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              इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए अंक 188,वर्ष 22,फरवरी 2010
 
 
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औचित्य और विवाद

एडमिरल गोर्शकोव

   q शुकदेव प्रसाद  

लगभग एक दशक की लंबी जद्दोजहद के बाद 20 जनवरी, 2004 को भारत-रूस के बीच हुए रक्षा समझौते के अंतर्गत रूसी विमान वाहक पोत 'एडमिरल गोर्शकोव' के भारतीय नौ सेना को मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया जिसका हमने भारतीय नामकरण 'आई.एन.एस. विक्रमादित्य' कर दिया है।

जब यह डील हुई थी, तब हमें बताया गया था कि ऐसा पोत किसी भी एशियाई मुल्क के पास नहीं है। तो क्या यह भारत की सैन्य क्षमता में समफद्धि का भावी पर्याय होगा? दरअसल भारत में पं. जवाहर लाल नेहरू के जमाने से ही पोत रखने की परंपरा रही है। विगत सदी के पचासादि के अंत में नेहरू ने ब्रिटेन से 15 साल पुराना पोत खरीदा था जिसे हमने आई.एन.एस. 'विक्रांत' नाम दिया था। वजा 1997 में यह रिटायर हो चुका है।

ऐसे में हमें एक पोत वांछनीय था जिसको हासिल करने के प्रयास प्राय एक दशक से चल रहे थे। 'विक्रांत' की विस्थापन क्षमता 18,000 टन थी जबकि 'विराट' की 28,000 टन है। रूसी पोत की क्षमता 44.50 हजार टन है और इस पर तैनात 'मिग' विमान हवा से हवा और हवा से सतह पर मारक प्रक्षेपास्त्रा से लैस होंगे।

'मिग' विमानों को भारत-रूस की संयुक्त मिसाइल 'ब्रह्मोस' से लैस किया जायेगा। फिलहाल इसके नौसैनिक रूपांतर और भू-रूपांतर विकसित किए जा चुके हैं और इनकी तैनाती भी हो चुकी है। विमान से छ़ोड़े जाने वाले इसके वायु सैनिक संस्करण का विकास किया जा रहा है और इसके इसी भावी रूपांतर को 'मिग' में फिट किया जायेगा। इस प्रकार 'मिग' विमान दुश्मन के किसी भी पोत या विमान को इस पोत के सैकड़ों किलोमीटर के आस-पास फटकने नहीं देंगे।

पनडुब्बियों के प्रहार से बचाने के लिए इस पोत पर पनडुब्बी नाशक 'कामोव-31' हेलीकाप्टर तैनात होंगे जो समुद्र के भीतर मौजूद पनडुब्बियों की निगरानी करते रहेंगे। 'गोर्शकोव' को शत्रु के मिसाइली हमले से बचाने के लिए इस पर प्रक्षेपास्त्र लगाने का भी प्रावधान किया गया है। यह मिसाइल इस्राइली 'बराक' या फिर रूसी 'काश्तान' कोई भी हो सकती है जो फिलहाल अभी सुनिश्चित नहीं हो पाया है। 30 समुद्री मील प्रति घंटे की रप्तार से गतिमान इस पोत पर 1950 नौसैनिक हमेशा तैनात रहेंगे। इस प्रकार इसे एक विशाल नौसैनिक अड्डा भी कह सकते हैं जो पूरे हिंद महासागर की मुस्तैदी से चौकसी करता रहेगा।

गोर्शकोव डील : क्या है विवाद?

दरअसल असली विवाद इसकी कीमत को लेकर उठ खड़ा हुआ है और वही इस विवाद की असल जड़ है। भारत-रूस के बीच 2004 में हुए मूल अनुबंध के अनुसार, 29 साल पुराना जो पोत हमें मिलने वाला है, इसे रूस ने हमें मुप्त देने की पेशकश की थी लेकिन इसके आधुनिकीकरण के लिये हमें 75 हजार करोड़ डालर देने पर सहमति हुई थी। इसकी मरम्मत और आधुनिक यौद्धिक जरूरतों के मद्देनजर इसे सज्जित करने में भारत को 67 करोड़ डालर खर्च करने होंगे और शेजा राशि उन 28 'मिग-29के' नामक लड़ाकू विमानों, 6 'कामोव-31' हेलीकाप्टरों और अन्य शस्त्र प्रणालियों के लिए देने होंगे जिनसे 'गोर्शकोव' को लैस किया जायेगा और ऐसा करने में करीब साढ़े चार साल लग जाएंगे, तब कहीं जाकर यह वजा 2008 तक भारतीय नौ सेना को सौंपा जा सकेगा।

