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              इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए अंक 188,वर्ष 22,फरवरी 2010
 
 
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विज्ञान का ज्ञाता : अल्बर्ट आइंस्टाइन 

संचार का दाता : अलैक्जेंडर ग्राहम बैल

अदभुत आधुनिक सिद्धांतों से दुनिया को चमत्कृत करने वाले और श्रेष्ठ वैज्ञानिक का दर्जा पाने वाले अल्बर्ट आइंस्टाइन का जन्म 14 मार्च, 1879 को जर्मनी के उल्म नामक शहर में एक साधारण यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता हरमन आइंस्टाइन धार्मिक प्रकृति के नहीं थे और एक जगह टिककर काम करना पसंद नहीं करते थे।

बालक अल्बर्ट 3 साल की आयु तक बोला नहीं। उसका खेल-कूद, बालसुलभ शैतानियों में मन नहीं लगता था। लोग उसे बुद्धू मानते थे। घर में माता उसे धार्मिक शिक्षा देती थी और स्कूल में शिक्षक सामान्य शिक्षा। अल्बर्ट को स्कूल का अनुशासित माहौल अच्छा नहीं लगता था।

उस समय की जर्मन शिक्षा पद्धति बच्चों के लिए रुचिकर व उत्साहवर्धक नहीं थी और अल्बर्ट बोर हो जाता था। जैकब आइंस्टाइन, जो एक कुशल इंजीनियर था, ने अल्बर्ट को गणित इस तरह पढ़ाना प्रारंभ किया कि उसकी बीजगणित और रेखागणित में रुचि बढ़ती चली गई। अब गणित उसे प्रिय लगने लगा।

सन 1900 में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने स्नातक की उपाधि हासिल की। हालांकि अब भी कई प्रोफेसर उसकी योग्यता पर संदेह ही करते थे, पर कुछ लोग उसकी गणित व भौतिकी में योग्यता के कायल थे।

अब अल्बर्ट ने ट्यूशन पढ़ाना प्रारंभ किया। कई बार उसे स्थानापन्न शिक्षक के रूप में पढ़ाने का अवसर मिल जाता था। 1901 में उसे स्विस नागरिकता भी मिल गई। 1902 में उसे स्विट्जरलैंड के पेटेंट कार्यालय में परीक्षक की नौकरी भी मिल गई। 1905 में अल्बर्ट ने प्रतिष्ठित जर्मन भौतिकी मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। उसी साल अणुओं के आकार-प्रकार संबंधी सिद्धांत पर अल्बर्ट आइंस्टाइन को ज्यूरिख विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की उपाधि दी।

एक साथ इतने सारे सिद्धांत, वे भी पुराने वैज्ञानिकों के सिद्धांतों के प्रतिकूल, जाहिर है, वैज्ञानिक-जगत में हलचल मच गई। कोई भी वैज्ञानिक इन सिद्धांतों को मानने के लिये तैयार नहीं हुआ, पर जगह-जगह चर्चा अवश्य छिड़ गई।

आइंस्टाइन ने अपने उच्चकोटि की गणित से समझाया कि तरल पदार्थ में छोटे कण दिशाहीन होकर दौड़ते हैं। दूसरे शोध-पत्र के बारे में उन्होंने समझाया कि आने वाला प्रकाश किकिरण की फ्रीक्वेंसी के अनुपात में होता है और वह गुच्छों के रूप में आता है। इससे न्यूटन के जमाने से चला आ रहा सिद्धांत कि प्रकाश की उर्जा लगातार तंरग के रूप में आती रहती है, गलत साबित हो गया। आंइस्टाइन दरअसल विद्युत चुंबकीय विकिरण की प्रकृति को समझना चाहते थे। उनसे तीसरे व चौथे शोध-पत्र का भी यही हाल था। लोग अब तक पदार्थ और ऊर्जा को अलग-अलग मानते थे। वे यह भी मानते थे कि पदार्थ का रूप परिवर्तित होता है, पर वह नष्ट नहीं होता है। यही मान्यता ऊर्जा के बारे में भी थी। पदार्थ को ऊर्जा में या ऊर्जा को पदार्थ में परिवर्तित करने की कल्पना किसी ने अब तक नहीं की थी।

