electroniki
इलेक्ट्रॉनिक्स आपके लिए 24, अंक 208, वर्ष नवमबर 2011
 
 
Article1 Article2 Article3 Article4 Article5 Article6 Article7 Article8 Article9 Article10 Article11 Article12


      उपग्रहों को बर्बाद कर सकता है अंतरिक्ष का कचरा

वैज्ञानिकों ने चेतवानी दी है कि अंतरिक्ष में कचरा खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है। यह अंतरिक्षयान उपग्रहों को भारी नुकसान पहुँचा सकता है। अमेरिका नेशनल रिसर्च काउंसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि बेकार हो चुके बूस्टर व पुराने उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं। इससे पहले कि भीषण दुर्घटना हो जाए, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को इन्हें हटाने की कोशिश करनी चाहिए। नेशनल रिसर्च काउंसिल ने रिपोर्ट  में आह्वान किया है कि अंतरिक्ष में जमा हुए कचरे को सीमित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम बनाए जाने चाहिए। चुंबकीय नेट या विशालकाय छतरियों के संभावित इस्तेमाल पर और शोध होना चाहिए ताकि इस संकट का समाधान किया जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक, कम्प्यूटर मॉडल बताते हैं कि अंतरिक्ष में इतना अधिक कचरा हो गया है कि इससे अंतरिक्षयानों को नुकसान पहुँचने का खतरा लगातार बना रहेगा।  

अंतरिक्ष में कचरे की मात्रा को सीमित करने के प्रयासों को हाल के कुछ वर्षों  में दो बड़े झटके लगे हैं । 2007 में चीन  ने उपग्रह निरोधक हथियार का परीक्षण किया था। इससे मौसम की जानकारी एकत्र करने वाला एक पुराना उपग्रह नष्ट हो गया और वह एक सेंटीमीटर से कुछ बड़े डेढ़ लाख हिस्सों में बिखर गया । दो साल बाद पृथ्वी के कक्ष में एक सक्रिय उपग्रह और एक पुराने उपग्रह की टक्कर हुई जिससे और कचरा फैल गया। शोध का नेतृत्व करने वाले डोनाल्ड केसलर ने रिपोर्ट में कहा, ' इन दो घटनाओं से पृथ्वी के कक्ष में कचरे के हिस्सों  की तादाद दो गुना  हो गई और कचरा हटाने के हमारे पिछले 25 साल के प्रयासों पर पानी फिर गया, अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन को भी कभी&कभी इस कचरे से बच कर निकलना पड़ता है क्योंकि यह पृथ्वी के कक्ष में 28,164 किमी प्रतिघंटे की गति से चलता है।  

                                     खिड़की से पैदा बिजली करेगी घर को रोशन 

ऊर्जा  उत्पादन के तमाम विकल्पों पर मंथन जारी है क्योंकि ऊर्जा के परंपरागत स्रोत दुनियाभर में सीमित ही है। ऐसे में अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (एम.आईटी) के शोधकर्ता एक ऐसा सिस्टम तैयार करने में जुटे हैं जिसमें किसी भी बिल्डिंग की खिड़कियां एक पावर प्लांट का रूप ले लेंगी। खास बात यह है कि खिड़की से बाहर देखने की क्षमता पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। 