यह सौदा तब एकदम माकूल था लेकिन रूस की मंशा बदल गयी और उसने इसकी कीमतें लगातार बढ़ानी शुरू कर दीं। यह उसकी आर्थिक मजबूरी भी है क्योंकि अब सोवियत संघ खंड-खंड हो चुका है और इसका उत्तराधिकारी रूस उतना सबल नहीं रहा।

रूस ने अपने गुजिश्ता जमाने के गहरे दोस्त को मदद की जो पेशकश की, वह निस्वार्थ नहीं है। गोर्शकोव डील का एक निहितार्थ यह भी था कि वहां बेकार बैठी गोदियों में लोगों को रोजगार मिलेगा और उसकी जर्जर अर्थव्यवस्था को त्वरा और दिशा मिलेगी। यह मामला रूस की घरेलू आर्थिक नीतियों से सीधे जुड़ा हुआ है। विगत दशक में रूस ने जो अपनी आर्थिक नीतियों का उदारीकरण किया, इसके फलस्वरूप रूस में रक्षा समेत अन्य निजी नागरिक कंपनियों को भी अपने उत्पादों में मूल्य निर्धारण करने की स्वत छूटें मिल गयीं और इसी का परिणाम है कि रूसी रक्षा कंपनियां भी अब मुनाफा कमाने के व्यामोह में संलिप्त हो चुकी हैं।

अजीब स्थिति हो गई है, भारत इस मकड़जाल में बुरी तरह उलझ गया है। भइ गति सांप छछूंदर केरी। भारत इससे उबर भी नहीं सकता, पीछे हट भी नहीं सकता, इसके अन्य कारण हैं जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

गोर्शकोव के आधुनिकीकरण की राशि अब 2.9 अरब डालर तक पहुंच चुकी है और अब भी भारत इस भुगतान के लिए तैयार हो जाता है, तब भी गोर्शकोव को भारत को सौंपने में चार साल की देरी हो चुकेगी। अब हमें यह पोत वजा 2012 तक मिल सकेगा। इस अरसे में बमुश्किल पोत के आधुनिकीकरण का 35 प्रतिशत काम ही पूरा हो सका है। मूल समझौता 7,000 करोड़ रुपये का था और अब हमें इसके लिए 11,000 करोड़ रुपये से भी अधिक कीमत चुकानी होगी।

खरीद का क्या है औचित्य?

