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कम्प्यूटर को और तेज रप्तार देगी नई चिप
एक ऐसी चिप विकसित की जा रही है जिससे कम्प्यूटर की स्पीड कई गुणा बढ़ जाएगी। सिलिकॉन रिंग से बनी इस चिप में कम्प्यूटर की स्पीड को काफी हद तक बढ़ाने की क्षमता है। ये सिलिकॉन रिंग डाइमीटर में दस माइक्रोन के होंगे। अगर आसान शब्दों में कहा जाए तो ये मनुष्य के बाल के दसवें हिस्से के बराबर होंगे। यह सिग्नल्स को ट्रंस मीट करने में भी सहायता देंगे। इस चिप में एक खास बात यह होगी कि यह सिंग्नल को एक ही डायरेक्शन में ट्रंसमीट कर सकता है जिससे इसकी क्षमता काफी बढ़ जाएगी। विज्ञान और कम्प्यूटर के इस युग में रोज नित नए आविष्कार हो रहे हैं। अब एक ऐसी चिप विकसित की जा रही है जिससे कम्प्यूटर की स्पीड कई गुणा बढ़ जाएगी। सिलिकॉन रिंग से बनी इस चिप में कम्प्यूटर की स्पीड को काफी हद तक बढ़ाने की क्षमता है। ये सिलिकॉन रिंग डाइमीटर में दस माइक्रोन के होंगे। अगर आसान शब्दों में कहा जाए, तो ये मनुष्य के बाल के दसवें हिस्से के बराबर होंगे। यह सिग्नलस को ट्रंस मीटर करने में भी सहायता देंगे। इस चिप में एक खास बात यह होगी कि यह सिग्नल को एक ही डायरेक्शन में ट्रंसमीटर कर सकता है जिससे इसकी क्षमता काफी बढ़ जाएगी।
डेली साइंस में छपी एक रिपोर्ट में पुरड्ये विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रिक एंड कम्प्यूटर इंजीनियरिंग के प्रेाफेसर मिंघाओं कुई ने कहा है कि इस क्षमता के कारण यह सूचनाओं की प्रोसेसिंग का काम बहुत तेजी के साथ और अच्छी गुणवत्ता के साथ कर सकती है। उन्होंने कहा कि लॉजिक सर्किट का एक ही दिशा में ट्रंसमिशन मुख्य फंडामेंटल पार्ट होता है इसलिए यह चिप भी इस दिशा में बेहतरीन काम करेगी जिससे कम्प्यूटर की क्षमता बढ़ जाएगी। हालांकि सागरों में बिछे फाइबर केबल के जाल के कारण दुनिया के सभी देशों में डाटा इधर से उधर जाता है लेकिन इसकी स्पीड काफी कम होती है । साथ ही इसके सिग्नल्स में भी दिक्कत आती रहती है। इसके साथ ही एक समस्या यह भी है कि साइबर अटैक के कारण भी इसे काफी नुकसान पहुंचता है।
इन सब दिक्कतों के चलते कम्प्यूटर को मिलने वाले इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल काफी कमजोर होते हैं जिससे उसकी स्पीड कम हो जाती है। लेकिन यह चिप इस दिशा में काफी महत्वपूर्णभूमिका निभा सकती है। इसमें इस बात की क्षमता है कि यह सिग्नल्स को तेज गति दे सकती है जिससे कम्प्यूटर भी तेज गति से काम करेगा। साथ ही इससे कम्प्यूटर की सुरक्षा भी मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक डायोड ट्रंजिस्टर का जटिल जंक्शन होता है जो सर्किट को ऑन या ऑफ करने में मदद करता है जिससे सूचनाओं का आदान-प्रदान होता रहे।
