|
'रमन
प्रभाव' की
खोज से जुड़े
रोचक प्रसंग
शुकदेव प्रसाद
सोवियत भूमि नेहरु पुरुस्कार विजेता
सोवियत
भूमि नेहरू
पुरस्कार
विजेताडॉ. सी.वी.रमन
ऐसे पहले
भारतीय
वैज्ञानिक
थे जिन्हें
विज्ञान के
सर्वोच्च
पुरस्कार `नोबेल'
से सम्मानित
किया गया। 1930
में उन्हें
यह सम्मान 'प्रकाश
प्रकीर्णन
तथा रमन
प्रभाव' की
खोज के लिए
दिया गया।
उनके
कार्यों से
विज्ञान जगत
समृद्ध हुआ
है। सी.वी.
रमन की में
स्मृति 28
फरवरी को 'राष्ट्रीय
विज्ञान
दिवस' के रूप
में मनाया
जाता है।
ताकि
विज्ञान
क्षेत्र में
भारत की
उत्कृष्टता
को बनाया
रखा जा सके।
इस अवसर पर
हम यहाँ सी.वी.रमन
के जीवन से
जुड़े कई
रोचक
प्रसंगों का
उल्लेख कर
रहे हैं।
आज नोबेल
पुरस्कार से
कोई अनजान
नहीं। इस
पुरस्कार की
बड़ी
प्रतिष्ठा
है।
डाइनामाइट
के
आविष्कारक
वैज्ञानिक
अफ्रेड
नोबेल ने
शांति की
स्थापना एवं
विज्ञान के
विभिन्न
क्षेत्रों
में
जीवनोपयोगी
नूतन संधान
करने वालों
को पुरस्कृत
करने के लिए
अपार संपदा
छोड़ दी थी।
दानवीर
नोबेल के
सम्मान में
उन्हीं के
नाम का यह
पारितोषिक
प्रतिवर्ष 'नोबेल
फाउंडेशन` की
ओर से दिया
जाता है।
विज्ञान
की प्रमुख
शाखाओं
भौतिकी,
रसायन और
औषधि तथा
साहित्य एवं
विश्वशांति
के लिए यह
पुरस्कार
प्रतिवर्ष
प्रदान किया
जाता है। अब
अर्थशास्त्र
में भी
उल्लेखनीय
योगदान के
लिए यह
पुरस्कार
दिया जाता
है।
नोबेल
पुरस्कार
पाने वाले
पहले भारतीय
थे रवींदनाथ
टैगोर,
जिन्हें
उनकी कृति 'गीतांजलि`
पर 1913 में यह
पुरस्कार
दिया गया था।
यह पुरस्कार
पाने वाले
रमन दूसरे
भारतीय थे।
वैज्ञानिक
तो एकमात्र
थे ही। 1930 में
उन्हें 'प्रकाश
प्रकीर्णन '
तथा 'रमन
प्रभाव ' की
खोज के लिए
नोबेल
पुरस्कार
दिया गया।
कहा जाता है
कि रमन को
चार‚पांच
साल पूर्व ही
यह आभास हो
गया था कि
उन्हें
नोबेल
पुरस्कार
मिलने वाला
है। वस्तुत:
उनका कार्य
था ही ऐसा, अत:
उस ओर सब का
ध्यान जाना
लाजिमी था। 1924
में जब रामन्
रॉयल
सोसायटी के
फेलो
निर्वाचित
हो गए तो उस
खुशी में
कलकत्ता
विश्वविद्यालय
में एक
प्रीतिभोज
का आयोजन
किया गया।
भोज के दौरान
सर आशुतोष
हँसी‚मजाक
में पूछ बैठे,‚
'अब क्या?
