खुराना (1968, मेडिसिन) तथा सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (1983, भौतिकी) नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। वैंकटरमण रामक़ृजणन कैंब्रिज लैब से नोबेल पुरस्कार पाने वाले 13वें वैज्ञानिक हैं। वेंकटरमण और उनके साथियों को यह नोबेल पुरस्कार ''राइबोसोम की संरचना और कार्यविधि की गुत्थी सुलझाने के लिए'' मिला है। नोबेल पुरस्कार समिति ने अपनी प्रशस्ति में कहा है कि इन वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि राइबोसोम कैसा दिखाई देता है और परमाण्विक स्तर पर यह कैसे कार्य करता है। इन तीनों वैज्ञानिकों ने एक्सरे क्रिस्टलोग्राफी पद्धति का प्रयोग करके राइबोसोम को बनाने वाले सैकड़ों-हजारों परमाणुओं में से हरेक की स्थिति को मापने के लिए थ्री डी मॉडल तैयार किया। ''मंदिरों के शहर'' के नाम से विख्यात तमिलनाडु के चिदम्बरम् जिले में वर्ष 1952 में जन्मे ''वेंकी'' के नाम से लोकप्रिय डॉ. वेंकटरमण रामक़ृजणन ने 1971 में बड़ौदा के सैय्याजी राव विश्वविद्यालय से भौतिक शास्त्र में बी.एससी. की डिग्री प्राप्त की। बचपन से ही प्रखर बुद्धि के वेंकटरमण को हाईस्कूल परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने पर नेशनल टैलेंट अवार्ड दिया गया था। वैज्ञानिक माता-िपता की संतान वेंकटरमण को उनके माता-िपता भौतिकी की तरफ न ले जाकर चिकित्सा जगत की तरफ ले जाना चाहते थे, इसलिए इनके माता-िपता ने इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने के उपरांत इनका नाम बड़ौदा के मेडिकल कॉलेज में लिखवा दिया था, परंतु भौतिकी में अपनी रुचि के कारण वेंकटरमण ने मेडिकल की पढ़ाई त्याग कर बड़ौदा के सैय्याजी राव वि.वि. में बी.एससी. में दाखिला ले लिया। वेंकटरमण ने बी.एससी. करने के उपरांत सेन डिएगो के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री हासिल की तथा ओहियो विश्वविद्यालय से 1976 में भौतिक शास्त्र में पीएच.डी. की। इसके बाद वेंकटरमण ने एक वर्ष कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य किया तथा बायोलॉजी के क्षेत्र में काम शुरू किया। इसके पश्चात् थोड़े समय तक उराह विश्वविद्यालय में काम किया। इसके पश्चात् येल विश्वविद्यालय में उन्होंने सबसे पहले ई-कोलाई के राइबोसोम पर थोड़े दिन तक कार्य किया। इसके पश्चात् उन्होंने मेम्ब्रेन बायो-केमिस्ट डॉ. मॉरीसियो मोंटल के साथ शोध किया। इसके पश्चात् उन्होंने अमेरिका को त्यागकर ब्रिटेन को अपनी कर्मभूमि बनाया और अपना शोध जारी रखा। 26 अगस्त 2000 को प्रख्यात विज्ञान शोध पत्रिका नेचर में डॉ. रामक़ृजण और उनके सहयोगियों का सूक्ष्म राइबोसोम इकाइयों का 5.5 एंग्स्टःाsम के ढांचे का मानचित्र प्रकाशित हुआ। इसके बाद वेंकटरमण की टीम ने आर.एन.ए. के प्रमुख हिस्सों की पहचान की। पुन 21 सितम्बर 2000 को वेंकटरमण के दो शोध पत्र नेचर में प्रकाशित हुए जिसमें से एक शोध पत्र में 3 एंग्स्टःाम 30 एस राइबोसोमल इकाइयों की संरचना पेश की गयी। दूसरे शोध पत्र में यह बताया गया था कि 30 एस राइबोसोमल इकाइयाँ तीन एंटीबॉडीज के सम्मिश्रण से बनी हैं। ये तीनों शोध पत्र डॉ. पीटर मूर के निर्देशन में प्रस्तुत किए गए थे। वर्ष 2008 में वेंकटरमण ने कैम्ब्रिज की एम आर सी लैब ऑफ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में वरिष्ठ वैज्ञानिक पद पर ज्वाइन किया तथा तब से वहीं पर कार्यरत हैं। वेंकटरमण लंदन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसाइटी के फैलो भी हैं।