इस शोध से जुड़ी एक शोधकर्ता ने बताया कि इससे भविष्य में और भी तेज गति से काम करने वाली चिप का रास्ता भी खुल सकता है । यह सूचनाओं के प्रवाह को केवल तेज ही नहीं बनाता है बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अब इसका वाणिज्यिक उत्पादन शुरू किया जाएगा जिससे सुपर कम्प्यूटर्स को और ज्यादा पावरफुल बनाया जा सकेगा। शोधकर्ताओं का कहना है कि कम्प्यूटर की स्पीड के मामले में यह चिप काफी महत्वपूर्ण निभा सकती है।
अब ई-कचरा उगलने वाला सोना
आपको शायद विश्वास न हो कि ई-कचरे से सोना बन सकता है। यह बात सत्य है। आपका मोबाइल जब बिल्कुल खराब हो जाता तो उसे फेंक देते हैं, मगर अब ऐसा मत करिएगा। हम लोगों के लिए वह महज कूड़े का ढेर हो, लेकिन वास्तव में वह एक सोने की खान है। जापान में ई-कचरा भी सोने की खान सिद्ध हो रहा है। ई-कचरे से कीमती धातुं प्राप्त की जा रही हैं।
जापान में 'अर्बन माइनिंग` एक फलता-फूलता व्यवसाय बन गया है। वहाँ ई-कचरे से कीमती से कीमती धातुओं को प्राप्त करने को 'अर्बन माइनिंग` कहते हैं। वहाँ हर वर्ष मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान उपयोग के लायक नहीं रहते। योकोमाहा मेटल कंपनी लिमिटेड ने पुनर्चक्रमण के द्वारा सेल फोनों के एक टन कचरे से 200 ग्राम सोना निकाला है। आप जानते ही हैं कि एक टन स्वर्ण अयस्क से लगभग 8 ग्राम सोना प्राप्त होता है। वह भी बड़ी मुश्किल से। वहीं अगर हम एक टन बेकार मोबाइल फोन ले लें तो उससे लगभग 95 किलोग्राम तक तांबा और 5 किलोग्राम चांदी निकल जाएगी। आप जानना चाहेंगे आखिर यह कैसे होगा? हर इलेक्ट्रॉनिक सामान में उत्तम चालकता प्राप्त करने के लिए सोने का प्रयोग होता है। आपके घर में लगे स्विच, रीलें और अन्य कनेक्टरों के कॉन्टेक्ट्स की गोल्ड प्लेटिंग की जाती है, जिसमें सोने का इस्तेमाल होता है । लेकिन जब वह खराब हो जाती है या टूट जाती है तो उसे आप बेकार समझ कर फेंक देते हैं। हर साल करोड़ों कम्प्यूटर, टेलीविजन, सेल फोन, टेलीफोन, वॉशिंग मशीन आदि बनाने में सोने का प्रयोग हो रहा है। इसके लिए जीपीसी (गोल्ड पोटेशियम सायनाइड) का प्रयोग होता है, इसे प्लेटिंग सॉल्ट भी कहते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इलेक्ट्रॉनिकी उद्योग में हर वर्ष करीब 160 टन सोने की खपत होती है। आज इलेक्ट्रॉनिकी का मुख्य उत्पादक देश जापान है। वह अपने यहां कुल खपत होने वाली सोने का करीब 48 फीसदी सोना इसमें उपयाग करता है। अमेरिका में इसकी खपत इलेक्ट्रॉनिकी उद्योग में करीब 35 प्रतिशत है ।
नैनो के युग में : हम अब धीरे-धीरे नैनो युग में प्रवेश कर रहे हैं, लेकिन इससे सोने की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। अंतरिक्ष में जा रहे उपग्रहों, रॉकेटों में तो इसका उपयोग अनिवार्य है। उनमें सोने का उपयोग अति सूक्ष्म परिपथों में हो रहा है। इन सर्किटों को एक सेरेमिक आधार पर मुदित किया जा रहा है । इसमें स्याही जैसा लेप होता है, जिसमें सोना मिला होता है। अब वो दिन दूर नहीं कि आप आभूषणों की तरह अपने इलेक्ट्रॉनिक सामान को गले से लगाकर रखेंगे, क्योंकि उसमें कीमती धातुं छिपी हैं, इसलिए आप ई-कचरे को कचरा समझकर फेकिए मत। अब इसके पुनर्चक्रमण के दौरान सोना, प्लेटिनम तथा चांदी के अलावा कम कीमती धातुं जैसे तांबा, लोहा, निकेल आदि भी प्राप्त होता है। ई-कचरे से सबसे पहले इन धातुओं को निकाल लिया जाता है, उसके बाद जो प्लास्टिक बचता है, उसे जला दिया जाता है।
