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नैनो-टेक्नॉलॉजी से सुरक्षित और सक्षम बनेंगे जैव ईंधन
सैल्यूलोसिक
इथनॉल प्रोसेस में नैनो-टेक्नॉलॉजी का उपयोग करके सुधार लाने से
संबंधित यह शोध अपने में बेहद अहम है क्योंकि इससे जैव ईंधन की
कार्यकुशलता में व्यापक परिवर्तन आने की पूरी संभावना है। इससे न सिर्फ
पैसे की बचत होगी बल्कि पर्यावरणीय सुधार में भी मदद मिलेगी। भविष्य
में ऊर्जा के निरंतर बने रहने वाले स्त्रातों और ऊर्जा उत्पादन में
जैव ईंधन की बड़ी भूमिका होगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि देश
की ईंधन की भूख शुगर केन या सिर्फ अनाज से पूरी नहीं होने वाली है। ऐसे
में उभर रही तकनीकों की मदद से सेल्यूलोसिक बायोमास जैसी लकड़ी, घास,
स्टॉक आदि से इथनॉल बनाना समय की मांग है।
नैनो टैक्नॉलॉजी के उपयोग से जैव ईंधनों के पर्यावरणीय और वित्तीय
फायदों पर लुइसियाना टेक यूनिवर्सिटी में केमिकल इंजीनियरिंग के
एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जैम्स पाल्मर अपने सहयोगियों डॉ. यूरी लवोव,
डॉ.डेल स्नो और डॉ. हिशाम हेगाब के साथ शोध कर रहे है। सेल्यूलोसिक
इथनॉल प्रोसेस में नैनो-टेक्नॉलॉजी का उपयोग करके सुधार लाने से
संबंधित यह शोध अपने आप में बेहद अहम है क्योंकि इससे जैव ईंधन की
कार्यकुशलता में व्यापक सुधार आने की पूरी संभावना है। इससे न सिर्फ
पैसे की बचत होगी बल्कि पर्यावरणीय सुधार में भी मदद मिलेगी।
यह बात साफ हो चुकी है कि भविष्य में ऊर्जा के निरंतर बने रहने वाले
स्त्राsतों और ऊर्जा उत्पादन में जैव ईंधन की बड़ी भूमिका होगी। लेकिन
इसके साथ ही यह भी सच है कि देश की ईंधन की भूख शुगर कैन या सिर्फ अनाज
से पूरी नहीं होने वाली है। उभर रहीं तकनीकों की मदद से सेल्यूलोसिक
बायोमास जैसे लकड़ी, घास, स्टॉक आदि को इथनॉल में बदलने में सफलता मिल
रही है।
सेल्यूलोसिक इथनॉल और खाद्य उत्पादन में कोई प्रतिस्पर्द्धा नहीं
है। आज जैव ईंधन की वजह से जितनी अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन हो
रहा है, उसकी तुलना में अगर इस तकनीक का उपयोग किया जाए तो ग्रीन हाउस
उत्सर्जन में 86 प्रतिशत की कमी आ सकती है। कॉर्न इथनॉल की वर्तमान
तकनीकों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सिर्फ 19 प्रतिशत की कमी
आती है।
लुइसियाना टेक यूनिवर्सिटी में विकसित नैनो-टेक्नॉलॉजी प्रोसेस के
जरिए सेल्यूलोस को शुगर में बदलने वाले एंजाइम का उत्पादन संभव होता
है। इससे उसका कई दफा उपयोग भी संभव हो पाता है। इस तरह से इस पूरी
प्रोसेस की कुल लागत काफी कम हो जाती है।
अगर रकम में बात करें तो प्रत्येक सैल्यूलोसिक इथनॉल प्लांट की लागतों
लगभग 3.2 करोड़ डॉलर की कमी आने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है।
अमेरिका में अगर संघीय सरकार द्वारा रखे गए 16 अरब गैलन सेल्यूलॉसिक
इथनॉल के लक्ष्य को हासिल कर लिया जाता है तो इस प्रप्रिया में 7.5 अरब
डॉलर की बचत संभव होगी। इस प्रोसेस का उपयोग आसानी से बड़े स्तर पर
चलाए जाने वाले उन प्लांटों में किया जा सकता है जिनके मकसद वाणिज्यिक
और पर्यावरणीय दोनों हैं।
लुइसियाना टेक में चल रहे इस बेहद अत्याधुनिक शोध से कई तरह की
उम्मीदें हैं। इसके साथ ही देश के पहले सेल्यूलोसिक इथनॉल प्रदर्शन
संयंत्र का भी काम चल रहा है। जहाँ तक संभावनाओं की बात है तो लुइसियाना
में सेल्यूलोसिक इथनॉल के क्षेत्र में देश में अहम भूमिका निभाने की
पर्याप्त क्षमता है। यहाँ उस तरह की प्राकृतिक परिस्थितियाँ मौजूद है
जिनकी वजह से इस तरह के शोध को सफलतापूर्वक अमलीजामा दिया जा सकता है।
यह तय है कि भविष्य में ऊर्जा की मांग और बढ़ेगी। भविष्य की जरूरतों
को पूरा करने के लिए इस तकनीक के साथ ही अन्य तकनीकी शोधों को भी अंजाम
दिया जा रहा है। इस संबंध में चल रहे शोध और विकास को 5 नवंबर को
शेवपोर्ट के टेक्नॉलॉजी ट्रंसफर सेंटर में आयोजित हुए लुइसियाना टेक
एनर्जी सिस्टम्स कॉन्फ्रेंस में प्रदर्शित किया गया ताकि और लोगों के
लिए यह शोध प्रेरणा बन सके। अगर ऐसा संभव होता है तो दुनिया भर के देश
इस वक्त जिस तरह की पर्यावरणीय समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उससे
उन्हें काफी हद तक निजात मिल जाएगी।
दुनिया के सभी देशों में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों में
विकास की रप्तार को सलामत रखने या फिर उसे गति देने के लिए अक्षय ऊर्जा
के स्त्रातों खासकर इस तरह के शोध व विकास की काफी जरूरत है। अमेरिका
भी काफी समय से ऊर्जा संबंधी समस्याओं का सामना कर रहा है। इसे देखते
हुये यहाँ के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिक बेहतर और पर्यावरण के
दृष्टिकोण से उन्नत ऊर्जा की खोज पर जमकर काम कर रहे हैं। इसी का
परिणाम है कि यहाँ ऊर्जा के नये-नये स्त्रात ही सामने नहीं आ रहे बल्कि
उन स्त्रातों को बेहतर बनाने पर भी लगातार काम चल रहा है।
साभार
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