|
अब
बिना ब्लेड
का पंखा
भगाएगा
गर्मी
ब्लेड
वाले पंखे
तो सभी
प्रयोग
करते हैं,
लेकिन
आस्ट्रेलिया
में ऐसा
पंखा बनाया
गया है जो
बिना ब्लेड
के भी अच्छी
हवा देता
है। इस पंखे
को बनाने
वाली कंपनी
जेम्स
डायेसन का
कहना है कि
यह
मल्टिफ्लायर
पंखा न
सिर्फ
गर्मी से
निजात
दिलाएगा,
बल्कि
ब्लेड से
होने वाली
खटखट की
आवाज से भी
राहत देगा।
निर्माता
जेम्स के
अनुसार
इसके
निर्माण का
आइडिया
उन्हें हाथ
सुखाने
वाले उपकरण
को देखकर
आया जो हाथ
से हवा को
खपच कर उसे
सुखा देता
था। आमतौर
पर घरों में
प्रयुक्त
होने वाले
पंखों में
लगे ब्लेड
बच्चों के
लिए बेहद
खतरनाक
साबित होते
हैं जो
अक्सर अपनी
उंगलियों
को इन पंखों
की ग्रिल के
बीच में दे
देते हैं।
साथ ही
इनमें लगे
ब्लेड हवा
के प्रवाह
में भी
दिक्कतें
पैदा करते
हैं।
ऐसे
करता है यह
काम :
q 40 वॉट के
मोटर की मदद
से एक
सैकेंड में 27
लीटर हवा
खपचता है।
q मोटर के
नीचे लगे
पंखे के
जरिए हवा को
गति देता
है।
q 3एमएम
सिल्ट के
जरिए 55 मील
प्रति घंटे
की गति से
हवा का
प्रवाह
होता है।
q बाहर
निकलने के
दौरान हवा
करीब 15 गुना
तेजी से
निकलती है
और वो भी
बिना किसी
ब्लेड के
खतरे और
आवाज के
बिना।
लचीला
ई- रीडर
साढ़े
ग्यारह इंच
लंबे इस ई-रीडर
के अंदर का
हिस्सा कुछ
इतना लचीला
है कि इसे
मोड़ा भी जा
सकता है।
एलजी
निर्मित,
हाई-डेफिनेशन
टच-क्रीन
जिस पर
ग्लास
फ्रंट की
कोई जरूरत
नहप रहती।
इसका मतलब
कि टूट-फूट
का ज्यादा
खतरा नहप
रहेगा,
लेकिन फिर
भी, संभाल
के। स्किफ
ने इसे एक
पतली और
खूबसूरत
मैग्नीशियम
केसिंग में
सुरक्षित
किया है।
इसका पूरा
स्वरूप
विज्ञान
फंतासी
फिल्मों के
गैजेट्स
जैसा है
यानी चुस्त,
देखने में
बेहतरीन और 3जी
स्टेंडर्ड
का। इसका
वजन 498 ग्राम
और
डिस्प्ले
रिजोल्यूशन
1200x1600 पिक्सेल,
फुल टच&क्रीन
और वाई&फाई
सुविधा
वाला होगा।
इसका
रिचार्जिंग
समय 2 से 3
घंटे तक
होगा। 4 जीबी
इंटर्नल
मैमोरी
जिसमें 3 से
अधिक जीबी
कंटेंट
स्पेस के
लिए होगी।
इसके अलावा,
बिल्ट इन
स्पीकर और 3.5
एमएम का
स्टेंडर्ड
ऑडियो जैक।
आने वाले
दिनों में ई-समाचार
पत्रों को
पढ़ने के
लिहाज से यह
गैजेट सबसे
व्यावहारिक
होगा
क्योंकि इस
पर छोटे
अक्षर भी
साफ पढ़े जा
सकेंगे। ई-रीडिंग