ऐसा अनुमान है कि संसार भर में हर साल लगभग तीन करोड़ से पांच करोड़ टन तक ई-कचरा का ढेर लग जाता है। हमारे देश में ही करीब दो लाख टन ई-कचरा उत्पन्न होता है, लेकिन अब ई-कचरे को कचरा समझकर कोई देश फेंकेगा नहीं, बल्कि उससे सोना निकालेगा।
ई-बुक्स प्रकाशको पर भारी
दुनिया की प्रमुख प्रकाशक कंपनी हार्पर‚कॉलिन्स ने अब ऑनलाइन लाइब्रेरीज को ई-बुक्स के अधिकार देने से हाथ खींचना शुरू कर दिया है । उनको लगता है कि इससे छपती पुस्तकों की बिक्री पर भारी असर पड़ रहा है । व्यक्ति कोई भी पुस्तक प्रकाशक से खरीदने के बजाय एक क्लिक से उसे किराए पर लेकर पढ़ना ज्यादा पसंद कर रहे हैं । ई-रीडर्स की तेजी से बढ़ती बिक्री ने ई-बुक की लोकप्रियता को नए मुकाम पर पहुंचा दिया है ।
पिछले साल क्रिसमस का दिन दुनिया की प्रमुख प्रकाशक कंपनी हार्पर कॉलिन्स के लिए ई-बुक की रिकॉर्ड बिक्री वाला दिन रहा था। इस साल भी इस तरह के संकेत हैं कि क्रिसमस के दिन ई-बुक्स की बिक्री पिछले साल से भी ज्यादा ऊंचा रिकॉर्ड बनाएगी। किंडल और नूक जैसे ई-रीडर्स की बिक्री काफी तेजी से बढ़ रही है। अमेजन ने हाल में ही 15 दिसंबर को घोषणा की थी कि पिछले तीन सप्ताह में उसने हर सप्ताह 10 लाख से भी ज्यादा किंडल बेचे हैं। टेबलेट पीसी की जबरदस्त मांग ने ई-बुक की लोकप्रियता को आसमान पर पहुंचा दिया है।
इससे इस बात का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है कि वेबसाइटों पर मौजूद पब्लिक लाइब्रेरीज के
ई-बुक सेक्शन के विजिटर्स की संख्या भी रिकॉर्ड बना रही है। सिलीकॉन वैली के एक लेखक और सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी में बिजनेस के प्रोफेसर रेंडल स्ट्रॉस के मुताबिक ई-बुक की यह बढ़ती लोकप्रियता ही प्रकाशकों के लिए भारी चिंता का कारण बन गई है। उनकी नजरों में किसी भी ऑनलाइन लाइब्रेरी से पुस्तक किराए पर लेना बहुत आसान है। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रकाशकों की चिंता है कि लोग एक पुस्तक किराए पर लेने के लिए ज्यादा क्लिक करेंगे बजाय उसे खरीदने के। अमेरिका के ज्यादातर बड़े प्रकाशकों ने लॉइब्रेरीज को ई-बुक देने से अपने हाथ खींच लिए हैं। कुछ ने तो सभी किताबों तक ही ई-बुक की पहुंच बंद कर दी है या कुछ ने हाल ही में प्रकाशित पुस्तकों के लिए इस सुविधा को बंद कर दिया है।