'
जितना
संक्षिप्त
प्रश्न था,
उसी के
अनुरूप रमन
ने गंभीरता
से
संक्षिप्त
उत्तर भी
दिया, ''नोबेल
पुरस्कार।''
यह रमन का
अहम नहीं था,
अपितु अपने
कार्य की
गंभीरता के
प्रति उनका
आत्मविश्वास
था। इतना ही
नहीं, रमन ने 1930
में जुलाई
मास में ही
स्वीडन
यात्रा के
लिए समुदी
जहाज का टिकट
भी बुक करवा
लिया था,
जबकि
पुरस्कार
वितरण
समारोह
दिसम्बर में
होना था।
उन्हें अपने
कार्य पर
इतना भरोसा
था कि
उन्होंने
अग्रिम टिकट
ले रखा था
ताकि ठीक समय
पर समारोह
में उपस्थित
हो सकें।
रमन का
महत्त्वपूर्ण
कार्य
प्रकाश
संबंधी है।
उन्होंने
प्रकाश के
रंगों के
फैलने की
प्रकृति (प्रकीर्णन)
पर
महत्त्वपूर्ण
कार्य किया
है जो आज 'रमन
प्रभाव' के
नाम से
विख्यात है।
इसी कार्य पर
उन्हें
नोबेल
पुरस्कार
मिला था। इस
शोध की भी एक
कहानी है।
रमन 1921 में
पहली बार
विदेश गए।
कलकत्ता
विश्वविद्यालय
की ओर से रमन
लंदन में हो
रहे ब्रिटिश
राष्ट्रमंडल
के
विश्वविद्यालयों
के सम्मेलन
में भाग लेने
गए हुए थे।
भूमध्य सागर
में जहाज से
यात्रा करते
समय जब वह
डेक पर खड़े
थे तो पानी
का रंग देखकर
चकित रह गए।
समुद का पानी
गहरा नीला
था। आखिर
पानी नीला
क्यों है, यह
उनके लिए
जिज्ञासा और
अनुसंधान का
विषय था।
इससे
पूर्व लार्ड
रैले ने आकाश
की नीलिमा की
व्याख्या इस
प्रकार की थी‚'वायुमंडल
में
विद्यमान
ऑक्सीजन और
नाइट्रोजन
के अणुओं
द्वारा
सूर्य
प्रकाश के
प्रकीर्णन
के कारण आकाश
नीला दिखाई
देता है।`
उन्होंने
सागर के पानी
के नीलेपन की
भी व्याख्या
करते हुए कहा
था‚'गहरे
समुद का गहरा
नीला रंग
आकाश की
नीलिमा की
परछाईं के
कारण होता
है। पर रमन को यह व्याख्या संगत प्रतीत नहीं हुई।
रमन ने इस बारे में लिखा है-'1921 की गर्मियों में मुझे यूरोप यात्रा में भूमध्य सागर का अद्भुत नीला रंग देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यह बात असंगत नहीं लगी कि यह चमत्कार जलकणों द्वारा सूर्य के प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण होता है। इस व्याख्या की परीक्षा के लिए उचित ही था कि तरल पदार्थों में प्रकाश विस्तार करने वाले नियमों की जांच की जाय। इस उद्देश्य से सितम्बर, 1921 में कलकत्ता आते ही कुछ प्रयोग किए गए। शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि जिस उद्देश्य के लिए ये प्रयोग किए गए हैं, उनका उस उद्देश्य से अधिक महत्व है कि इसमें खोज का क्षेत्र असीम है। ऐसा लगा कि प्रकाश प्रकीर्णन का अध्ययन शायद भौतिकी और रसायन विज्ञान की गहन समस्याओं में ले जाये। यही वह विश्वास था जिसने इस विषय को कलकत्ता लौटने पर हमारी गतिविधियों का प्रमुख विषय बना दिया।`
अगले 7 वर्षों तक रमन अपने विद्यार्थियों के साथ इस अध्ययन में जुटे रहे और 1928 में समाधान ढूंढ़ ही निकाला। यह खोज आज 'रमन प्रभाव` के नाम से विख्यात है। वास्तव में पानी अथवा अन्य किसी दव से परावर्तित होता हुआ प्रकाश अपने मूल रंगों के अतिरिक्त अपने साथ सर्वथा नए रंगों के समूह भी ले आता है। किसी तरल या पारदर्शी वस्तु में प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण नए रंग या विकिरण की उत्पत्ति वस्तुत: नई खोज थी।