के बढ़ते
बाजार के
लिए यह
गैजेट अलग-अलग
खूबियों और
क्षमता के
अनुसार
भारतीय
बाजारों
में 15 हजार से
45 हजार रुपए
तक के दामों
में उपलब्ध
हो सकता है।
न्यूक्लियर
मेडिसिन से
कैंसर पर
हमला
आने
वाले वक्त
में
न्यूक्लियर
मेडिसिन
कैंसर जैसे
खतरनाक रोग
के खिलाफ एक
कारगर
हथियार
साबित होगी
और भारत-यूरोप
परमाणु
चिकित्सा
फोरम इस
दिशा में
ऐतिहासिक
खोज करेग।
ऐसा मानना
है इस फोरम
द्वारा
आयोजित एक
कार्यक्रम
में शिरकत
करने वाले
विशेषज्ञों
का। इंडो-यूरोप
न्यूक्लियर
मेडिसिन
फोरम, दरअसल
भारत और
यूरोप के
परमाणु
चिकित्सा
पेशेवरों
की एक
शैक्षिक
इकाई है।
यहां
आयोजित
फोरम की तीन
दिवसीय
कार्यशाला
में टाटा
मेमोरियल
सेंटर के
डॉक्टर आर.ए.
बादवे ने
कहा कि फोरम
द्वारा
पूरे देश के
पोस्ट
ग्रेजुएट
छात्रों के
लिए आयोजित
यह
कार्यशाला
महत्वपूर्ण
विचारों को
जन्म देगी,
खासकर
कैंसर के
इलाज के
क्षेत्र
में।
सेमिनार
के गेस्ट ऑफ
ऑनर और होमी
भाभा नेशनल
इंस्टीट्यूट
के निदेशक,
हिंदुजा
अस्पताल
में परमाणु
विभाग के
प्रमुख व
वर्कशॉप के
कोर्स
डायरेक्टर
डॉक्टर बी.ए.
कृष्णा ने
कहा कि इलाज
में
न्यूक्लियर
मेडिसिन के
नए
प्रयोगों
को लेकर
भारतीय
पोस्ट
ग्रेजुएट
छात्रों को
यूरोपीय और
भारतीय
प्रोफेसर
सघन
प्रशिक्षण
देंगे।
भारत
में कैंसर
रोगी :
इंडियन
काउंसिल ऑफ
मेडिकल
रिसर्च की 2009
की रिपोर्ट
के मुताबिक
भारत में
करीब 25 लाख
कैंसर रोगी
हैं, जिनकी
संख्या प्रति
वर्ष दस
हजार बढ़
रही है।
क्या
है
न्यूक्लियर
मेडिसिन :
रेडियोग्राफर
एसोसिएशन
के अध्यक्ष
मोहन राव
भागवत का
कहना है कि
कृत्रिम
तौर से
तैयार
व्यक्ति को
न्यूक्लियर
मेडिसिन
मुंह से या
फिर
इंजेक्ट कर
दी जाती है।
इससे गामा
किरणों का
उत्सर्जन
होता है और
शरीर के
बाहर रखा
गामा कैमरा
उसे पहचान
लेता है।
प्रमुख
न्यूक्लियर
मेडिसिन :
टेक्टेनियम-99
एम, आयोडीन 123,
थैलियम-201,
गैलियम-67,
लोरीन-18
और
भी रोगों के
निदान में
प्रभावशाली
: भागवत ने
बताया कि
थायरायड
रोग को
पहचानने के
लिए रेडियो
आइसोटोप
आयोडीन 123 को
दिया जाता
है। वहप
लीवर की
बीमारी के
लिए
टैक्टेनियम
99-एम को दिया
जाता है तो
फेफड़ों की
बीमारी की
स्थिति का
पता करने के
लिए
टैक्टेनियम
99-एम को
एल्बोनियम
