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तकनीक से जोड़ें सुनहरे भविष्य के तार
साइबर लॉ : उभरता हुआ करियर साइबर हैकर्स कम्प्यूटर सॉप्टवेयर के एक्सपर्ट होते हैं, किसी के भी क्रेडिट कार्ड
या बैंक के खाते को हैक करके लाखों रुपए निकाल लेते हैं। गोपनीय दस्तावेजों की
डिजिटल कॉपी की नकल करना और उन्हें नष्ट करना भी उनके बाएं हाथ का खेल बन गया है।
अब इससे निबटने के लिए साइबर लॉ और इसके
विशेषज्ञों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी
है। आप चाहें, तो साइबर लॉ के
विशेषज्ञ बनकर अपना
भविष्य निखार सकते हैं। आने वाले
दिनों में जैसे-जैसे कम्प्यूटर पर हमारी निर्भरता और बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे साइबर
क्राइम के बढ़ने की आशंका भी बढ़ती जाएगी। ऐसे में उन
विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी,
जो इस नए तरह के अपराध से निपटने में माहिर हों। साइबर लॉ कॅरियर के लिहाज से आज के
समय में एक बढ़िया विकल्प है। आज के दौर में जितनी तेजी से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़
रहा है, उतनी ही तेजी से साइबर क्राइम भी बढ़ रहे हैं।
इंटरनेट की एक अलग दुनिया है। इसे तकनीकी
भाषा में साइबर वर्ल्ड या साइबर स्पेस कहा
जाता है। पूरी दुनिया में साइबर स्पेस का अपना एक कानून है, जिसका निर्माण इंटरनेट
के माध्यम से होने वाले अपराधों से निपटने के लिए किया जाता है। इंटरनेट के जरिए
अंजाम दिए जाने वाले अपराधों के इस हाइटेक रूप को ही साइबर क्राइम कहा जाता है।
साइबर क्राइम के अंतर्गत इंटरनेट द्वारा क्रेडिट कार्ड के पासवर्ड की चोरी,
ब्लैकमेलिंग, स्टॉकिंग, कॉपीराइट और
ट्रेडमार्क फ्रॉड, पोर्नोग्राफी आदि जैसी
अपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। इन्हीं घटनाओं के मद्देनजर भारत के कुछ
प्रमुख शहरों मसलन बेंगलुरू, दिल्ली और मुंबई में साइबर क्राइम सेल बनाया गया है।
इस सेल में काम करने वालों को साइबर लॉ की बारीकियों से परिचित कराया जाता है, ताकि
वे साइबर क्राइम को
कन्ट्रोल कर सकें और हैकरों को सलाखों के पीछे पहुंचा सकें।बढ़ रही है
विशेषज्ञों की मांग
वैसे तो इन दिनों भारत के आईटी टैलेंट्स का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है, लेकिन
साइबर क्राइम से निपटने के जो भी प्रयास अब तक यहां हुए हैं, उन्हें पर्याप्त नहीं
कहा जा सकता। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे कम्प्यूटर पर हमारी निर्भरता और बढ़ती
जाएगी, वैसे-वैसे इस तरह के क्राइम बढ़ने की आशंका भी बढ़ती जाएगी। ऐसे में उन
विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी, जो इस नए तरह के अपराध से निपटने में माहिर हों।
साइबर लॉ कॅरियर के लिहाज से आज के समय में एक बढ़िया विकल्प है।
योग्यता : साइबर लॉ कोर्स में प्रवेश पाने के लिए अभ्यार्थी को 12वीं पास होना
चाहिए। वैसे, पहले से लॉ की डिग्री हासिल कर चुके लोग, इसे अलग से पढ़ सकते हैं।
साइबर लॉ एक ऐसा ऑप्शन है जो
भविष्य की नई राहें खोलता है। लॉ, टेक्नॉलॉजी,
मैनेजमेंट, अकाउंट आदि क्षेत्रों से जुड़े छात्र या पेशेवर व्यक्ति भी यह कोर्स कर
सकते हैं। यह क्षेत्र उनके लिए
विशेष रूप से उपयोगी है, जिन्होंने पहले से लॉ
कोर्स किया है। उन्हें लॉ की बेसिक पढ़ाई करने की आवश्यकता नहीं होगी, केवल साइबर
क्राइम और इससे निपटने के तरीके सीखने होंगे।
कोर्स का स्वरूप
साइबर लॉ एक मल्टी डिसिप्लिन
विषय है, क्योंकि इसमें तकनीकी
विषयों के साथ-साथ
कानूनी पहलुओं का भी अध्ययन किया जाता है। इसके पाठ्यक्रम में टेक्नॉलॉजी और लॉ दोनों
विषयों के बारे में विस्तफत रूप से पढ़ाया जाता है।
संभावनाएं
साइबर लॉ के क्षेत्र में काम करने के ढेर सारे विकल्प मौजूद हैं। आप चाहें तो साइबर