आइंस्टाइन का गणित किसी को समझ में नहीं  आ रहा था। प्रायोगिक परिणामों द्वारा इस सिद्धांतों को उसपरिणामों द्वारा इस सिद्धांतों को उस समय तक सिद्ध नहीं किया गया था। फलत अल्बर्ट आइंस्टाइन पेटेंट फर्म में ही काम करते रहे। सबसे पहले प्रख्यात जर्मन वैज्ञानिक मैक्स प्लैंक को इन सिद्धांतों में कुछ सत्यता का आभास होने लगा। उधर आइंस्टाइन पेटेंट दप्तर में दूसरे दर्जे के अधिकारी के रूप में काम करते हुये गुरूत्वाकर्षण के क्षेत्र में भी काम करते रहे।  उन्होंने विश्व के निर्माण की प्रप्रिया को भी सामने रखा और कहा कि भगवान ने पृथ्वी या ब्रह्मांड की रचना नहीं की है। यह रचना एक निश्चित प्रम के तहत हुई है। एकाकी जीवन बिता रहे अल्बर्ट आइंस्टाइन को 1921 में नोबल पुरस्कार प्रदान किये जाने की घोषणा हुई।

वे अपने काम में इस कदर मशगूल रहते थे कि जब दिसंबर, 1922 में नोबल पुरस्कार लेने के लिए उन्हें स्वीडन बुलाया गया तो वे पहुँच नहीं सके। अपने अनोखे सिद्धांतों के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों, पदकों और सम्मानों से नवाजा गया। 1925 में कॉप्ले पदक मिला। 1926 में रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया। 1927 में उन्होंने मैक्स प्लैंक, नील्स बोहर, डी. ब्रोग्ली, श्रीडिन्जर आदि के साथ एक बड़ी कॉन्फ्रेस में भाग लिया।

1931 में जब आइंस्टाइन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर बने तो उन्होंने विज्ञान के बजाय विश्व-शांति की स्थापना के लिए ज्यादा समय देना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने युद्ध रोकने के लिए संगठन भी बनाया और फंड भी इकट्ठा किया। वे विश्व-निशस्त्राकरण के प्रबल पक्षधर थे। जब 1932 में विश्व-निशस्त्राrकरण सम्मेलन में अनुकूल फैसला नहीं हुआ तो उन्होंने इसकी कड़े शब्दों में निंदा कर डाली। अपने भारतीय कवि और नोबल पुरस्कार विजेता रवीन्दनाथ टैगोर से भी सत्य जैसे विषय पर लंबी चर्चा की। वे विश्वशांति के लिए किस कदर व्याकुल थे इस बात से जाहिर है कि 1944 में उन्होंने 1905 का अपना हस्तलिखित शोध-पत्र नीलाम किया और उससे मिले लाखों डॉलर शांति आंदोलन के लिए दान कर दिए। यह हस्तलिखित शोध-पत्र आज भी अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में सुरक्षित है। हालांकि आइंस्टाइन को नोबल पुरस्कार फोटॉन थ्योरी पर मिला था, पर उन्हें प्रसिद्धि मिली उनके सापेक्षता सिद्धांत के कारण। उन्होंने यह साबित किया कि पदार्थ, ऊर्जा आदि एक-दूसरे में बदलते रहते हैं।

एकांतप्रिय आइंस्टाइन एक महान चिंतक व दार्शनिक भी थे। मानव-कल्याण के प्रति समर्पित अल्बर्ट आइंस्टाइन युद्ध से नफरत करते थे। एक बार उनसे किसी ने पूछा कि तीसरा विश्वयुद्ध किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्रा से लड़ा जाएगा तो उन्होंने तुंत कहा कि तीसरे का तो पता नहीं पर चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों से लड़ा जाएगा क्योंकि तीसरे विश्वयुद्ध में यह उन्नत सभ्यता नष्ट हो जाएगी। विश्व फिर से पाषाण काल में आ जाएगा।

18 अप्रैल, 1955 को प्रिंस्टन के अस्पताल में इस महान वैज्ञानिक विभूति का निधन हो गया। उनके निधन के बाद भी  वैज्ञानिक उनके सिद्धांतों के आधार पर प्रयोग करते रहे और लेखक उनकी जीवनी आदि लिखते रहे और उनके अर्जित सिद्धांत लोगों के सामने लाते रहे। यह प्रप्रिया आज भी जारी है।