ई-लाइब्रेरी से पुस्तक किराए पर लिए जाने की बात प्रकाशकों के लिए असुविधा पैदा कर रही है। हैचेट बुक ग्रुप की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट माजा थॉमस हालांकि छपी हुई पुस्तकों को ही सबसे बेहतर मानती हैं। उनका कहना है कि छपी हुई प्रति हमेशा आपके पास रहती है। लेकिन ई-बुक की बढ़ती मांग के चलते प्रकाशकों को बदलना पड़ेगा। प्रकाशक एक पुस्तक लाइब्रेरी बेचता है और वह लाइब्रेरी उसे ई-बुक के रूप में बहुत से लोगों को बेच देती है। यह मॉडल प्रकाशकों के लिए घाटे का सौदा है। थॉमस कहती हैं कि हैचेट ने 2009 में ही डिजिटल लाइब्रेरीज को ई-बुक मुहैया कराना बंद कर दिया था। ई-बुक उधार देने की प्रक्रिया को भी हालांकि काफी सख्त बनाया गया है। सॉप्टवेयर यह सुनिश्चित करता है कि ई-बुक की प्रति को एक समय पर एक ही व्यक्ति पढ़ सकता है। ऐसे में किसी खास किताब के लिए लंबी वेटिंग लाइन देखकर कोई भी व्यक्ति उसे खरीदने को ही मजबूर हो जाएगा। एक अन्य प्रमुख प्रकाशक सिमॉन एंडशूस्टर के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और चीफ डिजिटल ऑफिसर एलिनर हिरश्चोर्न कहते हैं कि वे लाइब्रेरीज को कभी भी
ई-बुक्स मुहैया नहीं कराते हैं। प्रोफेसर स्ट्रॉस का कहना है कि प्रकाशकों को अपने राजस्व में गिरावट रोकनी है तो ई-बुक उधारी लेने की प्रक्रिया को और कठिन बनाना होगा और लाइब्रेरी खरीदारों के लिए ई-बुक की कीमत भी बढ़ानी होगी ताकि लोग छपी हुई प्रति को खरीदने में फायदा समझें। अभी तक छपी प्रति खरीदने वालों को पुस्तक महंगी पड़ती है।

हैचेट की थॉमस कहती हैं कि उन्होंने इस मुद्दे को लेकर लाइब्रेरीज से कई कदमों पर चर्चा की है जिसके तहत नई प्रकाशित पुस्तक को किराए पर देने की अधिकतम संख्या तय करना। हालांकि वह कहती हैं कि फिलहाल लाइब्रेरीज केसाथ किसी तरह का समझौता नहीं हो सका है जो उनको भी स्वीकार हो। प्रमुख प्रकाश हार्पर‚कॉलिन्स ने लाइबेरीज के साथ परंपरागत समझौतों में बदलाव के लिए कदम उठाए हैं। पिछले साल मार्च से उसने असीमित उपयाग के लए लाइब्ररीज को ई-बुक की बिक्री बंद कर दी है। वर्ष 2001 से कंपनी ऐसा करती आ रही थी। इसके बजाय उसने ई-बुक प्रति को अधिकतम 26 बार किराये पर देने की शर्त जोड़ दी है । कंपनी के निर्णय का असर केवल बहुत ज्यादा लोकप्रिय किताबों पर पड़ा है और बाकी पर कोई असर नहीं है। अधिकतम सीमा तक किराए पर दिए जाने के बाद लाइब्रेरी को प्रकाशक उस पुस्तक के अधिकार प्रकाशक से फिर से खरीदने होंगे, लेकिन इस बार उसको कम कीमत पर वह मिल जाएगी। कंपनी ने एक बयान में कहा था कि पुरानी शर्तों के मुताबिक ही लाइब्रेरीज को पुस्तकें दिए जाने से किताबों की बिक्री और लेखकों को दी जाने वाली रॉयल्टी में भारी गिरावट आ सकती है। प्रकाशकों के ताजा कदमों से प्रकाशकों, लेखकों और पुस्तक विक्रेताओं सभी के वित्तीय हितों का संरक्षण होगा। वहीं ओहियों स्थित मैट्रोपॉलिटन लाइब्रेरी की डायरेक्टर (टेक्निकल सर्विसेज) रोबिन नेस्बिट कहती हैं कि हार्पर‚कॉलिन्स ने ई-बुक किराए