के साथ
मिलाकर
दिया जाता
है। हृदय
रोग में
हीलियम
देते हैं।
क्या
है फायदा :
बीमारी और
उसके लक्षण
उभरने के
बीच कई बार
लंबा
अंतराल
होता है।
रेडियो
फार्मास्युटिकल्स
की बदौलत
शरीर में
बीमारी
कहां किस हद
तक फैली है
इस बात का
पता चल जाता
है।
गर्मी
से ज्यादा
सताएगी
ग्लोबल
चिलिंग
जहां
अधिकतर शोध
और
वैज्ञानिक
ग्लोबल
वार्मिंग
को सबसे
बड़ा खतरा
बता रहे हैं
वहप डॉ. डॉन
ईस्टरबुक
का कहना है
कि पहले तो
हमें
ग्लोबल
चिलिंग
यानी भारी
ठंड से
निपटने की
कोशिशें
करना
चाहिए।
वेस्टर्न
वॉशिंगटन
यूनिवर्सिटी
के
प्रोफेसर
ईस्टरबुक
का कहना है
कि 2030 तक ठंड
के लगातार
बढ़ने की
बात
तथ्यपरक
है। यह बात
ईस्टरबुक
ने
कॉफ्रेंस
ऑन
क्लाइमेट
चेंज में 700
वैज्ञानिकों
और अफसरों
के बीच कही।
ईस्टरबुक
ने इस विषय
पर काफी शोध
किए हैं और
वे 150 से
ज्यादाशोधपत्र दे
चुके हैं।
उनका कहना
है कि अगले
कुछ दशकों
तक के लिए तो
ग्लोबल
वॉर्मिंग
का कोई असर
नहप होने
वाला है
जबकि
ग्लोबल
चिलिंग की
कम से कम 2030 तक
अपने सबसे
बुरे असर के
साथ आने की
संभावना
है। उनका तो
दावा है कि
गर्मी की
वजह से मारे
जाने वालों
से दोगुनी
संख्या ठंड
से मारे
जाने वालों
की होगी।
अब
भी खोज रहे
वैज्ञानिक
कितना है
पानी
बच्चों
के खेल में
गोल-गोल
रानी कितना-कितना
पानी की बात
वैज्ञानिकों
के लिए
हमेशा से एक
बड़ा सवाल
रही है। वुड
होल
ओसियनोग्राफिक
इंस्टीट्यूट
(डब्ल्यूएचओआई)
ने एक बार
फिर इस बार
विस्तृत
शोध करते
हुए नए
आंकड़े पेश
किए हैं।
इस
शोध से
सामने आया
है कि
दुनिया में 320
मिलियन
क्यूबिक
मीलपानी
है। इस
संदर्भ में
पहली कोशिश
यह जानने की
हुई कि समुौ
की औसत
गहराई क्या
है? इसमें
मारियाना
ट्रंच ने
अपने
अध्ययन के
निष्कर्ष
के तौर पर
सुझाया कि
समुकी
औसत गहराई 2.29
मील मानी जा
सकती है। इस
पर सभी
वैज्ञानिक
सहमत नहप थे
लेकिन आखिर
इसे ही औसत
माना गया।
यूएस नेवी
का कहना है
कि समुौाsं
की सही औसत
गहराई
निकालनी हो
तो दस शिप को
बीस सालों
तक लगातार
काम करना
होगा और तब
भी आंकड़ा
संभावित ही
होगा।
सेटेलाइट
और अन्य
संसाधनों
की मदद से 320
मिलियन
क्यूबिक
मील पानी का
आंकड़ा तय
किया गया।
शोध
में यह भी
पाया गया कि
समुौाh पानी
का जितना
बड़ा
आंकड़ा