अरूण पाठक

श्रद्धांजलि

अस्त हुआ विज्ञान की दुनिया का सूर्य

मैं अभी मरना नहीं चाहता शांता। मुझे अभी बहुत लिखना है,' पिछले छह-सात महीने से बिस्तर पर पड़े रहने को विवश गुणाकर जी अपनी जीवनसंगिनी शांति मुळ्s से बार-बार यही कहते रहे। एक साथ सात-आठ किताबों पर काम चल रहा था। वैज्ञानिकों की जीवनी का एक विश्वकोष बनाने की भी योजना थी। लेकिन गणित, तारा विज्ञान, लिपियों के विकास तथा तारा भौतिकी के वैज्ञानिकों की जीवनी से संबंधित विपुल साहित्य के उद्भट प्रणेता के रूप में गुणाकर मुळ्s को हिन्दी साहित्य के इतिहास में भले ही जगह न मिले, लेकिन उनके दिल्ली से दरभंगा तक बिखरे पाठकों के ह्य्दय में उनका स्थान अक्षुण्ण रहेगा। इन्हीं पाठकों के बलबूते स्वतंत्र लेखन और वह भी विज्ञान लेखन के भरोसे गुणाकर मुळ्s ने दिल्ली के पांडव नगर में अपना दुमंजिला घर बनाया और पुस्तकों की रॉयल्टी से ही उनकी पत्नी ने उनका इलाज कराया। राजकमल प्रकाशन के संचालक अशोक माहेश्वरी के सिवा हिन्दी के किसी झंडाबरदार ने उनकी सुधि नहीं ली, यही पीड़ा भी मुळ्s जी को अंतिम क्षणों में व्यथित करती रही। तीन जनवरी 1935 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के सिंदी बुजरूक गांव में किसान परिवार में जन्में गुणाकर मुळ्s ने मिडिल (आठवीं) गांव से पास किया। फिर वर्धा में दसवीं और इंटर तक पढ़े और पाली, संस्कृत, हिन्दी में विशारद किया। पिता चाहते थे कि अपने मामा की तरह गुणाकर भी गांव में मास्टरी करे, लेकिन पढ़ने की लगन इतनी थी कि बौद्ध भिक्षु आनंद कौसल्यायन के साथ वर्धा से इलाहाबाद चले गये। या कहें कि इस विद्यानुरागी बालक को आनंद जी ने एक तरह से गोद ही ले लिया। सन् 1960 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित विज्ञान में एम. एससी की उपाधि ली और तारा विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) का भी अध्ययन किया। प्रयाग से ही पत्र-पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया। विचारों से साम्यवादी थे, तो दिल्ली में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस से किताबें खरीदने जाते थे। वहां से रूस से प्रकाशित विज्ञान की किताबें भी लीं, जिनमें गणित और भौतिकी के गूढ़ विषय बड़े रोचक ढ़ंग से समझाये जाते थे। बस वहीं से विज्ञान पर लिखने की लगन लग गई कि क्यों न हिन्दी के पाठकों को यह सब बताया जाए कि ब्रह्मांड