पर देने पर जो सीमा लगाई है उससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। एक प्रति को 26 बार रिकार्ड पर देने की सीमा अपने आप में काफी ज्यादा है। लेखक ने जो चिंता अमेरिका में इंटरनेट और ई-बुक रीडर्स की लोगों तक तेजी से बढ़ती पहुंच से प्रकाशकों के लिए जताई है, आने वाले कुछ वर्षों में उस स्थिति का सामना भारतीय प्रकाशकों को भी करना पड़ सकता है। इंटरनेट और ई-रीडर दोनों की ही पहुंच भारत में भी तेजी से कदम बढ़ा रही है। टेबलेट पीसी का तेजी से बढ़ता बाजार इस तरह इशारा कर रहा है।
ई-कॉमर्स से भी तेजी से बढ़ेगा एम‚कॉमर्स
ईöकॉमर्स के बाद अब एम-कॉमर्स की बारी है। भारत में ई‚कॉमर्स तेजी से बढ़ रहा है लेकिन एम‚कॉमर्स में उससे भी ज्यादा संभावना है। एम‚कॉमर्स का मतलब मोबाइल के जरिये खरीदारी, लेन-देन या रूपये‚पैसे का भुगतान । भारत में इसकी शुरूआत धीमी है लेकिन दुनिया भर में तेजी से बदल रहे हालात से एम‚कॉमर्स वित्तीय लेनदेन या खरीदारी का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। भारत में यह प्रवफत्ति अभी धीमी है लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि मोबाइल से भुगतान या खरीदारी का ट्रंड अभी काफी जोर पकड़ेगा।
मोबाइल सब्सक्राइवर्स का मजबूत आधार : भारत में मोबाइल यूजर्स की तादाद 70 करोड़ तक पहुंच गई है। अभी और 30 करोड़ लोगों तक मोबाइल को पहुंचना है। भारत में एक बड़ी आबादी बैकिंग सेवा के दायरे से बाहर है। समावेशी विकास के लक्ष्य के तहत जब एक बड़ी आबादी को बैंकिंग सेवा मुहैया कराई जाएगी, तो मोबाइल इसका एक सशक्त माध्यम होगा। अभी कुछ इलाकों में यह प्रयोग सफल रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने टेलीकम्यूनिकेशन कंपनियों, बैंक और स्वतंत्र सर्विस प्रोवाइडर के लिए नियमन जारी करते हुए मोबाइल वालेट न बनाने की सलाह दी थी। लेकिन दूसरी सेवा खासकर भुगतान सेवा तेजी से बढ़ रही है। दरअसल मोबाइल बैंक इंटरनेट बैकिंग का ही स्वरूप है।
अभी भुगतान सेवा में ज्यादा इस्तेमाल : इस समय एम‚कॉम सेवा का इस्तेमाल बैकिंग, ट्रैवल, टिकटिंग, मूवी टिकटिंग और यूटिलिटी बिल पेमेंट के लिए हो रहा है। हालांकि जागरूकता कम होने और वित्तीय लेन-देन की असुरक्षा से जुड़ी चिंताओं और इंटरनेट की गति धीमी होने की वजह से एम-कॉमर्स ज्यादा जोर नहीं पकड़ रहा है। इस समय भारत में लगभग 70 करोड़ मोबाइल यूजर्स हैं और इनमें से सिर्फ साढ़े तीन करोड़ लोग एम-कॉमर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में वित्तीय लेन-देन के आधार पर एम-कॉमर्स का बाजार 2000 करोड़ रूपये का हो जाएगा। इस समय एम‚कॉमर्स में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी यानि 50 फीसदी प्री‚पेड मोबाइल सर्विस की है। पिछले साल के सितम्बर महीने तक एम-बैकिंग का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद8,87,000 थी। हालांकि मोबाइल बैकिंग का ज्यादा इस्तेमाल अकाउंट की जानकारी, बैलेंस, मिनी स्टेटमेंट के लिए, टॉप‚अप, डीटीएच रीचार्ज, सब्सक्रिप्शन लेन, मर्चेंट पेमेंट और मोबाइल टिकटिंग के लिए हो रहा है।