रमन ने बेंजीन द्वारा प्रकीर्णित प्रकाश के प्रतिबिंब में नीले‚हरे क्षेत्र में एक चमकीली पट्टी देखी। यह एक नई बात थी। अत: उन्होंने इस प्रयोग को कई तरल और ठोस पदार्थों के साथ दोहराया। रमन को प्रकीर्णित प्रकाश के प्रतिबिंब में बहुत‚सी गहरी पट्टियां देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। वास्तव में ये पट्टियां नई रश्मियों या विकिरण की द्योतक थीं जो कि पहले मर्करी ऑर्क के प्रकाश में दिखाई नहीं पड़ी थीं। वस्तुत: यह नया प्रभाव तब उत्पन्न हुआ जब रमन ने आपतित किरण के मार्ग में फिल्टर लगाकर संचरण क्षेत्र को और संकीर्ण कर दिया था। तभी नई रश्मियां रमन ने देखीं। यह प्रयोग 28 फरवरी, 1928 को संपूर्ण हुआ और अगले दिन यानी 29 फरवरी, 1928 को एसोसिएटेड प्रेस के सामने रमन ने अणुओं द्वारा प्रकीर्णित प्रकाश में 'नए विकिरण` की खोज की घोषणा की। यह खोज आगे चलकर युगांतरकारी सिद्ध हुई और इसे 'रमन प्रभाव` नाम दिया गया। इसी खोज पर रमन को 1930 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया।
नोबेल पुरस्कार लेने रमन अपनी पत्नी के साथ स्टॉकहोम पहुंचे। 10 दिसम्बर, 1930 को उन्होंने एक भव्य समारोह में पुरस्कार ग्रहण किया और अगले दिन अपने अनुसंधान पर एक परिचयात्मक व्याख्यान दिया। 'रमन प्रभाव` का प्रयोग भी करके दिखाया।
परंपरा के अनुसार पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में एक भोज का भी आयोजन किया जाता है। अत: व्याख्यान के दिन शाम को स्वीडन के महाराजा और महारानी ने पुरस्कार विजेताओं को एक शानदार भोज दिया।
रमन के वैज्ञानिक अनुसंधानों पर टिप्पणी करते हुए 'सापेक्षता सिद्धांत` के जनक और प्रख्यात नोबेल विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था,‚`'रमन पहले व्यक्ति थे, जो यह जान सके कि पदार्थ के भीतर फोटॉन (प्रकाश मात्रा) की ऊर्जा का आंशिक रूपांतरण हो सकता है। मुझे आज भी ठीक से स्मरण है कि जब बर्लिन कांग्रेस में रमन मौजूद थे, तो उनकी खोज ने हम सब पर कैसा गहरा प्रभाव डाला था।`'
कुछ-कुछ ऐसा ही विचार लार्ड रदरफोर्ड जैसे प्रख्यात भौतिकीविद् ने भी व्यक्त किया था,‚`'सर रमन प्रकाश विज्ञान‚खासकर प्रकाश प्रकीर्णन की परिघटना‚के एक प्रमुख अधिकारी विद्वान हैं। उन्होंने खोजा कि प्रकाश का रंग प्रकीर्णन द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है। कुछ समय पहले इसके बारे में अनुमान किया गया था लेकिन परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा नहीं जा सका था। पिछले दशक में प्रयोगात्मक भौतिकी में जो तीन‚चार उच्च श्रेणी के अनुसंधान हुए हैं, `'रमन प्रभाव'` की गणना उन्हीं श्रेणी में होनी चाहिए।`