अलैक्जेंडर ग्राहम बैल और उनका टेलीफोन

प्राचीन काल से ही मनुष्य के मन में इच्छा विकसित हो चुकी थी कि वह अपने दूर शहर में रह रहे साथी से बात कर ले। इस चाहत की झलक हमारे पौराणिक साहित्य में भी है। इस चाहत को साकार किया अलैक्जेंडर ग्राहम बैल  नामक वैज्ञानिक ने, जिसने ऐसे परिवार में जन्म लिया था, जो विकलांगों के प्रति पूर्णत समर्पित था। ग्राहम बैल के दादा अलैक्जेंडर बैल ने भाषा के विकास और भाषा संबंधी त्रुटियों को दूर करने की दिशा में अभूतपूर्व काम किया था।

एलिजा ने 3 मार्च, 1847 को अलैक्जेंडर ग्राहम बैल को जन्म दिया। प्रारंभ में उस बच्चे का नाम अपने दादा के नाम पर ही सिर्फ अलैक्जेंडर बैल रखा गया। उन दिनों बैल दंपती स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग इलाके में ही रहते थे। बालक बैल (प्यार से अलेक कहा जाता था) के बड़े भाई का नाम मैलविले जैम्स (प्यार से मैली) और छोटे भाई का नाम एडवर्ड चार्ल्स (प्यार से टेड) था।

प्रारंभ से ही अलेक के अंदर कुछ अलग और कुछ नया बनने और कर दिखाने की इच्छा थी। उसने यह इच्छा व्यक्त भी की। उसके दादा अलैक्जेंडर बैल और पिता अलैक्जेंडर मैलविले बैल बधिरों और वाणी बाधितों की शिक्षा व सेवा के क्षेत्र में काफी नाम कमा चुके थे। इत्तफाक से 1858 के वसंत मौसम में बैल परिवार में   कनाडा के एक मेहमान अलैक्जेंडर ग्राहम आए। अलेक को वे सज्जन बहुत अच्छे लगे और उसने उनका नाम ग्राहम स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की। 11 वीं वर्षगाँठ पर उसके माता-पिता ने अलैक्जेंडर ग्राहम बैल स्वीकार कर लिया।

यहाँ ग्राहम को बड़ा आलीशान मकान मिला। उसे नए-नए फैशन के कपड़े मिले और साथ में अपने दादा के निर्देश पर वह शेक्सपियर जैसे महान लेखकों का साहित्य पढ़ने लगा। उसी दौरान मैलविले बैल तथा ग्राहम बैल सर चार्ल्स व्हीटस्टोन से मिले जो जाने-माने वैज्ञानिक थे। उन्होंने उन्हें अपनी बनाई हुई `बोलने वाली मशीन' दिखलाई। यह यांत्रिक मशीन लगभग मनुष्य की आव़ाज में बोलती थी। एडिनबर्ग आने के बाद मैलविले बैल ने अपने बेटों ग्राहम व मैली से वैसी ही मशीन तैयार करने को कहा। इसे तैयार करने में उन्हें काफी बाधाएँ आईं पर उन्होंने यह जरूर सीख लिया किया कि सफलता आसानी से नहीं मिलती है। उनमें धैर्य भी आ गया। अब वे लगातार विभिन्न प्रकार के प्रयोग करने लगे। जब उनकी मशीन तैयार हुई तो दोनों भाई बहुत खुश हुए। उन्होंने एक साल वेस्टन हाउस में बिताया और इस बार पूर्ण शिक्षक की भूमिका निभाई। उन्होंने भाषा विकास पर शोध भी किया और लंदन विश्वविद्यालय से कुछ पाठ्यप्रम भी किए तथा शहर के एक स्कूल में बधिरों को पढ़ाया भी।