रिसर्चर के रूप में देश की प्रमुख यूनिवर्सिटी, मल्टीनेशनल कंपनियों, सरकारी विभागों
आदि में काम कर सकते हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप
भी मिल सकती है। इसके अतिरिक्त मल्टीनेशनल कंपनियों, बड़े कॉर्पोरेट घराने, सरकारी
और पुलिस विभागों में
ट्रेनर के तौर पर व देश के जाने-माने
ट्रैनिंग संस्थानों के
फैकल्टी मेंबर के तौर पर काम कर सकते हैं। आप कंसलटेंसी के क्षेत्र में भी अपना
भविष्य देख सकते हैं। साइबर लॉ को कॅरियर के रूप में अपनाकर संबंधित मुकदमों को
निपटाने वाले
विशेषज्ञ वकील बन सकते हैं।
कमाई
तेजी से उभरते इस क्षेत्र में सैलरी पैकेज भी बेहद
आकर्षक होता है। आरंभिक स्तर पर
सैलरी 15 से 20 हजार रुपए प्रतिमाह तक होती है।
प्रशिक्षण संस्थान
- सिम्बॉयोसिस सोसायटी लॉ कॉलेज, पुणे
- आसियान स्कूल ऑफ साइबर लॉ, पुणे
- सेंटर ऑफ डिस्टेंस एजुकेशन, हैदराबाद
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफार्मेशन टेक्नॉलॉजी, इलाहाबाद
- साइबर लॉ कॉलेज, नावी
- डिपार्टमेंट ऑफ लॉ, दिल्ली यूनिवर्सिटी
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वेब डेवलपिंग : करियर को दें नया आयाम
इंटरनेट दुनिया पर अपनी पकड़ तेजी से मजबूत करता जा रहा है। इस बात में कोई
अतिशयोक्ति नहीं कि इंटरनेट ने दुनिया को ग्लोबल विलेज में बदल दिया है। एक वेबसाइट
किसी भी सूचना को पूरी दुनिया में पहुंचा सकती है। आज बड़ी कंपनियां ही नहीं, बल्कि
छोटे व्यवसायी और स्कूल जैसे संस्थान भी अपनी वेबसाइट बनवाने की इच्छा रखते हैं,
ताकि वे अपने कारोबार को बढ़ा सकें। ऐसे में पेशेवर वेबसाइट डेवलपर की बाजार में
काफी मांग है। वेब संसार में दिलचस्पी रखने वाले युवाओं के लिए वेबसाइट डेवलपर बनना
आसान है।
वेबसाइट डेवलपर को वेब मास्टर या वेब इंजीनियर भी कहा जाता है। इसके अलावा वेबसाइट
डिजाइनर के रूप में भी काम किया जा सकता है। वेबसाइट डिजाइनर का काम वेबसाइट के
एनिमेशन और उसके ग्राफिक्स को तैयार करने का होता है। डेवलपर का काम डिजाइनिंग की
तुलना में ज्यादा पेचीदा, लेकिन संभावनाओं से भरा होता है।
कार्यक्षेत्र
वेबसाइट डेवलपर एक सॉप्टवेयर इंजीनियर होता है, जो वर्ल्ड वाइड वेब के लिए कुछ
विशेष प्रोग्राम तैयार करता है। वेबसाइट का डेटाबेस बनाना और उसकी प्रोग्रामिंग
करना इसी की जिम्मेदारी होती है। एक वेबसाइट डेवलपर को विभिन्न प्रकार की
प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज जैसे सी, सी++, जावा, एएसपी, पीएचपी, वीबी डॉट नेट पर काम
करना होता है। कुछ क्रिप्टिंग लैंग्वेज भी होती है जैसे पर्ल, वीबी क्रिप्ट और
पीएचपी।
आजकल इस फील्ड में जावा क्रिप्ट, डीओएम, एचटीएमएल और सीएसएस आदि टेक्नॉलॉजी ज्यादा
पॉपुलर हैं। साथ ही वक्त के साथ बदलती तकनीक के अनुसार खुद को बदलना भी इस पेशे में
बेहद जरूरी है।
संभावनाएं
वेबसाइट डेवलपर को किसी सॉप्टवेयर
इण्डस्ट्री में भी काम मिल सकता है या वह किसी ऐसी
संस्था में भी जा सकता है जो ऑनलाइन वेब डेवलपिंग का काम करती हो। साथ ही
इंश्योरेंस, फाइनेंस आदि क्षेत्रों में भी अच्छी संभावनाएं हैं।
यहाँ उन्हें इन्फॉरमेटिव, एंटरटेनिंग, कम्युनिकेटिव या कमर्शियल वेबसाइट्स की
प्रोग्रामिंग का काम मिल सकता है। कस्टमर डिटेल्स सिक्योर करने और इन्फॉरमेटिव
वेबसाइट्स में इन्फॉरमेशन अपडेट करने के लिए भी इन प्रोफेशनल्स की जरूरत होती है।
थोड़े अनुभव के बाद सॉप्टवेयर आर्किटेक्ट भी बना जा सकता है। यह जॉब डेवलपर की तुलना
में कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। इसमें डिजाइनिंग थोड़ी उच्च स्तरीय होती है। इस
फील्ड के प्रोफेशनल्स, कोडिंग में दक्षता हासिल करके भी बेहतर
भविष्य बना सकते हैं।
होम बिजनेस भी है ऑप्शन
अगर आप घर पर बैठकर काम करने में रुचि रखते हैं, तो भी यह क्षेत्र आपके काम का हो