भारत और रूस के बीच इस खरीद को लेकर जो डील 2004 में हुई थी, तब से लेकर आज तक रूस ने गोर्शकोव की कीमत तीन बार बढ़ायी है और अब फरवरी 2009 में इसकी अंतिम कीमत 2.9 अरब डालर मांगी थी। भारत 2.2 अरब डालर कीमत चुकाने को तैयार भो गया था, फिर भी यह डील अंजाम तक नहीं पहुंच सकी थी। दरअसल विवाद इसकी कीमत को ही लेकर उठ खड़ा हुआ है और वह भी इस मुद्दे को हवा दी कैग की एक रिपोर्ट ने। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में गोर्शकोव की खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय और नौसेना की तीव्र आलोचना करते हुए लिखा है कि रूस से विमान वाहक पोत गोर्शकोव जिस कीमत पर खरीदा जा रहा है, इसके बदले भारत को नया पोत ही मिल जाता। वास्तव में कैग का मानना है कि गोर्शकोव पोत के लिए किसी नए पोत की तुलना में 60 फीसदी ज्यादा भुगतान किया गया है। लेकिन इसके पलट कैग की रपट की  परवाह न करते हुए नौसेना प्रमुख एडमिरल सुरीश मेहता कहते हैं कि- ''मैं कैग की रपट पर टिप्पणी नहीं कर सकता, पर क्या आप हमें दो अरब डालर से कम कीमत वाला कोई विमान वाहक पोत खरीद कर दे सकते हैं? अगर हाँ, तो अभी मैं एक चेक साइन करने को तैयार हूँ।'' पर इस डील के और भी कई निहितार्थ हैं, जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। दरअसल इस दशक के आरंभ में भारत ने रूस से दो परमाणु पनडुब्बियों की खरीद की बातचीत की। रूस इसके लिए तैयार भी हो गया लेकिन उसने साथ ही यह शर्त भी रख दी कि हम भारत को परमाणु पनडुब्बी बेच सकते हैं लेकिन उसे गोर्शकोव पोत भी लेना होगा। इससे रूसी गोदियों को काम मिलता और रोजगार का सफजन होता। साथ ही रूस ने यह भी शर्त रखी कि गोर्शकोव पर तैनात किए जाने वाले लड़ाकू विमान 'मिग-29के' का एक स्क्वाडन (16 विमान) भी भारत को खरीदना होगा और इस प्रकार परमाणु पनडुब्बी की डील के साथ साथ रूस ने आयुध उत्पादक अपनी फैक्टियों को पुनर्जीवन देने का एक अवलंब भी पा लिया। यही है इस डील का निहितार्थ। भारत को चाहिए भी परमाणु पनडुब्बी और रूस को अपने लोगों के लिए रोजगार के नए-नए अवसर ताकि उसकी जर्जर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके।

अमेरिका या कोई भी यूरोपीय देश परमाणु पनडुब्बी की आपूर्ति के लिए कतई तैयार नहीं हैं, इसलिए इस मामले में हमें रूसी सहयोग की मात्र सराहना ही नहीं करनी होगी अपितु आभार ज्ञापन भी करना होगा, भले ही यह सौदा (गोर्शकोव) हमारे लिए महंगा साबित हुआ हो।

इसके बदले रूस ने भी अपनी कफढतज्ञता प्रदर्शित की है-भारत की परमाणु पनडुब्बी 'आई.एन.एस. अरिहंत' के निर्माणों मदद करके। अरिहंत के निर्माण में रूस के पनडुब्बी डिजाइन केन्द्र की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। इतना ही नहीं, अत्यंत गोपनीय ढंग से रूस के बीसों विशेजाज्ञों ने परमाणु पनडुब्बी अरिहंत के निर्माण में हमारी सहायता की है। कोई भी देश परमाणु संचालित पनडुब्बी बनाने में अपनी सलाहकार कंपनी को अपने विशेजाज्ञ भारत भेजने नहीं देता लेकिन रूस ने हमारे साथ ऐसा किया। रूस ने अरिहंत में प्रयुक्त होने वाले ऐसे स्टील की हमें आपूर्ति की जिसका निर्माण भारत में हो ही नहीं सकता। भारत भी अपने देश में गोर्शकोव से छोटे आकार का पोत बना रहा है जिसका फिलहाल नाम 'एयर डिफेंस शिप' रखा गया है। इसके निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। इसकी विस्थापन क्षमता 37,500 टन होगी जिसमें इलेक्टानिक युद्ध प्रणालियों समेत कई आक्रामक और रक्षात्मक प्रक्षेपास्त्र भी होंगे। गौरतलब है कि स्वदेशी विमान वाहक पोत के निर्माण में लगने वाले स्टील की आपूर्ति भी रूस ने ही की है। यदि रूस हमें यह सहयोग नहीं करता तो अपने स्टील कारखानों के बलबूते भारत विमान वाहक पोत बनाने का निर्णय भी नहीं लेता।

रूसी सहयोग के और भी कई आयाम

भारत-रूस मैत्री की एक दुर्लभ परंपरा रही है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के नाना क्षेत्रों में रूसी सहयोग की हम अवहेलना कर ही नहीं सकते अन्यथा आज अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर भारत जिस मुकाम पर है, वहां तक पहुंचने में हमें अभी कई और दशकों तक की प्रतीक्षा करनी होती।