इस सिस्टम की प्रमुख तकनीक फोटो&वोल्टेइक सेल है जो कार्बनिक अणुओं पर आधारित है। यह तकनीक अवरक्त प्रकाश से ऊर्जा उत्पन्न करती है और शीशे से बाहर देखने की क्षमता भी कम नहीं होती है खिड़की से बिजली प्राप्त करने के लिए एक खास तरह का लेपयुक्त शीशा इस्तेमाल किया जाएगा। इस तरह केवल खिड़की से पैदा की गई बिजली ही पूरे घर के पंखे, टीवी, बल्व और अन्य उपकरण चला सकती है। इसमें लागत भी काफी कम आएगी और घर की खिड़की जिस आकार में है उसी में इस सिस्टम को फिट किया जा सकता है। उसमें तोड़फोड़  की भी कोई जरूरत नहीं होगी। एम.आईटी के इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग एंड कम्प्यूटर साइंस विभाग में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग के प्रोफेसर ब्लादिमीर बुलोविक ने यह पारदर्शी फोटो&वोल्टेइक सिस्टम विकसित किया है। संस्थान के ही एक शोधकर्ता रिचर्ड लुंट ने इसमें उनकी मदद की। ब्लोनिवक के अनुसार फिलहाल यह टेक्नॉलॉजी अपने शुरूआती चरण में ही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह टेक्नॉलॉजी देश की सभी ऊर्जा जरूरतों को पूरा नहीं कर पाएगी, बिजली की पारिवारिक जरूरतों को इससे पूरा किया जा सकेगा और इसमें किसी तरह का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी नहीं होता है। यह सिस्टम इसलिए भी आकर्षक है क्योंकि  इसमें जमीन अधिग्रहण या किसी तरह का ढांचा खड़ा करने की जरूरत नहीं होती। यह तो पहले से लगी खिड़कियों में ही आसानी से फिट किया जा सकता है। ब्लोविक के अनुसार बिल्डिंगों की खिड़कियों के इस्तेमाल से परंपरागत सौर ऊर्जा पैनलों के मुकाबले काफी अच्छा क्षेत्र निकल आता है।  

सुबह और शाम के समय जब सूरज की रोशनी सीधे बड़ी इमारतों को खिड़कियों पर पड़ती  है तब इस सिस्टम के जरिए खिड़कियों में से बड़ी मात्रा में ऊर्जा एकत्र की जा सकती है। इससे पहले जब पारदर्शी सोलर सेल बनाने की कोशिश की गई थी तो उनकी क्षमता काफी कम थी और सौर विकिरणों का मात्र एक फीसदी ही ऊर्जा में बदल पाते थे। पुराना सिस्टम खिड़कियों से बाहर देखने की क्षमता को भी काफी कम कर देता था। लेकिन एमआईटी के शोधकर्ताओं ने अपने सेल्स की क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष रासायनिक उपाय खोज निकाले। इससे खिड़की से देखने की क्षमता भी उतनी ही रहेगी और ऊर्जा भी ज्यादा बनेगी।  

इस सिस्टम की प्रमुख तकनीक फोटो वोल्टेइक सेल है जो कार्बनिक अणुओं पर आधारित है। यह घर की खिड़कियों पर फिट कर दिया जाएगा जो सूर्य की रोशनी को काफी ज्यादा मात्रा  में बिजली में बदल देगा। इससे घर के पंखे, बल्ब आदि सभी उपकरण आसानी से चलाए जा सकेंगे। इस सिस्टम के लगने से खिड़की से बाहर देखने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह बहुत ही कम खर्चीली तकनीक है।

वैज्ञानिकों ने खोजी शुक्र ग्रह पर ओजोन परत 

शुक्र ग्रह के चारों तरफ  चक्कर लगा रहे एक उपग्रह के आंकड़ों से पता चला है कि वहां पर भी धरती और मंगल की तरह ओजोन परत है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के उपग्रह 'वीनस एक्सप्रेस`  के आंकड़ों के मुताबिक शुक्र ग्रह की ओजोन परत धरती की ओजोन परत की तुलना में 100 से 1000 गुना कम घनत्व वाली है।  

शुक्र की ओजोन परत उसकी जमीन से 100 किमी. ऊंचाई तक है, जो पृथ्वी की ओजोन परत का चार गुना ज्यादा है। इस खोज से वैज्ञानिकों को शुक्र पर जीवन और उससे संबंधित अन्य शोधों की जानकारी प्राप्त करने में आसानी होगी।  वीनस एक्सप्रेस टीम के वैज्ञानिक हैकान स्वेडहेम के अनुसार शुक्र पर ओजोन परत मिलने से हम वहां के पर्यावरण की रासायनिक गणनाएं आसानी से कर पाएंगे। ये संभव है कि तीन ऑक्सीजन अणुओं से मिलकर बनने वाली ओजोन परत से जब सूर्य की किरणें टकराती होंगी तब वहां पर कार्बन डाइऑक्साइड के अणुओं को तोड़ती होगी। कई बहुस्तरीय रासायनिक प्रक्रियाओं  के बाद वहां पर ऑक्सीजन के अणु बनते होंगे। इससे वहां पर जीवन की संभावना से मना नहीं किया जा सकता क्योंकि ये दोनों गैस जीवन के पर्याय माने जाते हैं।