दूसरी ओर ग्राहम बैल अपने पिता की गतिविधियों में भी दिलचस्पी ले रहे थे। मैलविले बैल ने एक पुस्तक तैयार की जिसमें पूरे विश्व की भाषाओं को समझाने का प्रयास किया गया था। इस पुस्तक में चित्रों के द्वारा दर्शाया गया था कि मानव की वाणी से निकलने वाले हर अक्षर व शब्द में जीभ की स्थिति कैसी होती है। दरअसल यह जन्म से बधिरों को बोलना-सिखाने का प्रयास था, पर ग्राहम बैल को यह फायदा हुआ कि वह  हिन्दी, अरबी, फारसी, उर्दू तथा अन्य कई भाषाओं के जानकार बन गए। हालांकि वे इन भाषाओं को बोल नहीं पाते थे, पर बधिरों को बोलना सिखाने में उन्हें महारत हासिल हो गई।

1872 से वे लगातार ध्वनि के सिद्धांत तथा टेलीग्राफ की कार्यप्रणाली का अध्ययन करते रहे। उन्होंने अनेक प्रकार के पदार्थों को धातु की पट्टी पर  लगाकर व उस पर कंपन उत्पन्न करके उसके जरिए तारों द्वारा दूर संकेत भेजने का प्रयास प्रारंभ किया। इसके लिए उन्हें कड़ा परिश्रम करना पड़ा और प्रारंभ में असफलता ही हाथ लगी।

धीरे-धीरे ग्राहम बैल ने दूसरे आविष्कारकों से प्रेरणा लेनी प्रारंभ की। वे ज्यादा परिश्रम करने लगे और अध्ययन में भी ज्यादा समय लगाने लगे। एक बार वे वाशिंगटन गए और वे जोसेफ हेनरी से मिले, जो प्रथम सचिव और स्मिथसोनियन संस्थान के निदेशक थे। अल्बानी में जन्मे हेनरी प्रिंसटन विश्वविद्यालय में लंबे समय तक भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर रहे थे। उन्होंने बिजली के व्यवहार के बारे में अनेक खोजें की थीं। जब ग्राहम बैले ने योजना उन्हें बताई तो हेनरी प्रसन्न हुए। ग्राहम बैल ने अपनी सीमाएँ भी उन्हें बताई और कहा कि वे उनका अब तक का शोध प्रकाशित करवा दें ताकि दूसरा व्यक्ति पूर्ण सज्जित फोन तैयार कर दे। हेनरी ने उन्हें हौसला बँधाया और अपने काम को पूरा करने की राय दी। उन्होंने बैल को बिजली के व्यवहार के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी भी दे दी।

उत्साहित बैल ने अपना काम जोर-शोर से प्रारंभ कर दिया। उन्हीं दिनों अर्थात् 1874 में बैल की मुलाकात थॉमस वॉटसन से हुई जो यांत्रिक उपकरणों का अच्छा जानकार था। वाटसन को ग्राहम बैल बहुत पसंद आए और ग्राहम बैल को भी एक अच्छा सहायक मिल गया। अब बैल जिस पुर्जे की ड्राइंग बनाकर देते थे, वाटसन उसे जल्दी तैयार कर देता था। वाटसन को ध्वनि और टेलीग्राफी के सिद्धांतों का भी अच्छा ज्ञान था। आखिर एक दिन दोनों की मेहनत रंग ले ही आई। 10 मार्च, 1876 को शुप्रवार का दिन था। ग्राहम बैल प्रातकाल से ही अपने प्रयोग में जुटे थे। उन्होंने बैल प्रयोगशाला से अपने घर के शयनकक्ष तक तार बिछा रखे थे और प्रयोग चल रहा था। बैल ने अपने साथी वाटसन को तारों के जरिये संदेश दिया "वाटसन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी आवश्यकता है।"

यह एक ऐतिहासिक संदेश था जो दुनिया में पहली बार तारों के जरिए भेजा गया था। जब वाटसन यह संदेश सुनकर बैल के पास आये तो ग्राहम बैल की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। उसके बाद दोनों ने जगह बदली और वाटसन ने एक पुस्तक के कई पृष्ठ पढ़कर बैल को सुनाए। इसके साथ ही टेलीफोन का जन्म हुआ। बाद के कर्षों में थामस एडीसन नामक प्रख्यात वैज्ञानिक ने टेलीफोन को आधुनिक रूप दिया और जनोपयोगी बनाया।