का जन्म कैसे हुआ, कैसे अरबों-खरबों तारे बने, आकाशगंगाएं बनीं, हमारा सौर-परिवार बना और यह सारा आकाशी कारोबार भौतिकी के किन नियमों पर टिका हुआ है। उनकी लेखनी को बल मिला जब पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस में पहले अंग्रेजी और फिर हिन्दी प्रकाशनों की संपादिका शांति पांडे ने उन्हें 1971 में अपना सहचर चुना। बाल-सुलभ जिज्ञासा से भरे गुणाकर उन्हें पहली ऩजर में ही भा गए। सन् 1973 में पहली संतान मंदाकिनी के जन्म के साथ ही शांति मुळ्s ने पीपीएच की नौकरी छोड़ दी। मुळ्s जी का नौकरी करने का कोई इरादा नहीं था। ईस्ट पटेल नगर में किराये का घर था। स्वतंत्र लेखन तो आकाशवृत्ति है। वर्षा हो गई तो अच्छी फसल, नहीं तो सूखा और फाकाकशी। मगर किसी के आगे हाथ नहीं पसारे। हर ईंट किताबों की और पसीने का पलस्तर ऊपर की मंजिल उनका अध्ययन कक्ष था, जहां तीन कमरों में 6-7 हजार किताबों का संग्रह है। सबसे नई किताब डॉ. डी.डी के कौशांबी की जीवनी थी, जिसे वे पूरा नहीं लिख पाए। पचास वर्षों के लेखकीय जीवन में 40 से अधिक वैज्ञानिक पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 3000 हिन्दी में तथा 250 अंग्रेजी में लेख, रेडियो वार्ताएं तथा दूरदर्शन के लिये वैज्ञानिक पटकथायें आदि ने गुणाकर मुळ्s जी को अनेक पुरस्कारों के रूप में मान्यता दिलाई। विज्ञान लेखकों के गुरुकुल विज्ञान परिषद प्रयाग ने सम्मानित किया। केंदीय हिन्दी संस्थान का आत्माराम पुरस्कार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का मेघनाद साहा पुरस्कार, संचार माध्यमों में विज्ञान के सर्वश्रेष्ठ कवरेज का राष्ट्रीय पुरस्कार, बिहार सरकार का जननायक कर्पूरी ठाकुर पुरस्कार, मराठी विज्ञान परिषद का पुरस्कार, दिल्ली हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान आदि। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने दो साल पहले जो पुरस्कार देने की घोषणा की थी, वह अंतिम समय तक नहीं मिला। लेकिन मुळ्s जी तो सबसे बड़ा पुरस्कार उन पत्रों को मानते थे, जो उन्हें प्रिय पाठकों से मिलते रहे। विज्ञान मंत्रालय की `िवज्ञान प्रसार' संस्था में दो वर्ष तक सलाहकार रहे, लेकिन घर से ही। उनकी मासिक पत्रिका में लगातार लिखा। अनेक योजनाओं के सुझाव दिए और फिर छोड़ दिया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने भी उन्हें अपना फैलो चुना था।