सूर्य का अध्ययन करेगा इंडियन टेलीस्कोप 

चंदमा की सतह के अध्ययन के लिए 2008 में 'चंदयान`  लॉन्च करने के बाद भारतीय स्पेस एजेंसी इसरों की नजर अब सूर्य पर है । भारतीय वैज्ञानिक दो साल के अंदर एक टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में स्थापित करेंगे, जो सौर गतिविधियों की निगरानी करेगा।  

पिछले दिनों इसरे ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए) के साथ एक करार किया है। इसके तहत 'आदित्य` के लिए कोरोनोग्राफ (सोलर टेलीस्कोप) तैयार किया जाएगा, जो सूर्य की ज्वाला का अध्ययन करने वाला पहला भारतीय सैटेलाइट होगा ।   इसे 2013  में लॉन्च किए जाने के पीछे  एक खास वजह है। वैज्ञानिकों ने बातया कि सौर गतिविधिया 11 साल के एक चक्र में घटती या बढ़ती हैं। इस चक्र के अनुसार वर्तमान सौर चक्र मई 2013 में अपने चरम पर होगा। इससे पहले सौर चक्र 2000&2002 के बीच चरम पर था। इस दौरान सूर्य  की सतह  पर ऊर्जा  व गैसों के विस्फोट से तूफान और ज्वाला तीव्र हो जाएंगी। ऐसे में वैज्ञानिक सौर गतिविधियों का अध्ययन और बेहतर ढंग से कर सकते हैं। इससे पहले 15 फरवरी से 9 मार्च, 2011 तक धरती का चक्कर लगा रहे नासा के सैटेलाइट ने 'एक्स-क्लास`  सौर ज्वाला की पहचान की थी, जो सबसे ताकतवर एक्स&रे ज्वाला होती है ।

अंतरिक्ष में सिर दर्द का कोई इलाज नहीं 

लंबे समय तक स्पेस मिशन पर रहना यात्रियों के लिए दवाइयों की जरूरत बढ़ा देता है, लेकिन ये अंतरिक्ष यात्री सिर दर्द होने पर पेन किलर नहीं ले सकते न ही इन्फेक्शन से निजात पाने के लिए एंटीबायोटिक का सेवन कर सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक ताजा शोध में यह खुलासा हुआ है कि अंतरिक्ष में दवाइयां अपनी क्षमता खो देती है।   

नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर में हुए शोध से सामने आया कि इसका कारण धरती की अलग परिस्थितियां हो सकती है, जिनमें कम गुरूत्वाकर्षण  तथा ज्यादा विकिरण शामिल है। धरती पर दवाइयों के निर्माण की पद्धति ऐसी होती है कि इन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल  किया जा सके। हालांकि इसके लिए इन्हें खास परिस्थितियों में रखना  आवश्यक होता है ताकि इसका प्रभाव बरकरार रहे। इसके विपरीत अंतरिक्ष में दवाइयों के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं रहती। 

मानव मस्तिष्क का पहला डिजिटल नक्शा तैयार 

वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क का पहला पूर्ण डिजिटल नक्शा तैयार करने का दावा किया है। अपनी तरह का यह दुनिया का पहला नक्शा है। इससे अल्जाइमर, आटिज्म और मस्तिष्क से जुड़ी अन्य बीमारियों का पता लगाने और उनके उपचार में मदद मिलेगी ।  

समाचार पत्र 'वाल स्ट्रीट जर्नल`  के मुताबिक, एलेन मस्तिष्क विज्ञान संस्थान के एक दल ने यह डिजिटल नक्शा तैयार किया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने चार वर्षों तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने दिमाग के मस्तिष्क के तमाम ऊत्तकों और जीन का अध्ययन किया और मस्तिष्क से जुड़ी  हर छोटी&बड़ी जानकारी को कम्प्यूटर के माध्यम से संग्रहित किया । हर  विवरण को इस तरह संयोजित किया गया कि वह मस्तिष्क के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक सिलसिलेवार व्यवस्थित हो सके।  