बताया जाता
रहा है वह
वास्तविकता
से ज्यादा
है।
अगले
वर्ष से
अंतरिक्ष
में मानव
नहप भेजेगा
यूएस
अंतरिक्ष
में मानव
भेजने का
अमेरिका के
सुनहरे
इतिहास का
अंतिम
अध्याय
स्पेस शटल
डिस्कवरी
के
प्रक्षेपण
के साथ ही
समाप्त हो
गया।
अमेरिकी
अंतरिक्ष
एजेंसी
नासा के तीन
स्पेस
शटलों में
से एक
अटलांटिस
ने कुछ ही
दिनों
पूर्व अपनी
अंतिम
उड़ान भरी।
इसके
बाद सितंबर
में दूसरे
स्पेस शटल
एंडेवर और
नवंबर में
तीसरे
स्पेस शटल
डिस्कवरी
की अंतिम
उड़ान के
साथ ही नासा
का
अंतरिक्ष
में मानव
भेजने का
कार्यक्रम
समाप्त हो
जाएगा। अब
तक 131 बार
स्पेस शटल
अंतरिक्ष
में भेजे जा
चुके हैं।
नवंबर में 134वें
प्रक्षेपण
के साथ ही
अमेरिका
अंतरिक्ष
में मानव
भेजने का
सिलसिला
बंद कर
देगा। इस
बात से यहां
कैनेडी
स्पेस
सेंटर में
कुछ मायूसी
देखी जा रही
है। अब
अमेरिका की
अगुवाई
वाले
अंतर्राष्ट्रीय
अंतरिक्ष
स्टेशन पर
अंतरिक्ष
यात्री
भेजने का
काम
अमेरिका ने
रूस को आउट
सोर्स करने
का फैसला
किया है।
बदले
हुए
सुरक्षा
परिदृश्य
कोध्यान में
रखते हुए
नासा अब
अमेरिकी
सेना के लिए
स्पेस शटल
से काफी
छोटे मानव
रहित यान
अंतरिक्ष
में
भेजेगा।
इनका
इस्तेमाल
टोही कार्य,
अंतरिक्ष
में उपग्रह
पहुंचाने,
प्रयोगशाला
के रूप में
किया
जाएगा। इस
परियोजना
को एक्स-37बी
नाम दिया
गया है।
इसके तहत
प्रयोग के
लिए एक यान
गत अप्रैल
में
अंतरिक्ष
में छोड़ा
गया। एक्स-37बी
परियोजना
के
उद्देश्य
को लेकर
यहां के
अधिकारी
खुल कर बात
नहप करना
चाहते
लेकिन वे इस
बात को
मानते हैं
कि यह
अमेरिकी
रक्षा
मंत्रालय
की
परियोजना
है जिसे
नासा अमली
जामा पहना
रहा है।
नासा के लिए
काम करने
वाली कंपनी
बोइंग
डिफेंस
स्पेस एंड
सिक्यूरिटी
के साइट
निदेशक
केविन सी.
हॉसस्ट्रासर
ने बताया कि
एक्स-37बी
यान को
अंतरिक्ष
में भेजने
का खर्च
स्पेस शटल
भेजने के
मुकाबले
काफी कम
होगा।
उल्लेखनीय
है कि ओबामा
प्रशासन ने
मानवयुक्त
अंतरिक्ष
अभियानों
के बजट में
काफी कटौती
कर दी है और 2015
तक के लिए 5
अरब 80 करोड़
डालर की
राशि
आवंटित की
है। एक
अधिकारी ने
नाम न छापने
की शर्त पर
बताया कि
एक्स-37बी का
इस्तेमाल
व्यवसायिक
और सामरिक
उद्देश्यों
के लिए किया
जा सकता है।
यह यान
सामान्य
