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इलेक्ट्रॉनिक्स आपके लिए अंक 211, वर्ष 24,फ़रवरी 2012
 
 
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विज्ञान कथाएं ही होंगी भावी लोककथाएं 

राजीव रंजन उपाध्याय
विज्ञान कथा लेखक

पुराकाल से ही मानव ने विचारों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने के साथ ही कथोपकथन की परंपरा का प्रारंभ किया होगा। इसमें उसके सुख-दुख संबंधी विचार, अन्य जीवन संबंधी अनुभूतियां, समस्याओं के निराकरण की चर्चा के साथ-साथ मनोरंजन की सहज कामना भी थी। इसी मनोविनोद‚मनोरजंन की कामना ने कथा को, कहानी को जन्म दिया होगा। विश्व की सभी सभ्यताओं ने अपनी सभ्यता संस्कृति  के साथ प्रौद्योगिकी का, तकनीकी विषयों का, उसने संबंधित सिद्धांतों का विकास किया था। इसी विकास क्रम के फलस्वरूप वे सभ्यताएं फूली‚फली थीं और कुछ कराल काल के गाल में समाहित भी हो गईं। परंतु हमारी भारतीय सभ्यता अपनी संस्कृति, भाषा और साहित्य को आज भी सतत सुरक्षित बनाए हुए है। इस सततता की पफष्ठभूमि में अनेक कारण हैं और उनमें से विशिष्ट कारक तत्त्व है हमारी वैचारिक आदान-प्रदान करने की पद्धति। वैचारिक आदान‚प्रदान व्यक्तिनिष्ठ हो सकते हैं और सामाजिक भी। वे विचार जीवन में गति और जीवंतता की वफद्धि करते हैं जो ऐसे विचार धारणाएं, कथोपकथन अमफत होकर जनमानस में व्याप्त हो जाते हैं दूसरे शब्दों में जो वैज्ञानिक अथवा सामान्य अवधारणाएं हैं, जनमानस के हृदय में निवास करती हैं, वे अक्षुण्ण रहती हैं, सतत रहती हैं। प्रारंभ में सहज जीवन की भांति ही कथाएं, कहानियां भी सीधी, स्पष्ट हुआ करती थीं। उनमें सरल, सहज, सामान्य अनुभूतियों का चित्रण रहा करता था। तभी तो विश्व की प्राचीनतम कथाओं में मन को आकर्षित करने की सहजता है। उदाहरण के लिए हम वेदों में व्याप्त अनेक कथाओं में से वफत्तासुर की कथा जो आज भी जनमानस में रची बसी है, को ही ले लें। वफत्त नामक असुर का वध इंद करते हैं, पर यह चर्चा लोकहित की है। इसका दूसरा पक्ष किसी को चौंकाने के लिए पर्याप्त है  इसी कथा में निहित भूगर्भीय पर्यावरणजनित परिवर्तन का चित्रण। अग्नि की उपासना उसके यशोगान से भारत का वैदिक साहित्य, प्राचीन ईरान के आवेस्ता के मंत्र भरे हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे अग्नि के चौर्य की कथाएं भारतीय पारसीक (ईरानी) और प्राचीन ग्रीक साहित्य में विद्यमान ही नहीं हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्राचीन काल में अग्नि को उत्पन्न कर सुरक्षित रखना दुष्कर कार्य रहा होगा। हमारा वैदिक साहित्य, सार्थवाहां की, अश्विनद्वय के चिकित्सकीय चमत्कारें की चर्चाओं से परिपूर्ण है। इस प्रकार की अनेकों विज्ञान कथाएं, आधुनिक विज्ञान कथाओं की आदि जननी कही जा सकती हैं। इसी कथोपकथन की सहजता का अनुभव हमें बौद्ध, जैन साहित्य के अनुशीलन से प्राप्त होता है। इन लोककथाओं को ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैनों ने अपने-अपने धर्मग्रंथों में स्थान देकर अपने सिद्धांतों का प्रचार किया। उदाहरण के लिए रोहणी जातक (भाग 1सं. 45)में रोहणी नामक दासी की कथा है, जिसने अपनी मां के सिर के ऊपर मंडराती हुई मक्खियों को उड़ाने के प्रयास में मूसल से प्रहार कर, उसे मार डाला। सहिचम्म जातक (भाग 2सं. 189) में, सिंह चर्म से आच्छादित गीदड़ को, उसका शब्द सुनकर किसान ने मार डाला, तो कटिदूसक जातक (भाग 3 सं. 321) में सिंगिल पक्षी और बंदर की कहानी है, जिसमें बंदर ने सिंगिल पक्षी का घोंसला तोड़कर नष्ट कर डाला। यह और अनेक लोक कथाएं भारतवर्षपंचतंत्र, हितोपदेश, कथा सरित्सागर, शुकसंतति, सिंहासन द्व.त्रिंशतिका, बैतालपंचविशतिका आदि ग्रंथों में पाई जाती हैं तथा ईसप की कहानियां अलिफ-लैला की कहानियां कलेला दमना की कहानियां आदि रूप में भी ग्रीक, रोम, अरब, फारस, अफ्रीका आदि सुदूर देशों में पहुंची हैं। इन कथाओं का उद्गम स्थल भारत वर्ष ही माना जाता है।