वास्तव में वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि मस्तिष्क के इस नक्शे से चिकित्सकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि शरीर का सर्वाधिक अहम यह अंग कैसे काम करता है। इससे मस्तिष्क से जुड़ी नई बीमारियों का पता लगाने और उपचार में मदद मिलेगी।  

संस्थान से जुड़े एलन जोंस ने बताया, इससे पहले मनुष्य के मस्तिष्क का इतना विवरण उपलब्ध नहीं था। यह पहली बार है कि हमने मस्तिष्क का इतना विस्तृत नक्शा तैयार किया है जिसमें उसके अंदर की बायोकैमेस्ट्री का विवरण भी शामिल है।    

संस्थान इस अध्ययन से जुड़ी जानकारियां सबके लिए मुफ्त उपलब्ध करा रहा है। इसके लिए डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट ब्रेन - मैप डॉट ओआरजी (www.brain-map.org) नामक वेबसाइट पर सभी जानकारियां डाउनलोड की गई हैं। यहाँ कम्प्यूटरीकृत उत्पादनों का एक सेट भी प्रस्तुत किया गया है, जो आंकड़ों का विश्लेषण करने  में सहायक हो सकते हैं।  आँकड़ों के विश्लेषण पर अल्जाइमर, आटिज्म और मस्तिष्क  से जुड़ी  अन्य बीमारियों जैसे, अवसाद, के सूत्रों के पते मिल सकते हैं।

कम्प्यूटर भी चिल्लाएगा

कम्प्यूटर पर गुस्सा उतारने वाले लोग अब सावधान हो जाए क्योंकि अब ऐसा कम्प्यूटर आने वाला है जो उस पर चिल्लाने वाले लोगों को उन्हीं के लहजे में जवाब देगा । वैज्ञानिक एक ऐसी ही भाषा प्रौद्योगिकी ईजाद करने में लगे हैं।   वैज्ञानिक आवाज से सक्रिय होने वाली एक ऐसी प्रौद्योगिकी के निर्माण में जुटे हैं जो 'प्राकृतिक और समझदार`  तरीके से लोगों से बातचीत कर सकती है। कृत्रिम समझ उसे अपने प्रयोगकर्ता की आवाज से परिचित कराने में मदद करेगी।  

रिपोर्ट के मुताबिक 60 लाख पाउंड की पांच वर्षों की यह परियोजना हालांकि अभी शैशवासी में है, लेकिन एडिनवर्ग, कैम्ब्रिज और शेफील्ड विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं का मानना है कि इस प्रौद्योगिकी से कई तरह के लाभ होंगे। 

एडिनवर्ग विश्वविद्यालय के सूचना विज्ञान के प्रोफेसर स्टीव रेनाल्ड के अनुसार हम ऐसी प्रौद्योगिकयों को विकसित करने में लगे हैं जो प्राकृतिक ध्वनि शब्दों को पहचान और उन्हें उत्पन्न कर सकती है। उन्होंने कहा, इससे कम्प्यूटर की बोलचाल की भाषा का विकास हो जाएगा और इस प्रौद्योगिकी का फैलाव हमारे घर, कार्यालय और फुर्सत के क्षणों तक हो जाएगा। उम्मीद है कि बातचीत पर प्रतिक्रिया देने वाली यह प्रौद्योगिकी व्यक्तिगत आवाज को पहचानने और शब्द ज्ञान, बोलने के तरीके और शाब्दिक अभिव्यक्तियों को पहचानने में सक्षम होगी। शेफील्ड विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर विज्ञान के थॉमस हेन के अनुसार भाषा की प्रौद्योगिकी समाज की मुख्य धारा में आने वाली है, लेकिन इसकी  सबसे बड़ी सफलता मनुष्यों की तरह बर्ताव करने में है।

सुबह-सुबह कॉफी नहीं सोच बनाती है सक्रिय 

सुबह एक कप कॉफी पीने के बाद आप शरीर में स्फूर्ति और दिमाग  में ताजगी का अनुभव  करते होंगे । लेकिन यकीन मानिए यह असर कॉफी का नहीं, आपकी सोच का है।  एक अध्ययन में शोधकर्ताओं  ने कहा है कि सुबह कॉफी पीने के बाद लोग खुद को तरोताजा महसूस करते हैं ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे सोचते हैं कि कॉफी से उनमें ताजगी भर गई है।  

ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने दिन में कम से कम दो कप कॉफी पीने वाले 88 लोगों पर शोध किया। इन लोगों की उम्र 18 से 47 साल के बीच थी।

शोधकर्ताओं ने इन्हें दो समूह में बांटा। पहले समूह को कैफीन युक्त कॉफी दी गई, लेकिन उनसे कहा गया कि यह कैफीन रहित है। इससे उलट दूसरे समूह को कैफीन रहित कॉफी बोलकर कैफीन युक्त कॉफी पिलाई गई।  कुछ दिन तक इस प्रक्रिया में देहराते हुए प्रतिभागियों के मस्तिष्क में चल रही गतिविधियों का विश्लेषण किया गया। साथ ही उन पर कुछ टेस्ट भी किए गए, जिसमें दिमागी कसरत की जरूरत थी। शोधकर्ताओं  ने पाया कि जिन लोगों को कैफीन युक्त कॉफी कहकर कैफीन रहित कॉफी दी गई थी, उन्होंने टेस्ट में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया। वहीं कैफीन रहित कॉफी समझ कर कैफीन युक्त कॉफी पीने वाले लोगों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इससे पता चलता है कि कॉफी का असर पूर्वाग्रह पर निर्भर करता है। लोग सोचते हैं, कॉफी पीने से दिमाग ज्यादा सक्रिय हो जाएगा।  

आधुनिक समाज को सौर तूफान से खतरा 

पिछले  दिनों सूर्य पर उठे एक मामूली तूफान ने धरतीवासियों को चिंता में डाल दिया था लेकिन यह आखिरी नहीं था।  जानकारों के अनुसार धरती ने पिछले दिनों जिस प्रकार के भू&चुम्बकीय तूफान का सामना किया था वैसे आगे भी आएंगे । इतना ही नहीं अगला तूफान इतना विध्वंशकारी हो सकता है जितना धरती ने पहले कभी नहीं देखा है। 

वैज्ञानिकों  ने चेताया है कि अगला सौर तूफान आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह सैटेलाइट सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है, जिस पर हम नौ&परिवहन प्रणाली, टेलीकम्यूनिकेशन तथा कम्प्यूटर को नेटवर्क से जोड़ने के लिए पूरी तरह निर्भर हैं।  

अमेरिकन एसोसिएशन एडवांसमेंट ऑफ साइंस की सालाना बैठक में जानकारों ने बताया कि अगला सौर तूफान इतना विध्वंसकारी होगा कि सैटेलाइट काम करना बंद कर सकते हैं, स्टॉक मार्केट धाराशायी हो सकते हैं और हो सकता है कि एक माह तक हमें बिना बिजली के रहना पड़े।   

यह स्थिति और भी भयानक इसलिए हो सकती है, क्योंकि अगले 11 साल में सौर चक्र अत्यधिक सक्रियता की ओर बठ जाएगा। नेशनल ओशएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन की जैनी ल्यूबशेंकी कहती हैं कि अब समय नहीं रहा कि हम 'ऐसा हुआ तो ............... पर बात करें । अब समय कब और कितना बड़ा पर बात करने का है । इससे पहले हमने 10 साल पहले बड़ा सौर तूफान देखा था, लेकिन तब दुनिया आज से बेहद अलग थी । अब सेल फोन हमारे जीवन का जरूरी अंग बन गए हैं। ये 10 साल पहले भी थे, लेकिन हम अलग&अलग चीजों के लिए इन पर इतना निर्भर नहीं थे।

इसके अलावा आज ऐसी और कई तकनीकें हैं जो सौर तूफान से प्रभावित हो सकती हैं। जानकार मानते हैं कि वर्तमान समय में दुनिया की कमजोरी की जड़ ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम में है जो नौ&परिवहन में मदद करते हैं। साथ ही, कम्प्यूटर नेटवर्क और इलेक्ट्रिक उपकरणों को समकालीन बनाते हैं। हालांकि, जानकारों ने साफ किया है कि तूफान की आशंका से भयभीत होना स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