सकता है। अगर आपके पास अपना कम्प्यूटर, जरूरी सॉप्टवेयर और हाई स्पीड इंटरनेट
कनेक्शन है तो आप आसानी से घर बैठे वेब डेवलपिंग का काम कर सकते हैं।
इंटरनेट पर ऐसी कई साइट्स मौजूद हैं, जो फ्रीलांस वेब डेवलपर्स को काम के हिसाब से
पैसा देती हैं। आप उन कामों के लिए न्यूनतम बिड लगाकर भी काम हासिल कर सकते हैं।
इसके अलावा कुछ कंपनियां अपने काम को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भी कराती हैं। उनके
साथ अच्छे संबंध बनाकर भी करियर संवारा जा सकता है।
मोबाइल वर्जन भी हो रहे हैं लांच
आजकल मोबाइल फोन पर इंटरनेट का खूब इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में सभी कंपनियां
मोबाइल फोन के लिए अपनी वेबसाइट के मोबाइल वर्जन लॉन्च कर रही हैं। इसमें लो-ग्राफिक
का कम बैंड विड्थ वाला संस्करण इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में मोबाइल साइट बनाने
के लिए भी डेवलपर्स की काफी डिमांड है।
ऐसे मिलेगा प्रवेश
वेब वर्ल्ड में प्रवेश करने के लिए अच्छा यह होगा कि आपके पास कम्प्यूटर साइंस की
डिग्री हो। आमतौर पर सभी कम्प्यूटर साइंस डिग्री कोर्सेस में एचटीएमएल, वेब पेज
डिजाइन, वेब पेज फॉर्म्स, जावा क्रिप्ट, डेटाबेस
एडमिनिस्ट्रेशन और मल्टीमीडिया वेब
पेज का ज्ञान दिया जाता है। इसके अलावा वेबसाइट बनाने के लिए कंटेंट डेवलपमेंट,
कम्युनिकेशंस और मार्केटिंग पर भी फोकस करना जरूरी है। वेबसाइट प्रोग्रामिंग के
बेसिक्स और अधिक से अधिक प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज का ज्ञान, इस प्रोफेशन में उन्नति
का मूल सूत्र है। डेटाबेस मैनेजमेंट,
डिस्ट्रीब्यूटेड ऑब्जेक्ट कम्प्यूटिंग,
क्रिप्टिंग, प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज और लैंग्वेजेज थ्योरी में भी महारत हासिल करना
जरूरी होता है। इस क्षेत्र में प्रोफेशनल
ट्रैनिंग लाभदायक साबित होगी। प्रोफेशनल
ट्रैनिंग के दौरान छोटे-छोटे वेब एप्लीकेशन बनाकर भी आप करियर की शुरुआत कर सकते
हैं।
आकर्षक वेतन व अवसर
इस इण्डस्ट्री में प्रवेश के दौरान ट:sनी के रूप में 10 से 15 हजार रुपए प्रतिमाह
दिए जाते हैं। इसके बाद जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जाता है, वेतन भी बढ़ता रहता है।
औसतन 3-4 साल के अनुभव के बाद देश में 40 से 50 हजार रुपए प्रतिमाह कमाए जा सकते
हैं। विदेशों में वेतन की कोई सीमा नही। वहां भारतीय वेब डेवलपर्स की काफी मांग है।
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कम्प्यूटर के डॉक्टर : चिप लेवल इंजीनियर
आपको कैसा लगेगा जब आपके कम्प्यूटर का कोई पार्ट खराब होने पर उसे बदलने की बजाय
थोड़े से पैसों में ही उस पार्ट की खराब चिप या पुर्जा बदलकर पहले जैसा काम करने
लायक बना दिया जाए। इसी तकनीक का नाम है- चिप लेवल इंजीनियरिंग। यह तकनीक युवाओं के
करियर के लिए एक बेहतर विकल्प बन कर सामने आई है।
आज जब सूचना के दौर में आर्थिक मंदी रोजगारों को पैरों तले कुचल रही है, वहीं चिप
लेवल हार्डवेयर इंजीनियरिंग कोर्स इन दिनों बाजार में अपनी जबरदस्त पैठ बना रहा है।
यदि आपको कम्प्यूटर के क्षेत्र में थोड़ा सी भी रूचि हो तो यह क्षेत्र आपके करियर
को बुलंदियों पर पहुंचा सकता है। इसमें प्रतिमाह कमाई के भी अच्छे अवसर हैं।
आज का युग टेक्नॉलॉजी का युग है, खासकर आईटी सेक्टर में, क्योंकि चाहे निजी क्षेत्र
हो या सरकारी सेक्टर सभी जगह कम्प्यूटर पर ही कार्य किया जाता है। अब स्वाभाविक सी
बात है कि इन कम्प्यूटरों की देखरेख करने एवं इनके मेंटेनेंस के लिए इसके
विशेषज्ञों
की भी जरूरत होगी। इसी का परिणाम है कि नित बढ़ती टेक्नॉलॉजी ने ऐसे प्रोफेशनल्स की
मांग बढ़ा दी है, जो हार्डवेयर के काम में पारंगत हों। खासकर चिप लेवल इंजीनियरों
की। यह तकनीक युवाओं के करियर के लिए बेहतर विकल्प लेकर आई है।क्या है चिप लेवल इंजीनियरिंग?