 

अधिकांश भारतीय विज्ञानवेत्ता इस तथ्य को अब स्वीकार करते हैं कि शून्य की उत्पत्ति भारतीय ऋषि गफत्समद की उर्वर मेधा का परिणाम है तथा सूर्य‚चंदमा एवं पफथ्वी का अपने अक्ष पर घूमने के सिद्धांत को भारतीय ऋषि एवं वैज्ञानिक आर्यभट्ट प्रथम ने ईसा की पांचवी सदी में अपनी आयु के 23 वें वर्ष में ही, यूरोपीय वैज्ञानिक कोर्पनिक्स से करीब 1000 वर्ष पूर्व सिद्ध कर दिया था ।

इसी प्रकार वैदिक साहित्य में विशेष कर ऋग्वेद में वर्णित विमानों की चर्चा पर पश्चिम के विज्ञान वेत्ता एवं उनके अंधानुसरण करने वाले भारतीय वैज्ञानिकगण विश्वास नहीं करते। इसी अवधारणा को निर्मूल सिद्ध करने हेतु श्री शिवकर बापू जी तलपदे ने राइट बंधुओं से लगभग 10 वर्षों पूर्व सन् 1895 ई में मुंबई के चौपाटी मैदान में, अनेक गणमान्य व्यक्तियों, जिनमें तत्कालीन बड़ौदा नरेश महाराजा सर सयाजी जी राव गायकवाड़ भी उपस्थित थे सम्मुख 'मरूत सखा' नामक वेद वर्णित विमान का उड्डयन कर, प्रदर्शन कर, सभी को चकित कर दिया था फलत: हमारे प्राचीन ग्रंथों में, पुराणों में, 'रामायण' एवं 'महाभारत' में कुछ तथ्यपूर्ण विज्ञान कथाएं भरी हैं । चाहे वे 'पुष्पक विमान` से संबंधित हो या राजा शाल्व के प्रलयंकारी, मारक विमान की या फिर श्रीकृष्ण के द्वारिका ध्वंस में उपयोग होने की चर्चा हो ।

हम सभी 'भागवत पुराण' में वर्णित राजा उत्तानपाद एवं धुव कथा से परिचित हैं । भारतीय ज्योतिष के चरमोत्कर्ष के समय में नक्षत्रों  के मानवीयकरण के प्रयास द्वारा ज्योतिष के ज्ञान को, जन सामान्य तक संप्रेषित करने हेतु इन कथाओं की रचना की गई थी। 'भागवत पुराण` में वर्णित है कि राजा धुव ने 36000 वर्षों  तक राज्य किया था। यह प्रत्येक ज्योतिष का छात्र जानता है कि धुव नक्षत्र एक राशि पर 3000 वर्षों तक रहता है । इस प्रकार 12 राशियों पर वह 36000 वर्षों तक रहता है यही इस नक्षत्र धुव का राज्यकाल है। धुव की   पत्नी‚नाम्नी जिसका अर्थ परिक्रमा भी होता है, से दो पुत्र 'वत्सर एवं कल्प` उत्पन्न हुए थे।

यह सर्वविदित है कि पफथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक वर्ष में पूरी करती है। यह अवधि वत्सर कहलाती है। इसी शब्द में संवत शब्द संश्लिष्ट  होकर संवत्सर बन गया है। सूर्य ब्रह्मांड के केंद को परिक्रमा एक कल्प में पूरी करता है। यही कल्प धुव की पत्नी भूमि का दूसरा पुत्र है । एक हजार चतुर्युगों का एक कल्प होता है।

भागवत पुराण में वत्सर की पत्नी स्ववीथी (अयन) के 6 पुत्र हैं। यही षड ऋतुं हैं जो वर्ष भर गतिमान रहती हैं। वत्सर के छठे पुत्र की पत्नी प्रभा हैं जिसके तीन पुत्र प्रात:, मध्यान्ह और सायं हैं। यह स्व‚स्पष्ट तथ्य दिन के प्रहरों से संबद्ध हैं। इसी प्रकार की पौराणिक कथाएं तारामंडल, चंदमा एवं वफहस्पति आदि नक्षत्रों से संबंधित हैं। संस्कृति की विविध कथाओं में, यंत्रों का, सचल सीढ़ियों का, यंत्रचलित नौकाओं का, धूमपूरित ऊपर उड़ने वाले गुब्बारों का सुंदर वर्णन मिलता है। यहां पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि धूम पूरित चर्म्मपुट, गैसपूरित गुब्बारों का प्रयोग उद्यन (670 ई.) के समय में बहुतायत से होता था। संक्षेप में विज्ञान समस्त तथ्यों को कथाओं का स्वरूप प्रदान कर हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों एवं साहित्याचार्यों ने जनमानस में विज्ञान का संप्रेषण करने में अविस्मरणीय योगदान दिया है।