प्रथम भारतीय उपग्रह 'आर्यभट', भारत के प्रायोगिक भू-प्रेक्षण उपग्रहों - 'भास्कर-1', 'भास्कर-2', सुदूर संवेदन उपग्रहों 'आई.आर.एस.-1ए, 1बी और 1सी' के प्रेक्षपण या कि स्क्वाडन लीडर राकेश शर्मा की अंतरिक्ष यात्रा रही हो, सभी की सफलता रूसी सहयोग पर ही मिल सकी है। भारत के परमाणु विद्युत केन्द्रा के लिए परमाणु ईंधनों की समय-समय पर आपूर्ति करके रूस ने उन्हें ठप्प होने से बचाया। यह ठीक है कि इसके लिए हमें कीमत चुकानी पड़ी लेकिन इस प्रतिस्पर्धी विश्व में शक्तिराष्ट्रों ने हमें मदद करना तो दूर, नाना प्रतिबंधों के दायरों में भारत को घेर कर हमारे कार्यक्रमों को बाधित करने की चेष्टाएं ही की हैं।

'गोर्शकोव' के लिए मात्र बढ़ी हुई कीमत को मुद्दा बनाना एकांगी दृष्टिकोण है। यदि यह डील भंवर जाल में फंसती तो इससे भारत के विज्ञान, प्रौद्योगिकी, रक्षा उपक्रमों, गैस उत्पादन में सहभागिता आदि नाना कार्यक्रम भी प्रभावित होते।

रक्षा सौदों के मामलों में भारत पहले खरीददार था लेकिन अब परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है, अब हम (भारत-रूस) समान भागीदार हैं। चाहे रूसी 'टी-90' टैंकों, लड़ाकू विमान सुखोई-30 एम.के.आई. की आपूर्ति और उनके तकनीकी ज्ञान का हस्तांतरण तथा भारत में उनके उत्पादन के अधिकार का मामला हो या कि भारत-रूस के संयुक्त उपक्रम से बनने वाली 'ब्रह्मोस' मिसाइल का मामला हो, हम रुसी सहयोग की अवहेलना कर ही नहीं सकते। अत इन तमाम सारे सहयोगों के दृष्टिगत 'गोर्शकोव' डील की आलोचना मात्र एकांगी दृष्टिकोण ही है और कुछ नहीं।

अंतत अंजाम को पहुंची गोर्शकोव डील

भारत और रूस के बीच गोर्शकोव की बढ़ी हुई कीमत को लेकर लंबे अरसे से चला आ रहा गतिरोध अंतत वजात 2009 में समाप्त हो ही गया और डील अपने अंजाम को पहुंची। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की दिली ख्वाहिश थी कि भारत-रूस मैत्री बरकरार रहनी चाहिए। इसके लिए पहल दोनों तरफ से हुई। रूसी सरकार ने अपनी सैन्य विपणन एजेंसी 'रोसोबोरोन एक्सपोर्ट (Rosoboronexport) को इसकी कीमत घटाने को कहा। उसने इसकी कीमत 2.9 अरब डॉलर से घटाकर 2.4 अरब डॉलर कर दी लेकिन भारतीय पक्ष थोड़ी छूट और चाहता था। अंततोगत्वा एक शिखर बैठक में भाग लेने के लिए डॉ. मनमोहन सिंह की 6 दिसंबर, 2009 को मास्को रवानगी से पूर्व 'नेवी दिवस' के अवसर पर 4 दिसबर, 2009 को नई दिल्ली में भारत और रूसी प्रतिनिधि मंडल के बीच चौथे दौर की उच्च स्तरीय वार्ता में 2.3 अरब डॉलर के भुगतान पर पूर्ण सहमति हुई और 6 दिसंबर, 2009 को डॉ. मनमोहन सिंह और रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने इस पर पक्की मुहर लगाकर गोर्शकोव डील पक्की कर दी।

उम्मीद है कि अब गोर्शकोव के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तीव्र हो जायेगी और निर्धारित समय पर यह पोत भारत को सौंप दिया जायेगा।

 

135/27-सी, छोटा बघाड़ा, (एनीबेसेन्ट स्कूल के पीछे),
इलाहाबाद-211-002

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