रमेश दत्त शर्मा  

वर्ष विशेष

खगोल विज्ञान का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष 2009

ब्रह्माण्ड के बारे में खगोल विज्ञानियों का अध्ययन लगातार चलता रहता है। आकाश और अंतरिक्ष के विजाय में वे नियमित रूप से शोध करते रहते हैं। खगोल विज्ञान में अध्ययन को बढ़ावा देने, पृथ्वी वासियों को आकाश और अंतरिक्ष के रहस्यों के विजाय में समझाने, तथा आधुनिक खगोलिकी के जनक इतालवी खगोलवेत्ता गैलीलियो गैलिली द्वारा वर्ष 1609 में पहली बार टेलीस्कोप से अंतरिक्ष का अध्ययन किए जाने की 400 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ (घ्.A.ळ.) ने वर्ष 2009 को खगोल विज्ञान का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोजिात किया है। खगोल विज्ञान का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष 2009 इसलिए भी मनाया जा रहा है कि इस वर्ष ही जर्मन गणितज्ञ जॉन केपलर की खगोल विज्ञान पुस्तक एस्टःाsनोमिया नीवा के प्रथम प्रकाशन की 400 वीं वर्षगांठ भी है। खगोलिकी के इतिहास में झांकें तो यह ज्ञात होता है कि मिस्र-यूनानी परम्परा के प्रसिद्ध खगोलज्ञ क्लाडियस टालेमी द्वारा सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड का नियमित अध्ययन 140 ई. में शुरू किया गया। उन्होंने इस सिद्धांत को मान्यता दी कि ''पृथ्वी विश्व के केन्द्र में है तथा सूर्य और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं।'' टॉलेमी के इस सिद्धांत ने 360 ई.पू. में निडोस के यूरोडाक्सियस के द्वारा प्रतिपादित प्राचीन मत को स्थिरता प्रदान की। टॉलेमी ने 190 ई. के लगभग एक विश्व कोजा भी बनाया जो खगोलिकी पर आधारित था। इसका अरबी भाषा में अनुवादित ग्रंथ ''अल्मगेस्त'' 1400 वर्षों तक खगोलिकी का बाइबिल बना रहा। टालेमी के मत का खण्डन किया पोलैण्ड के खगोल विज्ञानी निकोलस कोपरनिकस ने। उन्होंने सर्वप्रथम सूर्य केन्द्रित सिद्धांत का प्रतिपादन किया। वर्ष 1543 ई. में कोपरनिकस ने ''डी रिवोलुशनिबस आरबियम सोयलेसटियम'' नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि सूर्य ब्रह्माण्ड का केन्द्र है और पृथ्वी तथा ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। टॉलेमी के अनुयायियों ने कोपरनिकस के इस मत का बहुत विरोध किया। इसी क्रम में खगोल विज्ञानी टिको ब्राहे ने भी कोपरनिकस के सूर्य केन्द्रित मत को अस्वीकार कर दिया (1573 ई.)। इसी समय जर्मन खगोल विज्ञानी जोहनीस केप्लर (1601 ई.) ने पुन कोपरनिकस के मत को समर्थन दिया तथा पुष्टि कर दी कि सूर्य ही विश्व के केन्द्र में है। लेकिन टॉलेमी के मतावलम्बी कुछ स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। केपलर ने खगोल विज्ञान की पुस्तक ''एस्टःाs नोमिया नीवा'' की रचना की। इसी मत-मतांतर के बीच इटली में खगोल विज्ञानी गैलीलियो गैलिली (1564-1642 ई.) का उद्भव हुआ। गैलीलियो ने टेलीस्कोप का आविजकार किया और उन्होंने इस सिद्धांत की पुष्टि कर दी कि सूर्य विश्व के केन्द्र में है। गैलीलियो ने ही सर्वप्रथम 1609 में टेलीस्कोप से अंतरिक्ष का अध्ययन किया तथा सूर्य केंद्रित कोपरनिकस के सिद्धांत को मान्यता प्रदान कर दी। इस सिद्धांत को पुष्ट करने के कारण उस समय के टालेमी के सिद्धांत के समर्थक ताकतवर चर्च ने गैलीलियो का बहुत विरोध किया लेकिन अपनी मफत्यु के पूर्व गैलीलियो को यह जानकर प्रसन्नता हुयी कि उसका समर्थित मत स्वीकार हो रहा है। टॉलेमी के भू-केन्द्रित सिद्धांत को आखिरी झटका सर आइजक न्यूटन (1642-1726 ई.) ने दिया। उनकी पुस्तक '`िफलासफिया नेचुरलिस प्रिंसिपिया मैथेमेटिका'' ने कोपरनिकस और गैलीलियो के सिद्धांतों की पुष्टि की, जिससे टॉलेमी के मत का सदा के लिए खंडन हो गया। यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ ने वर्ष 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान वर्ष मनाने के लिए 100 देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों और संस्थाओं का एक संयुक्त मंच तैयार किया है। इस संयुक्त मंच का मुख्यालय यूरोपियन सदर्न आब्जरवेटरी, जर्मनी में बनाया गया है। इस मंच से जुड़े देश अपने-अपने क्षेत्र में 100 आवर्स ऑफ एस्टःाsनामी, द गैलीलियो स्कोप, कॉस्मिक डायरी, द पोर्टल टू यूनिवर्स, शी इज एन एस्टःाsनॉमर, डार्क स्काई अवेयरनेस, गैलीलियो टीचर टःsनिंग प्रोग्राम, यूनिवर्स अवेयरनेस, फ्रॉम अर्थ टू यूनिवर्स और डेवलपिंग एस्टःाsनॉमी ग्लोबली जैसे कई रोचक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इस अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान वर्ष का नारा रहा - ''द यूनिवर्स, योर्स टू डिस्कवर''।  