उपर्युक्त सभी कथाएं मनोग्राही एवं आकर्षक ही नहीं है वरन प्रच्छन्न विज्ञान कथाएं हैं। इन लोक कथाओं के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन 'इन कहानियों  में कहानीपन की मात्रा इतनी अधिक है कि हजारों वर्षों से न जाने कितने कहने वालों ने इन्हें कितने ढंग से और कितनी प्रकार की भाषा में कहा है‚फिर भी इनका रसबोध ज्यों का त्यों बना हुआ है। यह रस बोध इन कथाओं की अमरता का द्योतक है एवं इस तथ्य की नाभि में निहित है कथानकों और कथोपकथन की सहजता।'

उड्डयन के अनेक प्रयासों को बिंबित करती कथाएं‚मिथकीय कथाएं प्राचीन ईरानी और मिश्र के कथा साहित्य में सुरक्षित हैं। आज आवश्यकता है इन कथाओं में निहित अर्थों एवं तथ्यों के विश्लेषण की।

आधुनिक विज्ञान के विकास ने पश्चिमी गोलार्द्ध में सर्वप्रथम आविष्कार एवं कल्पना के मिश्रण से उत्पन्न जनसामान्य के बौद्धिक मनोरंजन हेतु नवनीत सम आधुनिक विज्ञान कथाओं को जन्म दिया।

विज्ञान कथा के क्षेत्र में इसी प्रकार का अवदान एच.जी. वेल्स के उपन्यासों का रहा है । उनके विवरणों ने जनसामान्य को भविष्य की घटनाओं के विषय में सोचने को बाध्य कर दिया था। इनकी अनेक अवधारणाएं स्वरूप ग्रहण कर साकार हो चुकी है। यही नहीं मेरी शैली के 'फ्रेकस्टाइन' से आज कौन परिचित नहीं है।

हम सभी आज सैटेलाइटों  के बहुआयामी उपभोगों से परिचित हैं परंतु कितने लोगों को इस तथ्य का ज्ञान है कि सर्वप्रथम इनकी कल्पना आज के विख्यात विज्ञान कथाकार सर ए.सी. क्लार्क ने अपने वैज्ञानिक उपन्यास में की थी ।

इसी प्रकार आज सर्वमान्य डी.एन.ए., फिंगर प्रिंटिंग तकनीकी के उपयोगों, विशेषकर मानव हत्या के कारणों का सत्यापन करने के विषय में सर्वप्रथम  इन पंक्तियों के लेखक  ने अपनी विज्ञान कथा 'आधी रात का सूर्य' में किया था। श्याम विवरों अथवा ब्लेक होल्स को जन प्रचलित  बनाने में विज्ञान कथा एक सफल माध्यम सिद्ध हुई है। यह बहुत ही संभव है कि सर ए.सी. क्लार्क के उपन्यास 'फाउन्टेन ऑफ पेराडाइज'  में वर्णित  स्पेस एलीवेटर` जो सैटेलाइट से, स्पेस क्राप्ट्स को और अंतरिक्ष यात्रियों को एक वर्टिकल ट्रैक पर हजारों किलोमीटर की दूरी तक स्पेस में ले जाने में भविष्य में सफल हो सकता, इस अवधारणा को मूर्त स्वरूप देने में 'नासा'  के इंजीनियर और वैज्ञानिक कार्यरत हैं।

वस्तुत: आज के संचार प्रधान युग में, अधिकांश लोग‚सामान्य जन, क्लोलिंग इलेक्ट्रॉनिक पेपर, बायोटेक्नॉलॉजी और अन्य विज्ञान कथाओं में वर्णित तथ्यों से, उनके उपयोग से, उनके हानिकारक परिणामों से उसी प्रकार परिचित हैं और हो रहे हैं जैसे कभी‚यह कार्य हमारी 'पुराण कथाएं',  'हितोपदेश' अथवा ' पंचतंत्र' किया करते थे। मेरे विचार से सफल और अच्छी विज्ञान कथाएं मात्र हमारा मनोरंजन ही नहीं करतीं वरन वे हमें आने वाले समय में प्रौद्योगिकी सामान्य और तकनीकी विकास का दिग्दर्शन भी कराती हैं।  

                                                         

साभार : विकल्प, भारतीय पेट्रालियम संस्थान, देहरादून,

                                                  राजभाग अनुभाग द्वारा प्रसारित

                                                                                                                                                                                                      

 
 
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