धरती के
निचले
परिक्रमा
पथ से काफी
ऊपर रहेगा।
निचले
अंतरिक्ष
में ही
ज्यादातर
टोही
उपग्रह
स्थापित
किए जाते
हैं लेकिन
अमेरिका
अपना यान
काफी ऊपर
रखते हुए
टोही कार्य
करना चाहता
है।
नासा
ने
अंतरिक्ष
यान
फीनिक्स के
अभियान को
कहा अलविदा
नासा
ने मंगल
ग्रह पर
भेजे गए
रोबोटिक
अंतरिक्ष
यान
फीनिक्स के
अभियान को
समाप्त
घोषित कर
दिया है। यह
यान दो साल
पहले 25 मई 2008 को
ग्रह के
उत्तरी
ध्रुव की
सतह पर उतरा
था।
सौर
ऊर्जा चलित
मिनिवैन के
आकार वाले
इस
अंतरिक्ष
यान ने करीब
पांच महीने
तक काम
किया। इसने
लाल ग्रह पर
जीवन की
संभावना
तलाशने के
लिए वहां की
मिट्टी के
नमूनों का
विश्लेषण
किया।
लेकिन इसी
बीच मंगल के
उत्तरी
ध्रुव पर
सूरज डूब
गया, जिससे
पूरे इलाके
में
चौबीसों
घंटे का
अंधेरा
छागया और
कड़ाके की
सर्दी
पड़ने लगी।
धरती के समय
के अनुसार,
मंगल ग्रह
को सूरज का
एक चक्कर
लगाने में
करीब दो साल
लगते हैं।
केलिफोर्निया
स्थित जेट
प्रपल्शन
लेबोरेटरी
के नासा के
वैज्ञानिकों
को अब मंगल
की ध्रुवीय
ठंड में
फीनिक्स के
सुरक्षित
रहने की
उम्मीद नहप
है। मंगल का
चक्कर लगा
रहे नासा के
रोबोटिक
अंतरिक्ष
यान 'मार्स
ओडिसी' ने
हाल ही में
फीनिक्स की
लैंडिंग की
जगह के ऊपर
से 61 बार
उड़कर इससे
रेडियो
संपर्क
बनाने की
कोशिश की।
लेकिन
इसमें असफल
रहने के बाद
यह पुष्टि
हो गई कि
फीनिक्स अब
काम करने की
स्थिति में
नहप है।
इसके अलावा
नासा के एक
अन्य
उपग्रह
द्वारा ली
गई
तस्वीरों
में
फीनिक्स के
सोलर
पैनलों को
बर्फ की वजह
से भारी
क्षति
पहुंचने के
भी संकेत
मिले हैं।
मंगल ग्रह
की सतह पर
रोबोट के
माध्यम से
खोज 1970 में
वाइकिंग
कार्यक्रम
के साथ शुरू
हुई थी। तब
से अब तक
फीनिक्स
मंगल की सतह
पर
सफलतापूर्वक
उतरने वाला
छठवां
अंतरिक्ष
यान है।
अब
आवाज की
तरंगें दूर
करेंगी
दर्द
विशेषज्ञों
का दावा है
कि इस नई
तकनीक से
दिमाग को
शांत किया
जा सकता है
और डर को दूर
भगाया जा
सकता है।
इसका
इस्तेमाल
ब्रिटेन के
दंत
विशेषज्ञ
मरीज को
राहत
पहुंचाने
के लिए करते
हैं।
अमेरिका के
न्यूरो
साइंटिस्टों
द्वारा
विकसित
किया गया यह
यंत्र
नूकॉम
मरीजों को
अत्यधिक
चिंता की
स्थिति में
राहत
पहुंचाएगा।
नूकॉम
नामक यह
यंत्र
कार्नियल