अरूण कुमार पाठक

बड़ी सफलता

चंदयान-1 ने लगाये हमारी कामयाबी में चार चाँद

भारत के पहले मून मिशन 'चंद्रयान-1' ने चंद्रमा की सतह पर पानी की खोज की है। यह न सिर्फ भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही है, बल्कि इसे बाहरी अंतरिक्ष में जीवन की खोज के अभियान में मील का पत्थर माना जा रहा है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और जापान जैसे तकनीकी मामलों में हमसे कहीं उन्नत देश पिछले चार दशकों की खोज में अंतरिक्ष में पानी नहीं ढूंढ सके, लेकिन हमने अपने पहले ही मून मिशन में जिंदगी की इस अहम जरूरत को खोज लिया। चंद्रमा की सतह पर भेजे गए भारत के पहले अंतरिक्ष यान 'चंद्रयान-1' में लगे मून मिनरोलॉजी मैपर (एम-3) उपकरण की बदौलत पानी की खोज हो सकी है। यह उपकरण नासा ने धरती के इस उपग्रह पर पानी मौजूद होने की संभावना को तलाशने के लिए लगाया था। हालांकि, 'चंद्रयान-1' में तकनीकी खराबी के कारण मिशन 30 अगस्त को रद्द कर दिया गया था, लेकिन इसके पहले ही मिशन ने ऐतिहासिक कामयाबी हासिल कर ली। उपकरण से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) की प्रमुख खोजकर्ता कार्ला पीटर्स ने चंद्रमा में पानी होने की पुष्टि की है। उधर, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (इसरो) के अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने करोड़ों देशवासियों का सीना चौड़ा करते हुए कहा, 'चंद्रमा पर भेजे गए अब तक के किसी भी मिशन ने ऐसी उपलब्धि हासिल नहीं की है।' इससे पहले माना जाता था कि चंद्रमा की सतह में पानी मौजूद नहीं है। उन्होंने बताया कि पिछले साल 22 अक्टूबर को प्रक्षेपित किए गए 'चंद्रयान-1' में लगे 11 उपकरणों में एम-3 भी एक था। नायर ने बताया कि एम-3 की खोज में इसरो के हाइपर स्पेक्टःल इमेजर (एचवायएसआई) और मून इंपैक्ट प्रोब (एमआईपी) ने भी अहम भूमिका निभाई है। कार्ला पीटर्स ने विज्ञान पत्रिका 'साइंस' के ताजा अंक में 'चंद्रयान-1' की खोज पर अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें कहा गया है कि एम-3 ने चंद्रमा की ऊपरी सतह पर पानी की मौजूदगी बताई थी। कार्ला ने हालांकि यह नहीं बताया कि चंद्रमा पर असल में कितना पानी मौजूद है, लेकिन उन्होंने अनुमान जताया कि वहां की एक टन मिट्टी से एक लीटर पानी मिल सकता है। कार्ला ने कहा, इसरो की मदद के बिना यह खोज मुमकिन नहीं थी।'  

चंदयान-2 करेगा चांद पर खुदाई

'चंद्रयान-1' द्वारा चांद पर पानी खोज लेने के बाद देश के 2013 में प्रस्तावित 'चंद्रयान-2' कार्यक्रम में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। चांद की सतह पर खुदाई के साथ कुछ और प्रयोगों की संभावनाएं टटोली जा रही हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान में अहम खोज के बाद चंद्रमा के अगले अभियान के प्रयोगों को लेकर भारतीय वैज्ञानिक नए सिरे से सोच विचार में जुट गए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमेन जी माधवन नायर ने कहा कि 'चंद्रयान-2' के उद्देश्यों में बदालव करना होगा। 'चंद्रयान-2' की योजना : इस कार्यक्रम के तहत इसरो चांद की सतह पर दो रोवर उतारने की योजना बना रहा है। वैज्ञानिक रोवर में ऐसा उपकरण रखना चाह रहे हैं, जो चांद की सतह पर खुदाई और कुछ प्रयोग कर सकें। 'चंद्रयान-2' के सभी प्रयोग भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए जाएंगे। हालांकि चांद पर उतारा जाने वाला रोवर रूस से हासिल किया जाएगा। इसरो रोवर का छोटा स्वदेशी संस्करण तैयार करने की कोशिश कर रहा है। फुल हो गया है : लांचिंग के चार साल पूर्व ही 'चंद्रयान-2' पूरी तरह फुल हो गया है। वैज्ञानिक इसमें कुछ अतिरिक्त उपकरण रखने की संभावनाएं टटोल रहे हैं। कई देशों ने इस पर अपने उपकरण रखने की इच्छा जाहिर की है। 'चंद्रयान-1' में देश के 5 उपकरण थे, नासा के दो उपकरण सहित 6 उपकरण दूसरे देशों के थे।  

उम्मीदें अभी और भी हैं...