बिना चीर-फाड़ के पोस्टमॉर्टम

लीसेस्टर यूनिवर्सिटी के फॉरंसिंक पैथालॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट ने ऐसी तकनीक का विकास किया है, जिससे पोस्टमॉर्टम के लिए चीर&फाड़ की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे  मौत  की वजह जानने में आसानी से मदद मिलेगी  और शव से छेड़छाड़ भी नहीं करना होगी।

कैसे होगी ऑटोप्सी

मृत शरीर की जांच के लिए गले के पास छोटा से छेद दिया जाएगा। इसके जरिए एक छोटा उपकरण भेजकर हृदय की जांच होगी और कैमिकल देकर पूरे शरीर का सीटी स्कैन किया जा सकेगा। उम्मीद की जा रही है कि इस तकनीक से 80 फीसदी मामलों की जांच में सफलता मिलेगी।

सस्ती तकनीक

चीफ फारेंसिक पैथालाजिस्ट प्रो. गाय रूट्टी  के अनुसार इस तकनीक से शव के हृदय की नसों का परीक्षण करने में मदद मिलेगी। यह बेहद सस्ती तकनीक है और प्राकृतिक या अप्राकृतिक मौतों की वजह जानने में मदद करेगी ।

आस्था को चोट नहीं पहुंचेगी

यह तकनीक ढूंढने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनियाभर  में पोस्टमॉर्टम को घृणा से देखा जाता है। कई मामलों में मृतक से जुड़ी  आस्था जांचकर्ताओं की जांच में रोड़ा बन जाती है। ऐसे में नई तकनीक ज्यादा स्वीकार की जाएगी।

चुम्बक करेगा मस्तिष्क का इलाज

जल्द ही चुंबक से मस्तिष्क संबंधी बीमारियों का इलाज किया जाएगा। वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में चुबकों के इस्तेमाल की एक तकनीक विकसित करने का दावा किया है।

ऑस्ट्रेलियन न्यूरों मस्क्युलर रिसर्च इंस्टीट्यूट के नेतृत्व में एक  अंतरराष्ट्रीय दल ने मस्तिष्क संबंधी बीमारियों के उपचार के मामलों में चुम्बकों की उपयोगिता पर शोध किया है। शोधकर्ताओं  ने कहा कि वह उपचार की इस पद्धति से दिमागी दौरों और मस्तिष्क से जुड़ी अन्य समस्याओं से उबारने में जल्द ही सफलता हासिल कर सकते हैं। इस पद्धति  में मस्तिष्क को एक चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित किया जाता है।

दल का नेतृत्व कर रहे प्रोफेसर गैरी थिकबूम ने कहा कि मस्तिष्क अत्यंत  लचीला होता  है। जब कोई आघात या दौरा उसे क्षति पहुंचाता है तो वह खुद उसकी भरपाई करने में जुट जाता है।  उन्होंने कहा, वे मस्तिष्क  की खुद से व्यवस्थित करने संबंधी क्षमता बढ़ाने  के लिए प्रयास कर रहे हैं ताकि पार्किंसन जैसी बीमारियों के बाद उबरा जा सके। उपचार की इस पद्धति में कुंडली नुमा उपकरण को रोगी से सिर के करीब रखा जाता है, जो सावधानी पूर्वक मस्तिष्क के बाहर चुंबकीय क्षेत्र पैदा करता है। इससे मस्तिष्क के अंदर एक धारा  प्रवाहित होती है। 

ट्यूमर से निजात दिलाएगा गाजर

गाजर और शकरकंद स्तन कैसर के इलाज में मददगार साबित हो सकते हैं। एक नए शोध के मुताबिक, गाजर और शकरकंद में पाया जाने वाला अम्ल रेटिनॉइक एसिड महिलाओं में स्तन कैंसर की कारक कोशिकाओं में होने वाले शुरूआती  बदलावों को रोक सकता है। यह अम्ल विटामिन ए से निकलता है। कोशिकाओं के विकास, प्रसरण और जीवन को प्रभावित करने वाला रसायन त्वचा को फिर से युवा बनाने के काम आ सकता है। इस रसायन की एक छोटी एंटी रिंकल (झुर्रिया मिटाने वाली) क्रीम में भी इस्तेमाल की जाती है । वैज्ञानिकों का कहना है कि अनुसंधान का लक्ष्य इस तरह के रसायनों की मदद से कैंसर का इलाज खोजना है।