दरअसल हार्डवेयर
ट्रैनिंग दो तरह की होती है। कोर्ड लेवल और चिप कंपोनेंट लेवल।
कोर्ड लेवल में कम्प्यूटर असेंबलिंग और मेंटेनेंस पर फोकस किया जाता है। मसलन
मदरबोर्ड, सीडी रोम, हार्ड डिस्क, रैम, प्रिंटर आदि खराब हो जाएं तो उसके स्थान पर
नया लगा देना। जबकि चिप लेवल इंजीनियरिंग को करने वाला व्यक्ति खराब कार्ड, पार्ट
या पुर्जे को सिर्फ बदलने का ही काम नहीं करता, बल्कि वह खराब कार्ड, पार्ट या चिप
को दुरुस्त करके उसे पहले जैसा काम करने लायक बना देता है।
कितनी है मार्केट डिमांड?
इस कोर्स में व्यक्ति को मार्केट की जरूरतों के अनुसार ही सिखाया जाता है। जब
व्यक्ति कम्प्यूटर का खराब पार्ट बदलने की बजाए महज एक चिप बदलकर नाममात्र खर्च कर
उसे ठीक करने लगेगा तो जाहिर है उसकी मांग बाजार में बढ़ जाएगी। इस कोर्स को करने
के बाद कम्प्यूटर बनाने वाले कंपनियों व सर्विसिंग करने वाले विभिन्न
केन्द्रों में
नौकरी मिल सकती है।
शैक्षिक योग्यता
चिप लेवल कोर्स करने के लिए व्यक्ति को न्यूनतम 10वीं या 12वीं किसी भी श्रेणी में
उत्तीर्ण होना अनिवार्य है। अंग्रेजी
भाषा का ज्ञान भी जरूरी है। इसके अलावा यदि
आपको कम्प्यूटर की बेसिक जानकारी है तो यह आपके करियर में मददगार साबित होगी।
पाठ्यक्रम
ट्रैनिंग के अंतर्गत अभ्यार्थियों को कम्प्यूटर की 500 से 600 खराबियों को ठीक करने
की प्रैक्टिकल
ट्रैनिंग दी जाती है और साथ ही मोबाइल रिपेयरिंग भी सिखाते हैं। इस
कोर्स में व्यक्ति कम्प्यूटर असेम्बलिंग, कोर्ड एवं चिप लेवल रिपेयरिंग और
नेटवर्किंग के क्षेत्र में महारथ हासिल कर लेता है।
वेतन
शुरुआती वेतन पांच से दस हजार रुपए तक हो सकता है। इसके अलावा आपके अनुभव के साथ ही
आपके वेतन में भी वफद्धि होती रहती है। यदि आप स्वयं का कार्य करना चाहें तो वह भी
कर सकते हैं। इसमें आपकी कमाई की कोई सीमा नहीं है।
प्रमुख संस्थान
- ए-सेट ट्रैनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली
- इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
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एनिमेशन की दुनिया
सच्चे इंसानों से मुकाबला
भारत एनिमेशन में कदम रख चुका है और हमारे पास प्रतिभाओं की कमी नहीं है। आज हमारे
पास आधुनिकतम प्रशिक्षण सुविधाएं हैं। प्रशिक्षण
केन्द्रों की बढ़ती संख्या के साथ
तकनीकी स्तर पर इस क्षेत्र में भारत अन्य देशों की बराबरी पर है। हम सॉप्टवेयर
प्रोडक्ट्स जैसे तेनालीरामन और एंडवेंचर्स ऑफ हनुमान को सोनी और कार्टून नेटवर्क
जैसे ग्राहकों को बेच रहे हैं।
14 अक्टूबर, 2008 को यश राज फिलम्स ने बॉलीवुड की दुनिया में एक नया अध्याय लिखा।
इस दिन पहली फुल लेंथ एनिमेटेड फीचर फिल्म रिलीज हुई। 'रोडसाइड रोमियो' नाम की यह
फिल्म एक अमीर और मस्तमौला, बिगड़ैल कुत्ते की कहानी है, जिसे सड़कों पर अकेला छोड़
दिया गया है और अब वह जिंदगी की उन मुसीबतों का मुकाबला करता है, जिनका सामना उसने
कभी नहीं किया। इस फिल्म के पात्रों को सैफ अली खान, करीना कपूर और जावेद जाफरी ने
आवाज दी है और इसमें भारत में उपलब्ध कम्प्यूटर एनिमेशन की अधिकतम गुणवत्ता का
इस्तेमाल किया गया है।
एनिमेशन तकनीक का इस्तेमाल तब से हो रहा है, जब हम दुनिया के सबसे बड़े फिल्म
निर्माता देश नहीं थे। हमने पहली केवल एक फुल-लेंथ एनिमेटेड फिल्म हनुमान बनाई थी।
हनुमान से पहले भागमती-दी क्वीन ऑफ फॉर्च्यून्स का निर्माण हुआ था, जिसका 50