चाँद के बाद अब सूरज पर फतह की तैयारी

भारत के सफल चंद्रयान-1 मिशन के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) सूर्य अभियान की तैयारी कर रहा है। इसरो के वैज्ञानिक सूर्य के बाहरी क्षेत्र कोरोना के अध्ययन के लिए आदित्य नामक एक अंतरिक्ष यान को डिजाइन कर रहे हैं। भारत के चंद्रयान-1 मिशन की सफलता के बाद आदित्य सौर मिशन की घोजाणा करते हुए इसरो प्रमुख जी. माधवन नायर ने कहा कि चंद्रयान-1 की सफलता ने इसरो को चांद के पार भी मिशन भेजने की प्रेरणा दी है। जी. माधवन नायर के अनुसार आदित्य एक लघु उपग्रह है जिसका डिजाइन बस अब पूरा होने वाला है। अब तक अन्य देशों ने सूर्य पर जो मिशन भेजे उनमें प्रमुख हैं : अमेरिका द्वारा सबसे पहला मिशन पायोनियर-5, 11 मार्च 1959 को अंतरिक्ष में प्रमोचित किया गया, इसके बाद पायोनियर-6 का प्रमोचन 16 दिसम्बर 1965 को, पायोनियर-7 का प्रमोचन 17 अगस्त 1966 को एवं पायोनियर-8 व पायोनियर-9 का प्रमोचन 8 दिसम्बर 1968 को किया गया। इसके बाद सन् 1980 में नासा ने सूर्य की ओर सोलर मैक्सिमम मिशन भेजा। अक्टूबर 1990 में नासा के अंतरिक्ष शटल डिस्कवरी द्वारा यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अंतरिक्ष यान यूलिसिस को सूर्य का अध्ययन करने के लिए प्रमोचित किया गया। सन् 1991 में योहकोह नामक सौर प्रोब को प्रमोचित किया गया। दिसंबर 1995 में सोहो को अंतरिक्ष में प्रमोचित किया गया था। निर्धारित मिशन दो वर्षों का था लेकिन सोहो ने 2006 तक करीब दस वर्षों तक कार्य किया। जुलाई 2001 में सूर्य की आंतरिक संरचना का पता लगाने के लिए अमेरिका द्वारा जेनेसिस नामक मिशन को सूर्य की ओर रवाना किया गया। वर्ष 2006 में सूर्य के अध्ययन के लिए स्टीरियो (सोलर टेरेस्टिःयल रिलेशंस ऑब्जर्वेटरी) नामक सौर मिशन का भी प्रमोचन किया गया। सूर्य तक इतने अधिक मिशन भेजे जाने के बावजूद अब भी अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अभी तक नहीं मिल सका है। आशा है, जो मिशन अभी काम कर रहे हैं तथा भविष्य में जो मिशन भेजे जाएंगे उनके द्वारा सूर्य संबंधी तमाम अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब मिल सकेंगे। उम्मीद की जा रही है कि भारत के आदित्य नामक सौर मिशन के द्वारा यह पता लगाया जायेगा कि सोलर मैक्सिमम के दौरान सूर्य से कौन सी गैसों का उत्सर्जन होता है तथा वायुमंडल पर इनका क्या प्रभाव पड़ता है।  

प्रदीप मुखर्जी

आंख से होगी एक अरब आबादी की पहचान

यूनिक आईडेंटिटी के लिए बनाए जाने वाले परिचय-पत्रों में बायोमेट्रिक प्रॉपर्टी के तौर पर अब अंगुलियों के निशान नहीं होंगे। इसके लिए बनाई गई अथॉरिटी अब इन कार्ड्स पर आंखों की पुतलियों की छाप लेना चाहती है। नंदन नीलेकनी के नेतृत्व में यूनिक आइडेंटिटी अथॉरिटी कोशिश कर रही है कि वह यूनिक आईडी का पहला सेट फवरी 2011 में ले आए। इस बारे में सारी कोशिशें तो चल रही हैं लेकिन अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि आखिर इसका स्वरूप क्या होगा। इसके ब्लूप्रिंट में थोड़ा बदलाव किया जा रहा है और अब इसमें बॉयोमेट्रिक प्रॉपटी के तौर पर अंगुलियों के निशान की जगह आंखों की पुतलियों के प्रिंट लिये जाएंगे। वैसे यह भी संभव है कि आइरिश (आंखों की पुतलियों का केंद) और अंगूठे व अंगुलियों के निशानों को संयुक्त रूप से रखा जाए। इस प्रोजेक्ट के लिए बॉयोमेट्रिक स्टैंडर्ड तय करने क लिए एक समिति का गठन किया गया है जो इससे जुड़े जरूरी सुझाव देगी। इस कमेटी में नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर के डायरेक्टर जनरल बीके गायरोला भी शामिल किए गए हैं। इसके अलावा वेरिफिकेशन प्रोसीजर कमेटी भी बनाई गई है जो पूर्व चीफ बिजिलेंस कमिश्नर एन. विट्ठल की निगरानी में काम कर रही है। अभी तक यूआईडी के इस कार्यप्रम में सबसे ज्यादा चिंता डाटा की सुरक्षा को लेकर ही जताई जा रही है और सरकार भी इसे लेकर नियम तय कर रही है। अभी डाटा की सुरक्षा को लेकर इतना ही बताया गया है कि इसकी फूल-प्रूफ सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी।

 
 
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