इलेक्ट्रोथिरेपी
स्टिम्यूलेशन
सिस्टम (सीइसी)
से जुड़ा
होता है।
इससे
निकलने
वाली
तरंगें
दिमाग को
राहत
पहुंचाती
हैं। इसका
प्रयोग
करने के बाद
दिमाग से
उत्प़ होने
वाली
तरंगें यह
दर्शाती
हैं कि
दिमाग गहरे
आराम की
स्थिति में
पहुंच चुका
है। दिमाग
की वैसी ही
स्थिति हो
जाती है
जैसी नपद या
ध्यान के
समय होती
है। मरीजों
को गहरे रंग
का चश्मा भी
पहनने के
लिए कहा
जाता है और
दिमाग के
रसायन से
संबंधित
टेबलेट दी
जाती है। इस
टेबलेट का
नाम जीबीए
है जो दिमाग
में शांति
की स्थिति
को और गहरा
कर देती है।
क्लीनिकल
ट्रायल से
यह स्थापित
हो चुका है
कि सीइसी
विभि़ तरह
के तनावों
से राहत
दिलाने में
कामयाब
होता है।
विशेषज्ञों
का कहना है
कि इससे
दिमाग को
राहत
प्रदान
करने वाले
रसायन जैसे
डोपैमीन और
सेरोटोनीन
भी रिसते
हैं।
अमेरिकन
डेंटिस्ट
द्वारा
प्रकाशित
एकेडमी ऑफ
जनरल
डेंटिस्ट्री
में
प्रकाशित
प्रायोगिक
औषधि के लेख
के अनुसार
सीइसी के
इस्तेमाल
करने से
दांत की
बीमारी से
पीड़ित
मरीजों की
चिंता और
परेशानी 50
प्रतिशत से
ज्यादा कम
हो जाती है।
कैसे
करता है काम :
कार्नियल
इलेक्ट्रोथेरेपी
स्टिम्यूलेशन
सिस्टम (सीइसी)
से युक्त
नूकॉम
यंत्र
जनरेटर और
हैंडसेट के
जरिए
विद्युत और
आवाज की
तरंगों को
दिमाग में
पहुंचाता
है। पांच
मिनट तक
इसका
प्रयोग
करने के बाद
दिमाग से
उत्प़ होने
वाली
तरंगें यह
दर्शाती
हैं कि
दिमाग गहरे
आराम की
स्थिति में
पहुंच चुका
है।
टीम
जेनेसिस
में भारतीय
मूल के तीन
वैज्ञानिक
तीन
भारतीय
अमेरिकियों
समेत जीनोम
विज्ञानी
जे क्रैग
वेंटर के
नेतृत्व
में
अनुसंधानकर्ताओं
के एक दल ने
कृत्रिम
जीनोम से
नियंत्रित
पहली
जीवाणु
कोशिका
विकसित कर
ली है।
अपनी
खोज को
सार्वजनिक
करते हुए
वेंटर ने
कहा, 'यह पहली
कृत्रिम
कोशिका है,
जिसे बनाया
गया है।'हमने इसे
सिंथेटिक
कहा है
क्योंकि
कोशिका
पूरी तरह
कृत्रिम
क्रोमोसोम
से बनाई गई
है। इसे
रासायनिक
सिंथेसाइजर
पर चार बोतल
रसायन से
तैयार किया
गया।
इसे
तैयार करने
में एक दशक
से अधिक का
वक्त लगा और
इस पर चार
करोड़ डॉलर
की लागत आई
है। यह
अनुसंधान
टीका और जैव
इऔधन जैसे
उत्पादों
के निर्माण
के लिए
उपयोगी
सूक्ष्मजीवों
को तैयार
करने का
रास्ता साफ
करेगा। डॉ.