प्रतिशत हिस्सा एनिमेटेड था लेकिन यह बिना कोई पहचान कायम किए डूब गई।
आज कम्प्यूटर के आधुनिकीकरण के साथ थ्री डी एनिमेशन ने चरित्रों को जीवंत कर दिया
है। एनिमेशन फैक्टरी जैसे पिक्सर एनिमेशन स्टूडियो और ड:ाrम वर्क्स कम्प्यूटर का
इस्तेमाल एनिमेशन को वास्तविकता के करीब ले जाने के लिए करते हैं। भारत के
महत्वपूर्ण टीवी प्रोग्राम जैसे मैजिक लैंप, सांताकुकड़ी और खेल-खिलौने ने 5 या 10
मिनट की कार्टून फिल्म की बदौलत 60 से 70 के दशक में बच्चों के बीच जगह बनाई। दी
ट:ाr ऑफ यूनिटी, स्विम्मी दी फिश और एक में अनेक जैसी एनिमेशन फिल्मों ने बच्चों
में ही नहीं बड़ों में भी जागरूकता जगाई, लेकिन आज के फिल्म निर्माताओं ने एनिमेशन
के व्यापारिक पक्ष को खोज निकाला है, इसीलिए ये निर्माता इस तकनीक का इस्तेमाल अपनी
फिल्म में सामाजिक संदेश देने के लिए नहीं बल्कि पूर्ण मनोरंजन के लिए कर रहे हैं।
धूम 2 एक उच्च तकनीकी से युक्त फिल्म थी जिसमें एक घंटे का तीन-चौथाई हिस्सा
कम्प्यूटर ग्राफिक्स था जिसमें विश्व स्तर के एनिमेशन का स्वतंत्र इस्तेमाल शामिल
था।
विजुअल कम्यूटिंग लैब्स, टाटा इलेक्सी लिमिटेड में विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर केया
बैनर्जी कहती हैं कि भारत एनिमेशन में कदम रख चुका है और हमारे पास प्रतिभाओं की कमी
नहीं है। शुरुआत में प्रशिक्षण की कमी समस्या थी, लेकिन अब हमारे पास आधुनिकतम
प्रशिक्षण सुविधाएं हैं। प्रशिक्षण
केन्द्रों की बढ़ती संख्या के साथ तकनीकी स्तर
पर इस क्षेत्र में भारत अन्य देशों की बराबरी पर है। हमारा मुख्य प्रतिस्पर्धी
संभवतया चीन है। निसंदेह, फिलीपींस और दक्षिणी कोरिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
लेकिन भारत ने अपनी गुणवत्ता और रचनात्मकता के आयाम पर इन सबको पीछे छोड़ दिया है।
यही वजह है कि इस क्षेत्र के प्रमुख नाम जैसे वॉल्ट डिज्नी, आईमैक्स, वार्नर
ब्रदर्स और सोनी अपना काम भारतीय कंपनियों को आउटसोर्स कर रहे हैं।
इसे सुनकर आश्चर्य होगा कि स्पाइडरमैन 2 और 3 जिसमें एनिमेशन की भरमार थी, के मुख्य
कलाकार मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, त्रिवेंद्रम और पटना से थे। ये सभी
भारतीय शहर एनिमेशन
इण्डस्ट्री के लिए टैलेंट हब के रूप में पहचाने जाते हैं। लेकिन
गोपनीयता के कारण लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। इन सभी तेजी से घटती घटनाओं ने
आर्थिकी में अपनी जड़ें जमाई हैं। अमेरिका में पूरी लंबाई की एक एनिमेशन फिल्म बनाने
में करीब 100 मिलियन से 175 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं, जबकि भारत में इस पर 15
मिलियन से 25 मिलियन डालर से ज्यादा खर्च नहीं आता। भारतीय उद्यमियों ने इस आर्थिकी
और भारी मात्रा में उपलब्ध क्षमताओं का लाभ उठाना सीख लिया है। हम सॉप्टवेयर
प्रोडक्ट्स जैसे तेनाली रमन और एडवेंचर्स ऑफ हनुमान को सोनी और कार्टून नेटवर्क जैसे
ग्राहकों को बेचने लगे हैं, जिन्होंने पूरे विश्व बाजार पर कब्जा कर रखा है।
अभी भारतीय उपलब्धि की हॉलीवुड स्टूडियो उत्पाद जैसे डायनासोर और आइसबर्ग से तुलना
करना बहुत जल्दी होगा, लेकिन हम वहां तक पहुंच रहे हैं। निश्चित तौर पर हम
आत्मविश्वास से कह सकते हैं कि अनुकूल आर्थिकी, विश्वस्तरीय प्रशिक्षण और पेशेवर
प्रतिभाओं की बढ़ती संख्या न केवल एनिमेशन के हिमखंडों की संख्या में बढ़ोतरी करेंगे
बल्कि जल्द ही इसे जीत भी लेंगे।रोजगार के अवसर