एम वॉलेट का चलन कम :एम-वॉलेट का चलन कम है। पिछले दिनों नोकिया मनी ने एम‚वॉलेट लांच किया है। भारत में इंटरनेट की तुलना में मोबाइल का इस्तेमाल कर वित्तीय लेन-देन और खरीदारी करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ेगी । वित्तीय लेन-देन की सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं खत्म हो जाने पर यह भारत के सबसे बड़ा बाजार होगा।
इसके जरिये स्मार्टफोन पर एएसएमस भेजकर पैसे ट्रंसफर किए जा सकते हैं या फिर बिल अदा किए जा सकते हैं। दुनिया भर में एम‚कॉमर्स का इस्तेमाल 1.8 अरब लोग करते हैं। यह आबादी 2015 तक बढ़ कर 2.5 अरब हो जाएगी। भारत में इस दौरान एम‚कॉमर्स का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद बढ़ कर 40 करोड़ होने की संभावना है। इस तरह दुनिया भर में एम-कॉमर्स के जरिये भुगतान बढ़ कर 86 अरब डॉलर हो जाएगा।
कंपनियों की बेहतर शुरूआत : भारत में कुछ कंपनियों ने मोबाइल‚पैमेंट की दिशा में अच्छी शुरूआत की है। कैलिफोर्निया स्थित मोबाइल पैमेंट सर्विस प्रोवाइडर ओबोपे इंक. और बेंगलुरू की एमचेक इंडिया पैमेंट सिस्टम सबसे तेजी से बढ़ने वाली मोबाइल‚पैमेंट कंपनियां हैं। उनका कहना है कि वे इस संबध्ंा में रिजर्व बैंक के निर्देश के दायरे में अपना कारोबार बढ़ाने की कोशिश करेंगी। ओबोपे के पास डेबिट कार्ड जैसा मॉडल है। यह वॉलेट बनाने जैसा नहीं है लेकिन ग्राहक का बैंक अकाउंट खुद-ब-खुद उसके मोबाइल से जुड़ जाता है। कंपनी अमेरिका में मोबाइल वॉलेट आधारित ट्रंजेक्शन सुविधा अमेरिका में मुहैया कराती है। एयरटेल मनी का इस्तेमाल करके आप अपने बिलों का भुगतान कर सकते हैं। यह एप नए सिम कार्ड में लोड रहता है और इसे दूसरा एयरटेल सर्विस इस्तेमालकर्ता डाउनलोड कर सकता है। यह पैसा दिल्ली, एनसीआर और चेन्नई में 3000 मर्चेंट आउटलेट में ओटीसी पैमेंट के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है। इन मर्चेंट आउटलेट में एनडीपीएल, इंदप्रस्थ गैस लिमिटेड, बड़ी फार्मेसी कंपनियों इजी डे जैसे डिपार्टमेंटल, कोस्टा कॉफी शामिल है।
लेनदेन की सुरक्षा बड़ी चिंता ः दरअसल भारत में एम-कॉमर्स के बढ़ने की राह में सबसे बड़ी बाधा सुरक्षा कारण हैं। एम-कॉमर्स में वित्तीय लेन-देन की सुरक्षा के प्रति अभी लोगों में ज्यादा जागरूकता नहीं आई है। एम‚चेक, ओबोपे, पेमेंट जैसे सर्विस प्रोवाइडर ने अपनी सेवा शुरू की है लेकिन इन कंपनियों को क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और बैंक अकाउंट की मैपिंग मोबाइल फोन पर करनी होगी। इन सेवाओं की पूरी सुरक्षा गारंटी मिलने पर ही ज्यादा से ज्यादा लोग बैंक लेन-देन, खरीदारी और दूसरी वित्तीय सेवाओं के तहत