ब्रेन स्ट्रोक रोक सकता है केला

रोजाना तीन केले खाने से ब्रेन स्ट्रोक का खतरा 21  प्रतिशत तक कम हो सकता है । वैज्ञानिकों ने  सलाह दी है कि रोज नाश्ते, लंच और डिनर में एक&एक केला खाना चाहिए। एक ताजा शोध में वैज्ञानिकों ने  पिछले साठ सालों के दौरान कैले पर किए अध्ययन का आकलन किया। वैज्ञानिकों का मानना है कि रोज खाने में 1,600 मिलीग्राम पोटेशियम की मात्रा लेने से स्ट्रोक का खतरा कम किया जा सकता है । औसतन एक केले में 500 मिलीग्राम पोटेशियम होता है। यह ब्लड प्रेशर को निम्न करता है और शरीर में ल्यूड को नियंत्रित करता है। शरीर में पोटेशियम की कम मात्रा लेने से अनियमित दिल की धड़कन जलन, चक्कर आना और डायरिया हो सकते हैं। 

डायबिटीज कम करता है बादाम

बादाम का सेवन करने से डायबिटीज और दिल के खतरे को रोका जा सकता है। एक नए शोध के दौरान कुछ लोगों को छह सप्ताह तक बादाम खाने को दिए गए ताकि शरीर पर उनके प्रभाव का आकलन किया जा सके। 
अध्ययन से पता चला कि बादाम खाने से लोगों के डायबिटीज स्तर में काफी सुधार हो गया। साथ ही उनके कोलेस्ट्रॉल स्तर में भी कमी आई। यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड डेनटिस्ट्री ऑफ न्यू जर्सी के विशेषज्ञों ने किया। शोध कर्ता डॉ. माइकल वाइन के अनुसार 'शोध से  साबित हो गया है कि खानपान के जरिए डायबिटीज और दिल की बीमारी को रोका जा सकता है।

कृत्रिम रेटिना से मिलेगी आंखों को रोशनी 

अब किसी नेत्रहीन और रोशनी खोते वृद्ध की आंखों के लिए नेत्रदान की बाट नहीं जोहनी पड़ेगी। वैज्ञानिकों ने लैब में स्टेम सेल से रेटिना बना लिया है। आँख में दिखने वाली प्रकाश के लिए अतिसंवेदनशील और काली बॉल की तरह दिखने वाली फिल्म को रेटिना कहा जाता है । कुछ ही सालों में जन्म से और वृद्धावस्था में आने वाली अंधेपन से लोगों को निजात मिल सकेगी। रेटिना प्रकाश को ग्रहण कर दृश्य कोशिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क  को भेजता है ।  

कैसे बना रेटिना?

जापान के शोधकर्ताओं  ने कोबे के राइकेन सेंटर में भूण से स्टेम सेल लेकर उसमें प्रोटींस और अन्य रसायनों को मिलाकर इस कृत्रिम रेटिना का निर्माण किया है। हालांकि इस कृत्रिम रेटिना को अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं कहा जा सकता है  फिलहाल इस रेटिना को परखनली में एक खास दव में रखा गया है।

उंगलियों से नहीं दिमाग से चलेगा कम्प्यूटर

अब कम्प्यूटर को चलाने के लिए उंगलियों की जरूरत नहीं पड़ेगी।  वैज्ञानिकों  ने अब ऐसा कम्प्यूटर बनाने में सफलता हासिल कर ली है जिसे चलाने के लिए उंगलियों की जरूरत नहीं पड़ेगी। कम्प्यूटर पर कर्सर चलाने के लिए आपको दिमाग में बस सोचना पड़ेगा और क्रीन पर अपने&आप लिख जाएगा।