एनिमेशन उद्योग को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है- पहला बाहर से एनिमेशन बनाना तथा
दूसरा - स्थानीय स्तर पर एनिमेशन पिक्चर्स तैयार करना। सफलता के दरवाजे खोलने के
लिए इस उद्योग का जादुई शब्द इन्टेलक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (एनिमेटेड पिक्चर्स) का
मालिकाना हक प्राप्त करना है। भारत में काम करने वाली सभी आउटसोर्सिंग कंपनियों को
इस बात को समझना चाहिए तथा मूल सामग्री का सफजन करने में लगना चाहिए। फिल्मों के
अलावा इस माध्यम का उपयोग कई अन्य क्षेत्रों में होता है जैसे ऑनलाइन कार्ड
डिजाइनिंग, आर्थोपेडिक्स, एयरोटिक्स, रोबोटिक्स, रिवर्स इंजीनियरिंग, डिजीटाइजिंग
फैशन। जहां विश्वभर में गेम तकनीक तेजी से फल-फूल रही है, वहीं 'बैंडविड्थ' की
समस्या सुलझ जाने से अब इंटरनेट पर एक बड़ा व्यापक क्षेत्र एनिमेशन के लिए खुल गया
है। भारतीय अंग्रेजी में पारंगत होने के कारण एनिमेटर्स तथा ग्राफिक डिजाइनर्स के
तौर पर पश्चिम में जाकर अच्छा कमा रहे हैं।
कहां प्रशिक्षण लें
मल्टीमीडिया क्षेत्र में काफी संख्या में संस्थान खुल गए हैं, लेकिन इन दिनों हर
नुक्कड़ पर खुलने वाले संस्थानों पर भरोसा मत कीजिए। वे आपको कहीं का नहीं छोड़ेंगे।
इनमें से अधिकांश संस्थान आपको किसी न किसी सॉप्टवेयर में ही
विशेषज्ञ बनाएंगे,
लेकिन आपमें एनिमेशन की कुशलता पैदा नहीं करेंगे। एनिमेशन एक प्रश्नपत्र के रूप में
बीएफए कोर्सेस में भी पढ़ाया जाता है। उदाहरण के लिए दिल्ली और चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ
आर्ट्स में यह
विषय है, क्योंकि इस क्षेत्र में कुछ ही औपचारिक कोर्सेस चल रहे
हैं, इसलिए कई कंपनियां फ्रेश बीएफए ग्रेजुएट्स को अपने यहां नियुक्ति देती हैं और
उसके बाद उन्हें कड़ा प्रशिक्षण अपने यहां देती हैं। कोर्स की फीस 30,000 से 75,000
हजार रुपए हो सकती है।
संस्थान
- एपीजे इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, 54 तुगलकाबाद, इंस्टीट्यूशनल एरिया, महरौली-बदरपुर
रोड, नई दिल्ली।।
- बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, मेसरा (एक्सटेंशन सेंटर्स जयपुर तथा ए-7,
सेक्टर-1 नोएडा-201301)
- सी-डेक, ए-34, इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-आठ, एसएएस नगर, मोहाली
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कम्प्यूटर एक संभावनायें अनेक
कम्प्यूटर पर अधिकाधिक केंद्रित होती इस दुनिया में औसत पढ़ाई किए लोगों के लिए भी
संभावनाएं हैं। कम्प्यूटर से जुड़े कुछ ऐसे कोर्स हैं जिन्हें 12वीं कक्षा उत्तीर्ण
करने के बाद किया जा सकता है।
कई बार जब तकनीक की दुनिया में काम करने की बात आती है तो कुछ लोग हाथ झाड़ते हुए
कह देते हैं- यह हमारे बस की बात नहीं, इंजीनियर और आईआईटी किए लोग ही ऐसी नौकरियां
कर सकते हैं। वास्तविकता में ऐसा है नहीं, क्योंकि कम्प्यूटर पर अधिकाधिक केंद्रित
होती इस दुनिया में औसत पढ़ाई किए लोगों के लिए भी लगातार संभावनाएं बनी हुई हैं।
इसमें कुछ ऐसे कोर्स भी मौजूद हैं, जिन्हें 12वीं के बाद किया जा सकता है। ऐसा करके
आप नौकरी या फिर अपना काम भी शुरू कर सकते हैं। बस अपनी पसंद, शिक्षा और बाजार के
चलन के अनुरूप लाइन पसंद करने की जरूरत है।हार्डवेयर
कम्प्यूटर में नेटवर्किंग और हार्डवेयर से जुड़े कोर्स के लिए कम से कम बारहवीं
कक्षा उत्तीर्ण करना जरूरी है। इसके अलावा प्राइवेट संस्थानों से पार्ट टाइम कोर्स