भुगतान के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करेंगे। भारतीय रिजर्व बैंक के कड़े नियमन की वजह से अभी एम‚वॉलेट की दिशा में ज्यादा कंपनियां आगे नहीं बढ़ रही हैं। लेकिन आगे उसके रुख में लचीलापन को देखते हुए एम-कॉमर्स एक बेहद सुविधाजनक माध्यम बन कर उभेरगा। चूंकि भारत में मोबाइल सब्सक्राइवर की तादाद तेजी से बढ़ रही है इसलिए यहां का एम-कॉमर्स बाजार सबसे तेजी से बढ़ने वाला बाजार होगा। टेलीकॉम कंपनियों, रिजर्व बैंक और दूसरे सर्विस प्रोवाइडरों को मिल कर एक साझा रणनीति बनाने की जरूरत है। इसके बाद ही भारत में एम-कॉमर्स में तेजी का आधार बन सकेगा।
गूगल + का भविष्य होगा सुनहरा
गूगल प्लस की वफद्धि दर बहुत तेज है जिससे ऐसा लगता है कि यह भविष्य में काफी तरक्की करेगा। अब तक इससे लगभग 2.5 करोड़ लोग जुड़े चुके हैं और इनमें से एक करोड़ के आसपास लोग केवल पहले 16 दिनों में जुड़े हैं। किसी भी सोशल साइट्स के लिए इतने कम दिनों में इतने उपभोक्ता जोड़ना कोई कम बड़ी बात नहीं है। अगर इसकी तुलना फेसबुक या ट्विटर से करें तो इन साइट्स पर एक करोड़ लोगों को जुड़ने में लगभग 800 दिन लगे थे। यही नहीं, गूगल प्लस के पास गूगल जैसा सुपर प्लेटफॉर्म भी है जो दूसरी सोशल साइट्स के पास नहीं है।
ज्यादा समय नहीं हुआ है जब गूगल प्लास लांच किया गया था। तब लोगों ने इसकी क्षमता और भविष्य को लेकर कई सवाल उठे थे। लोगों का कहना था कि इसके लिए फेसबुक से टक्कर लेना इतना आसान नहीं होगा क्योंकि जो बात फेसबुक में है वह किसी दूसरे में नहीं है लेकिन अब जानकारों का मानना है कि गूगल प्लास के बारे में इस तरह की भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि इतने बड़े स्तर पर लांच होने वाली किसी भी चीज के बारे में इतनी जल्दी अपनी धारणा बना लेना सही नहीं होगा। जानकारी का कहना है कि गूगल प्लस बज जैसे गूगल के दूसरे उत्पादों से काफी मायनों में अलग है इसलिए इसका भविष्य ठीक रहेगा। इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि कुछ ऐसी चीजें हैं जिनसे इस बात का पता चलता है कि आने वाले सालों के दौरान गूगल प्लस (जी प्लस) अच्छी तरक्की करेगा।
गूगल प्लास की वफद्धि दर बहुत तेज है जिससे ऐसा लगता है कि यह भविष्य में काफी तरक्की करेगा। अब तक इससे लगभग 2.5 करोड़ लोग जुड़ चुके हैं और इनमें से एक करोड़ के आस-पास लोग केवल पहले 16 दिनों में जुड़े हैं । किसी भी सोशल साइट्स के लिए इतने कम दिनों में इतने उपभोक्ता जोड़ना कोई कम बड़ी बात नहीं है। अगर इसकी तुलना फेसबुक या ट्विटर के करें तो इन साइट्स पर एक करोड़ लोगों को जुड़ने में लगभग 800 दिन लगे थे। यही नहीं गूगल प्लास के पास गूगल जैसा सुपर प्लेटफॉर्म भी है जो दूसरी सोशल साइट्स के पास नहीं है । इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता है कि एक प्लेटफॉर्म के रूप में गूगल का कोई तोड़ नहीं है और