रदरफोर्ड ने आशा प्रकट करते हुए यह भी कहा था कि ठोस पदार्थों के अध्ययन में यह अनुसंधान बहुत सशक्त साधन सिद्ध हुआ है और आगे भी होगा।
सी वी रमन संक्षिप्त जीवन वृत्त

1888 : |
7 नवम्बर, तिरुचिरापल्ली में जन्म। |
1907 : |
एम.ए., मदास विश्वविद्यालय। इसी वर्ष कलकत्ते में डिप्टी एकाउंटेंट जनरल के रूप में नियुक्ति। |
1909 : |
रंगून में स्थानांतरण और 1910 में नागपुर में स्थानांतरण। |
1911 : |
एकाउंटेंट जनरल के रूप में पदोन्नति और कलकत्ते में नियुक्ति। |
1917 : |
जुलाई माह में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के पहले पालित प्रोफेसर। इस पद पर 1932 तक कार्यरत। |
1919 : |
इंडियन एसोसिएशन फॉर दि कल्टीवेशन ऑफ साइंस, कलकत्ता के मानद सचिव। |
1921 : |
पहली विदेश यात्रा। समुद के पानी के नीले रंग से 'रमन प्रभाव` के खोज की प्रेरणा। |
1924 : |
लंदन की रॉयल सोसायटी के फेलो (एफ.आर.एस.) निर्वाचित। इसी साल दूसरी विदेश यात्रा। |
1928 : |
जनरल प्रेसीडेंट‚इंडियन साइंस कांग्रेस। |
1929 : |
अंग्रेज सरकार से 'सर` की खिताब। |
1930 : |
भौतिकी का नोबेल पुरस्कार। रॉयल सोसायटी का ह्यूज मेडल। |
1932 : |
आनरेरी डाक्टरेट, पेरिस विश्वविद्यालय। इसी वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय के पालित प्रोफेसरशिप से त्याग पत्र। |
1933 : |
एम.ए., मदास विश्वविद्यालय। इसी वर्ष कलकत्ते में डिप्टी एकाउंटेंट जनरल के रूप में नियुक्ति। |
1937 : |
निदेशक के पद से त्यागपत्र और अगले 11 वर्षों तक भौतिकी के प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में कार्यरत। नवम्बर 1948 में अवकाश ग्रहण। |
1934 : |
इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज (भारतीय विज्ञान अकादमी), बंगलौर की स्थापना। जीवनपर्यंत इसके संस्थापक अध्यक्ष,अकादमी के भवन का निर्माण कार्य 1948 में पूर्ण और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से अवकाश के बाद इसी अकादमी में शोधरत। रमन की स्मफति में अब इसे 'रमन शोध संस्थान` कहा जाता है। |
1935 : |
मैसूर के महाराजा द्वारा 'राज सभा भूषण ' का अलंकरण। |
1948 : |
राष्ट्रीय प्रोफेसर। |
1951 : |
फिलाडेल्फिया इंस्टिट्यूट से फ्रैंकलिन मेडल। |
1954 : |
देश के सर्वोच्च नागरिक अलंकरण 'भारत‚रत्न` से राष्ट्रपति द्वारा विभूषित। |
1957 : |
सोवियत संघ से 'अंतर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार`। इसके अतिरिक्त विभिन्न कालक्रमों में पेरिस, फ्रीबर्ग और ग्लासगो विश्वविद्यालयों तथा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों यथा‚ढाका, कलकत्ता, बनारस, इलाहाबाद, मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, मदास, मैसूर, उस्मानिया, पटना तथा श्री व्यंकटेश्वर से डाक्टरेट की मानद उपाधियां। |
1970 : |
21 नवम्बर को 82 वर्ष की अवस्था में महाप्रयाण। |
135/25-सी, छोटी बाघाड़ा, (एनीबेसेंट स्कूल के पीछे), इलाहाबाद-211002
सी,
छोटी
बाघाड़ा, एनीबेसेंट
स्कूल के
पीछे)
इलाहाबाद- |