कैसे खास होगा कम्प्यूटर

यह कम्प्यूटर उनके लिए बेहद उपयोगी साबित होगा जिनको दिमागी चोट या स्ट्रोक की वजह से बोलने की शक्ति चली गई है। इस कम्प्यूटर को विकलांग व्यक्ति व्हीलचेयर या फिर रोबोटिक भुजा से चला सकेंगे। यह एक तरह से दिमाग को पढ़ने जैसा है। कम्प्यूटर आपके अंतर्मन में चल रहे संवादों को आधार बनाकर जानकारी देगा ।

ईसीओजी से बना कम्प्यूटर

इलेक्ट्रोकॉर्टियोग्राफ (ईसीओजी) तकनीक का प्रयोग करके मिर्गी के मरीजों  का दिमाग इलेक्ट्रोड के जरिए सीधे कम्प्यूटर से जोड़ दिया। कम्प्यूटर के सामने बैठे लोगों ने जैसे ही कुछ सोचा, कर्सर चल पड़ा।

बर्फ को जमने से रोका जाएगा

सर्दियों की भारी हिमपात के दौरान वायुयान पर जमती बर्फ रूकावट पैदा करती है, जिससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती  है। इस समस्या से निजात पाने के लिए हावर्ड के शोधकर्ताओं द्वारा एक नया और प्रभावी नैनो मैटेरियल विकसिक किया है जो जलज वाष्प को छितरा देता है और बर्फ को जमने से रोकता है। परीक्षण के तौर पर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं  ने वायुयान के बाहरी भाग पर पदार्थ का लेप चढ़ा कर बर्फ जमने को रोकने में सफलता प्राप्त की है। उनका दावा है कि इसे विभिन्न धातुओं के संपर्क  में लाकर उन पर लेपित किया जा सकता है। यूनिवर्सिटी से जारी रिपोर्ट के अनुसार आने वाले समय में इसका व्यावसायीकरण किया जाएगा।

अब मोबाइल तकनीक से मिलेंगे बिजली पानी

अब जल्द ही ऐसी मोबाइल तकनीक आ रही है जिससे आपको पानी और बिजली जैसी मूलभूत चीजें मिलेंगी। यह मोबाइल तकनीक गैर पीने योग्य पानी को पीने लायक तो बनाएगी ही साथ ही हाइड्रोजन से बिजली भी पैदा करेगी। पर्ड्यू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर जेरी वुडॉल के नेतृत्व में एक टीम ने एक ऐसी ही एल्युमिनियम मिश्रधातु बनाने का दावा किया है। यह एल्युमिनियम मिश्रधातु बिजली के साथ&साथ पीने योग्य पानी भी उपलब्ध कराएगी। यह तकनीक गावों और मिलिट्री ऑपरेशन में खासी कारगर रहेगी। यह तकनीक पानी पैदा नहीं करेगी। यह सिर्फ जो पानी पीने योग्य नहीं है उसे पीने योग्य बनाएगी। इस मिश्रण में  एल्यूमीनियम, गैलियम, इंडियम और टिन जैसी धातुं शामिल हैं। जब इस मिश्रण को खारे या मीठे पानी में डाला जाएगा तो यह पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं को बांट देती है। इस तरह प्राप्त हुई हाइड्रोजन को बिजली उत्पन्न करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में भाप पैदा होती है, जो पानी में किसी भी तरह के बैक्टीरिया को मार सकती है। इसके बाद पानी को प्यूरीफाई कर इसे शुद्ध पानी में बदल दिया जाएगा। वुडॉल कहते कि क्योंकि यह तकनीक खारे पानी में भी कार्य करती है इसलिए इसका प्रयोग समुद प्रयोगों के अलावा पानी के अंदर काम करने वाले रोबोटिक व्हीकल में भी हो सकता है।

यह तकनीक दूरदराज के उन इलाकों के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगी, जहां न तो पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध है और न ही वहां तक बिजली पहुंची है। वुडॉल के अनुसार इसका सबसे बड़ा फायदा है कि एल्यूमीनियम सस्ती धातु है। यह घातक भी नहीं है और दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा पाई जाने वाली
धातु है।

q संकलन : विनीता, रवि

qqq

 
 
पत्रिका में सुधार हेतु आप अपने सुझाव हमें ई-मेल के माध्यम से भेज सकते है।
साईट का निर्माण एवं रखरखाव आईसेक्ट वेब सेन्टर द्वारा किया गया है।