फेसबुक व ट्विटर जैसी साइट्स इस मामले में बहुत पीछे हैं । यही नहीं गूगल प्लस में डाटा पोर्टेबिलिटी की भी जबर्दस्त सुविधा हासिल है। अगर इस कसौटी पर फेसबुक को कसा जाए तो वह गूगल प्लस से कहीं पीछे छूट जाती है। फेसबुक डाटा पोर्टबिलिटी के मामले में सख्त होती जा रही है और वह इसे सीमित करती जा रही है आने वाले समय में फेसबुक के इस कदम का उसकी विश्वसनीयता पर जरूर प्रभाव पड़ेगा। इससे गूगल प्लास का फायदा मिलने की संभावना है। इस सबके साथ ही, गूगल प्लास के साथ एक और ऐसा प्लास पॉइंट है जो दूसरे साइट्स के पास नहीं है और वह पॉइंट है मार्केटिंग का। इसके पास गूगल जैसा मार्केटिंग पावरहाउस है जो फेसबुक सहित दूसरी किसी भी साइट्स के पास नहीं है। इस मामले में गूगल आज ही नहीं बल्कि पिछले 13 सालों से मास्टर है। दुनियाभर में लाखों ऑर्गेनाइजेशन गूगल के एडवरटाईज करते हैं इसलिए गूगल प्लास को बिना ज्यादा मेहनत किए ही मार्केटिंग में वो स्थान मिलने की संभावना है जिसके लिए दूसरी सोशल साइट्स को एड़ी‚चोटी का जोर लगाना होगा। यही नहीं गूगल पर लोगों का जो विश्वास कायम हुआ है वह भी गूगल प्लास के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। गूगल प्लास भले ही नया हो लेकिन गूगल का नाम नेट की दुनिया से जुड़े लोगों के लिए नया नहीं है।

गूगल ने इसकी लॉचिंग से पहले प्लास वन स्ट्रेटजी भी लांच की थी जो उपभोक्ताओं के काफी काम आ रही है। इसमें आप केवल अपने दोस्त को नहीं बल्कि दोस्त के दोस्त को भी रिकेमेंडेशन भेज सकते हैं। यह क्षमता केवल गूगल में ही है और दूसरी जगह नहीं है। जाहिर सी बात है कि इस सुविधा का गूगल प्लास को काफी फायदा मिल सकता है। इसके साथ ही एक अन्य बात भी जो गूगल प्लास को दूसरी सोशल साइट्स के अलग बनाती है । एक तरफ जहां दूसरी सोशल साइट्स अपने रेवेन्यू के लिए संघर्ष कर रही है वहीं गूगल अपनी इस सेवा को कुछ समय तक बिना रेवेन्यू अर्थात जीरो रेवेन्यू पर भी चला सकता है । यह इसकी मजबूती का परिचायक है और इससे पता चलता है कि गूगल प्लास एक टिकाऊ सेवा है । गूगल के पास जितना बड़ा मार्केटिंग तंत्र और नाम है उतना किसी भी दूसरी सोशल साइट्स के पास नहीं है । ये बात सही है कि गूगल प्लास के साथ कई सारे ऐसे एडवांटेज हैं जो दूसरी सोशल साइट्स के पास नहीं हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसे बाजार में प्रतिस्पर्द्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि गूगल को फेसबुक से कड़ी टक्कर मिल रही है। अगर गूगल को इस क्षेत्र में फेसबुक से आगे निकलना है तो उसे कुछ अलग करके दिखाना होगा जिससे उपभोक्ताओं को लगे कि इसमें कुछ खास है । बहरलाल ये तो समय ही तय करेगा कि भविष्य में गूगल प्लास की दशा क्या होगी लेकिन यह बात सही है कि अभी उसका भविष्य उज्ज्वल लग रहा है।
संकलन ः रवि, विनीता
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