मजे की बात यह थी कि ध्वनि की दुनिया का यह अजूबा पहले पहल ग्राहम बैल ने तैयार किया जिन्होंने अपने जीवन में बधिरों की सेवा का व्रत लिया था और वे उन्हीं के उपयोग के लिए उपकरण बनाना चाहते थे पर बन गया टेलीफोन। दूसरी ओर इस टेलीफोन को आधुनिक और उपयोगी बनाने वाले वैज्ञानिक थॉमस एडीसन स्वयं बधिर थे और वे खुद तो इससे आने वाली आवाज नहीं सुन पाए, पर सुनने वालों को ऐसी सौगात दे गए जिससे दुनिया में संचार प्रांति का सूत्रपात हो गया। आविष्कारों में जुटने के बावजूद ग्राहम बैल का बधिरों के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ और वे नियम से बधिरों को पढ़ाते और सिखाते रहे। अब तक वे अविवाहित ही थे। 1876 में टेलीफोन कंपनी की स्थापना की गई और उसने टेलीफोन की सेवायें देना प्रारंभ कर दिया। इस नई कंपनी के अध्यक्ष हबार्ड थे और ग्राहम बैल तकनीकी निदेशक। पर ग्राहम बैल के जीवन में बमुश्किल आई यह खुशी ज्यादा दिन नहीं रही और ग्राहम बैल को पता चला कि ओहियो में जन्मे एलिशा-ग्रे ने वैसा ही टेलीफोन बना लिया और वेस्टर्न यूनियन टेलीग्राफ कंपनी ने उस टेलीफोन के आधार पर व्यापार करना प्रारंभ कर दिया। ग्राहम बैल को अब अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। 12 सितंबर, 1878 को अर्जी दायर की गई और 18 वर्ष तक ग्राहम बैल को 600 मामलों में अदालत में पेश होना पड़ा। हालाँकि इस बीच ग्राहम बैल को दो बातों से राहत मिल गई। 1879 में वेस्टर्न यूनियन ने बैल टेलीफोन कंपनी में शेयर मिलने के एवज में टेलीफोन के क्षेत्र से हट जाने का फैसला किया और 1888 में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने भी अलैक्जेंडर ग्राहम बैल को टेलीफोन का मूल और पहला आविष्कारक माना और उनके पेटेंट आवेदन को मान्यता प्रदान कर दी। 19 वर्ष की आयु में ही अंतर्राष्ट्रीय शोहरत प्राप्त करने वाले अलैक्जेंडर ग्राहम बैल आजीवन आविष्कार में लगे रहे। हालाँकि उनके बाद के आविष्कार टेलीफोन जैसे महत्वपूर्ण नहीं थे, पर जनोपयोगी थे। उन्होंने कृत्रिम श्वास देने के लिए एक वैक्यूम जैकट तैयार किया, जो बाद के दिनों में पोलियो पीड़ितों के लिए लोहे के फेफड़े के रूप में काम आता रहा। उन्होंने शरीर में फंसी गोली को ढूंढ़ने के लिए एक दूरबीनयुक्त प्रोब तैयार की, जो डॉक्टरों द्वारा तब तक प्रयोग की जाती रही जब तक एक्स-रे का आविष्कार नहीं हुआ। उन्होंने थॉमस एडीसन द्वारा आविष्कृत फोनोग्राफ (फोनोग्राम) में भी महत्वपूर्ण सुधार किए।

ग्राहम बैल का संसार को योगदान मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक ओर उन्होंने महत्वपूर्ण आविष्कार किए। दूसरी ओर वे बधिरों को विभिन्न प्रकार की शिक्षा देते रहे। इसके साथ ही तीसरी ओर वे विज्ञान के प्रचार-प्रसार में भी जुटे रहे। उन्होंने विज्ञान शीर्षक पत्रिका के प्रकाशन में योगदान किया। उन्होंने अपने ससुर गार्डिनर हबार्ड को नेशनल जियोग्राफिक सोसायटी की स्थापना में सहायता की।

ध्वनि संबंधी उनके महान आविष्कार के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए ध्वनि की मात्रा नापने की इकाई बैल रखी गई। चूँकि यह ज्यादा बड़ी थी अत इसका दसवाँ हिस्सा अर्थात् डेसीबैल ज्यादा काम आती है। इस बहाने विज्ञान का हर विद्यार्थी और कर्मी उन्हें समय-समय पर याद करते हैं।

 

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