और पॉलीटेक्निक में कम्प्यूटर साइंस या
इलेक्ट्रानिक्स में तीन
वर्षीय डिप्लोमा कर
सकते हैं। आप नई तकनीक से संबंधित कोर्स भी कर सकते हैं, जिसमें रोजगार की संभावनाएं
हों।
सॉप्टवेयर
सॉप्टवेयर के क्षेत्र में काम करने वाले के लिए किसी एक
भाषा या विषय पर विशेषज्ञता होनी आवश्यक है। वर्तमान समय में जावा और डॉटनेट लैंग्वेज का चलन ज्यादा
है। इसके अलावा कोडिंग करने वाले इंजीनियरों की भी
इण्डस्ट्री में बहुत अधिक डिमांड
है।
नेटवर्किंग
इसमें लोगों को एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम को जोड़ने के बारे में जानकारी दी जाती
है। सॉप्टवेयर, सिस्टम मेंटेनेंस, डॉक्यूमेंटेशन, हार्डवेयर मेंटनेंस की भी यहां
व्यापक जानकारी दी जाती है। नेटवर्किंग का उपयोग आज बैंकिंग से लेकर रीटेल, टेलीकॉम,
फाइनेंस, मीडिया और बीपीओ क्षेत्र में भी हो रहा है। नेटवर्किंग के लिए सर्टिफिकेट
कोर्स के अलावा सिक्योरिटी, वायरलैस की जानकारी फायदेमंद साबित होती है। चिप
डिजाइनर, टेक्नीकल सपोर्ट एग्जीक्यूटिव, सिस्टम
एडमिनिस्ट्रेटर के तौर पर काम कर सकते
हैं।
डीटीपी ऑपरेटर/ग्राफिक डिजाइनर
डीटीपी ऑपरेटर का काम डाटा टाइप कर उन्हें छापने लायक बनाना है। वहीं ग्राफिक
डिजाइनर ब्रांड की डिजाइनिंग से संबंधित कार्य को अंजाम देता है, इसमें वेबसाइट
वगैरह तैयार करने जैसे कई काम शामिल हैं।
वेब डिजाइनिंग
वेब डाजइनिंग में वेब पेज, वेबसाइट और वेब एप्लीकेशन का डिजाइन तैयार करना होता है।
इस माध्यम से कंपनियां अपने बिजनेस को प्रमोट करती हैं। वर्तमान में ई-कॉमर्स
वेबसाइट, कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम पर काम करने वालों की बाजार को हमेशा जरूरत बनी
रहती है। अगर आपके पास विजुअल आर्ट या विजुअल डिजाइन की व्यावसायिक शिक्षा है तो आप
विज्ञापन एजेंसी, पब्लिशिंग हाउस या किसी डिजाइन स्टूडियो में काम कर सकते हैं।
ईआरपी सॉल्यूशन
इंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग यानी ईआरपी के माध्यम से किसी कंपनी के सारे
डिपार्टमेंटल फंक्शंस को एक कम्प्यूटर से कर पाना संभव होता है। ईआरपी
इण्डस्ट्री
में एक-दो वर्ष का अनुभव होने के बाद आपको अच्छे ऑफर मिल सकते हैं।
कस्टमर केयर
ऑफिस ऑपरेशन और मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम आईटी आधारित
इण्डस्ट्री का मुख्य भाग
है। आजकल सभी कंपनियां ग्राहकों को बेहतर सुविधा देने के लिए कस्टमर केयर सेंटर
खोलती हैं, ऐसे में आप सर्टिफिकेट कोर्स कर इस क्षेत्र में अपना करियर बना सकते
हैं। यह काम बीपीओ और कॉल सेंटर में भी होता है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और पॉवर परिदृश्य को देखने पर पता चलता है कि
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के उम्मीदवारों का जनरेशन,
ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ
सब्जेक्ट्स में उज्जवल
भविष्य है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों के लिए बायोमेडिकल साइंसेस
का डायग्लोस्टिक्स क्षेत्र भी बेहद अच्छा विकल्प है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, पॉवर
इलेक्ट्रानिक्स और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग जैसे अनेक क्षेत्रों में आप अपना पसंदीदा
कैरियर बना सकते हैं।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, इंजीनियरिंग क्षेत्र की सभी
स्ट्रीम्स में से सबसे पुरानी
और प्रमुख है। यही कारण है कि
