पहले सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण को लेकर अनेक किस्म की भ्रांतियां एवं
अंधविश्वासों का बोलबाला था। लेकिन अब हम जान चुके हैं कि सूर्य एवं चंद्र
ग्रहण दोनों ही खगोलीय घटनाएं हैं। अलबत्ता यह प्रश्न शायद हमारे मन में
विरले ही उठता हो कि क्या पफथ्वी केअलावा सौर मंडल के अन्य ग्रहों पर भी
ग्रहण लगते हैं?असल में, हमारे सौरमंडल के अन्य ग्रहों पर ग्रहणों की
स्थिति जानने के लिए अधिक वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किए गए हैं। इसका सबसे बड़ा
कारण यह है कि ऐसे अध्ययनों की कोई खास व्यवहारिक या मूलभूत उपयोगिता नहीं
है। लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि कुछ ग्रहों पर सूर्य या चंद्र ग्रहण
जरूर लगते होंगे। सौर मंडल का सबसे विशाल ग्रह बफहस्पति है जिसके गोले का
औसत व्यास करीब 1,42,800 किलोमीटर है। इस ग्रह की सूर्य से दूरी लगभग 77
करोड़ 80 लाख किलोमीटर है। बफहस्पति का "एक दिन" हमारे केवल 9 घंटे 50 मिनट
के बराबर होता है जबकि इसका "एक वजा" हमारे 11.9 वर्षों के बराबर होता है।
बफहस्पति एक विशाल गैस का गोला है जो मुख्य रूप से हाइडजन और हीलियम से बना
है। लेकिन इसके वायुमंडल में थोड़ी मात्रा में मीथेन और अमोनिया भी मौजूद
है। बफहस्पति जैसे ग्रहों, जो मूल रूप से गैस के गोले हैं, को जोवियन
प्लेनेट्स भी कहते हैं। जोवियन प्लेनेट्स में बफहस्पति के अलावा शनि,
यूरेनस तथा नेप्च्यून शामिल हैं।
अब तक बफहस्पति के 63 चांदों यानी उपग्रहों के बारे में जानकारी मिली
है। जैसा कि हम जानते हैं, किसी भी ग्रह का चंद्र या उपग्रह उसके
इर्द-गिर्द घूमता है। बफहस्पति के चार भीतरी उपग्रहों को सबसे पहले गैलीलियो
ने 1609 में अपनी दूरबीन की मदद से देखा था। ये चारों उपग्रह हैं- आयो,
यूरोपा, गैनीमेड और कैलिस्टो। ये चारों उपग्रह बफहस्पति की लगभग उसी तल में
परिक्रमा करते हैं जिसमें कि बफहस्पति सूर्य की परिक्रमा करता है। इन
उपग्रहों पर लगने वाले ग्रहणों को धरती से देखा गया है हालांकि चौथे उपग्रह
कैलिस्टो पर कभी-कभार ही ग्रहण लगता है। खगोल विज्ञान में ग्रहण जैसी दो और
स्थितियां होती हैं जिन्हें ऑकल्टेशन (उपग्रह) और टजिट (पारगमन) कहते हैं।
जब कोई बड़ा खगोलीय पिंड अपने से बहुत छोटे आकार के पिंड के पीछे छिपा
दिखाई देता है तो इसे ऑकलटेशन कहते हैं। उदाहरण के लिए, चंद्रमा के पीछे
किसी तारे, निहारिका या ग्रह का छिप जाना। टजिट यानी पारगमन वह अवस्था कही
जाती है जब कोई छोटा खगोलीय पिंड किसी बड़े खगोलीय पिंड की डिस्क यानी चकती
के ऊपर से गुजरता दिखाई देता है। हमारे सौरमंडल के बुध एवं शुक्र ग्रह
सूर्य के प्रति इसी किस्म के टजिट यानी पारगमन का प्रदर्शन करते हैं।
खगोलविदों द्वारा किए गए अध्ययनों के अनुसार बफहस्पति के चारों उपग्रहों
में ग्रहण (इक्लिप्स), तथा अपगूहन (आकल्टेशन) तथा पारगमन (टांजिट), ये तीनों
ही स्थितियां देखी जा सकती हैं। धरती से दूरबीन द्वारा बुध ग्रह का पारगमन
देखा जा सकता है। धरती से देखने पर ऐसा लगता है मानो सूर्य की चमकदार चकती
के ऊपर से कोई काला और गोल धब्बा गुजर रहा हो। इसे ही बुध का पारगमन कहते
हैं। शुक्र ग्रह के पारगमन को बिना दूरबीन की मदद के भी देखा जा सकता है।
इससे पहले 8 जून 2004 को शुक्र का पारगमन देखा गया था। अगला पारगमन 6 जून
2012 को देखा जाएगा। शुक्र के पारगमन के दौरान कुछ वैज्ञानिक अध्ययन भी किए
जाते हैं। सन् 1679 में प्रसिद्ध ब्रिटिश खगोलविद एडमंड हेली ने बताया था
कि शुक्र के पारगमन के दौरान पैरेलेक्स यानी लंबन का अध्ययन करके सूर्य की
सटीक दूरी ज्ञात की जा सकती है। 6 जून 2012 को होने वाले शुक्र के पारगमन
के दौरान भी कुछ महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने की योजना है। यहां
इस तथ्य को जानना रोचक होगा कि शुक्र के दो पारगमनों के बीच 8 वर्ष का
अंतराल होता है लेकिन दो पारगमन जोड़ों के बीच 100 वर्ष से भी अधिक का
अंतराल हो सकता है।
डॉ. पी.के.
मुखर्जी
सहायक
प्रोफेसर-भौतिकी, 43, देशबंधु सोसाइटी, 15 पटपड़गंज,
दिल्ली-110092
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