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग आज भी स्टूडेंट्स की पसंदीदा
स्ट्रीम बनी हुई है और बेहद लोकप्रिय भी।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में
इलेक्ट्रिकल
साइंस के सभी जरूरी विषय जैसे इलेक्टि:कल्स सर्किट, पॉवर सिस्टम्स, रोटेटिंग
इलेक्ट्रिकल मशींस और
ट्रांसफार्मर, इलेक्ट्रिकल मेजरिंग इंस्ट्रूमेंट्स और ऑटोमेटिक
कन्ट्रोल सिस्टम्स का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक
करने के बाद इलेक्ट्रिकल ड:ाइव्ज एंड पावर
इलेक्ट्रानिक्स, मेजरमेंट एंड
इंस्ट्रूमेंट जैसी किसी स्पेशलाइज्ड फील्ड में एम.टेक किया जा सकता है। ये हैं कोर्स ज्यादातर आईआईटी पांच साल का दोहरी डिग्री का प्रोग्राम भी संचालित करते हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी, दिल्ली में पांच साल का दोहरी डिग्री का
प्रोग्राम है। इंटीग्रेटिंग बीटेक साथ में एमटेक। आईआईटी रूड़की में भी बीटेक और
एमटेक का संयुक्त कोर्स है। इस तरह के इंटीग्रेटेड कोर्स स्टूडेंट का एक बहुमूल्य
वर्ष बचा लेते हैं और फोकस्ड
ट्रैनिंग देते हैं।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मेडिकल
इमेजिंग और इमेज एनालिसिस के मास्टर प्रोग्राम काफी लोकप्रिय हैं। आईआईटी खड़गपुर
में भी इसी तरह के कोर्स उपलब्ध हैं। इस कोर्स में मॉलिक्यूलर इमेजिंग, मेडिकल
इमेजिंग इंस्ट्रूमेंटेशन और पैटर्न रिकॉग्निशन जैसे टॉपिक शामिल हैं। कालीकट के
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में
इण्डस्ट्रीयल पॉवर विषय में एम.टेक कोर्स है।
इसमें इण्डस्ट्रीयल पॉवर
डिस्ट्रीब्यूशन, सुपरवाइजरी
कन्ट्रोल एंड डाटा एक्विजिशन,
सिस्टम, प्रोसेस ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। अनेक हैं अवसर पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद आप पॉवर ग्रिड स्टेशंस एंड थर्मल पॉवर प्लांट्स जैसे कोर
इलेक्ट्रिकल क्षेत्रों में काम कर सकते हैं या फिर कम्युनिकेशन सिस्टम, रोबोटिक्स
एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑप्टीकल कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों का भी विकल्प है,
जिन्हें अपनाया जा सकता है। यहां तक कि ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, एयरोस्पेस
इंजीनियरिंग और ट:sक्शन
कन्ट्रोल सिस्टम्स आदि क्षेत्रों में भी जा सकते हैं।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का स्कोप अब तेजी से बढ़ रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि
देश में पॉवर का क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है। केन्द्र व राज्य सरकारें ऊर्जा
के स्रोतों पर
विशेष ध्यान दे रही हैं। इसके लिए केन्द्र सरकार हर साल बजट में
बढ़ोतरी कर रही है। इस सेक्टर के जानकारों का अनुमान है कि 2012 तक डेढ़ लाख
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की मांग की आपूर्ति करना होगी। अच्छा है वेतनमान आज इस क्षेत्र के
विशेषज्ञों की बेहद मांग है। इसलिए निजी क्षेत्रों की कंपनियों
में अच्छे वेतन पर नौकरी पा सकते हैं।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों का शुरुआती वेतन 2.5
से 15 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक हो सकता है। वेतन इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस
सेक्टर में काम कर रहे हैं। अनुभव के बाद वेतनमान बढ़ता जाता है। ********************* |