वेंटर ने
परिवर्तित
कोशिका को
इस ग्रह की
पहली
स्वप्रतिकृति
प्रजाति का
बताया,
जिसका जनक
कम्प्यूटर
है।
उन्होंने
कहा, 'यह
जितनी
तकनीकी
प्रगति है
उतनी ही
दार्शनिक
प्रगति भी
है।
कृत्रिम
कोशिका ने
जीवन की
प्रकृति के
बारे में नए
सवाल खड़े
कर दिए हैं।
अपनी
प्रतिकृति
तैयार करने
में सक्षम
इस कृत्रिम
कोशिका की
कृत्रिमता
और इसे
निर्मित
करने वाली
प्रयोगशाला
से इसकी
संबद्धता
करने के
मकसद से
अनुसंधानकर्ताओं
ने जीन और
प्रोटीन की
वर्णमाला
से इस पर कुछ
संकेत-शब्द
अंकित किए
हैं। इन
संकेत
शब्दों में
भारतीय मूल
की अमेरिकी
वैज्ञानिक
राधा
कृष्णकुमार
का नाम भी
शामिल है, जो
इस
अनुसंधान
में शामिल
रही हैं।
अनुसंधान
में
शामिलअन्य
भारतीय
अमेरिकी
वैज्ञानिकों
में संजय
वाशी और
प्रशांत पी
परमार हैं।
राधा ने
बंगलुरु,
कोलकाता और
चे़ई, में
समय गुजारा
है। वह कहती
हैं, 'यह काफी
दिलचस्प
है। यहां एक
कोशिका बनी
है, जिसमें
मेरा नाम
अंकित है।'
वाशी
अफ्रीका
में सयाने
हुए, जबकि
परमार
अमेरिकी
भारतीय
हैं।
ओरेगन
स्थित
पोर्टलैंड
में रीड
कॉलेज के
दार्शनिक
और 'आर्टिफिशियल
लाइफ' के
संपादक
मार्क
बेदाउ ने
कहा, 'यह जीव
विज्ञान और
जैव
प्रौद्योगिकी
के इतिहास
में
निर्णायक
क्षण हैं।'
मेरीलैंड
स्थित
जॉन्स
हॉपकिन्स
यूनिवर्सिटी
स्कूल ऑफ
मेडिसिन इन
बाल्टीमोर
में खमीर
जीवविज्ञानी
जेफ बोयके
ने कहा, 'यह
सिंथेटिक
जीनोमिक्स
के नए
क्षेत्र
में तकनीकी
मील के
पत्थर का
प्रतिनिधित्व
करता है।'
वेंटर के दल
द्वारा
तैयार
कृत्रिम
जीनोम
प्राकृतिक
जीवाणु के
करीब-करीब
समान है।
फ्लैगस्टाफ
में नार्थ
एरिजोना
यूनिवर्सिटी
में
माल्येक्यूलर
जेनेटिसिस्ट
पॉल कीम ने
कहा, 'जैव
अभियंता
क्रैच से
किसी जीव का
जीनोम
मिश्रण,
मिलान और
पूरी तरह
डिजाइन कर
सकें इसके
पहले अभी
काफी
चुनौतियां
हैं।'
आपकी
जगह मीटिंग
में जाएगा
रिप्रेजेंटेटिव
रोबोट
अगर
आप ऑफिस में
घंटों चलने
वाली
मीटिंग्स
से थक चुके
हैं तो ये
रोबोट आपके
लिए मददगार
साबित हो
सकता है।
क्यूबी नाम
का यह रोबोट
आपके बदले
ऑफिस में
मौजूद रहकर
जरूरी
मीटिंग ले
सकता है।
क्यूबी
को डिजाइनर
बॉब
क्रिस्टोफर
ने विकसित
किया है जो
रोबोटिक
बैबी
डायनासोर
बनाकर
चर्चा में
आए थे। इसे
उन्होंने
प्लियो
डायनासोर
नाम दिया
था। बॉब ने
बताया कि
असल में यह
एक पहिये पर
चलने वाला
टेली-कॉफ्रेंसिंग
सिस्टम है।
कॉफ्रेंस
की सुविधा
इसे आपकी
गैरमौजूदगी
में आपका
मशीनी
प्रतिनिधि
बना देती
है। अगर आप
घर पर हों या
ऑफिस में
अपने कैबिन
में बैठे
हों तो यह
अलग-अलग
कमरों या
अन्य किसी
फ्लोर पर
जाकर किसी
कर्मचारी
से बात करने
में मदद
करता है।
यह
अपनी हाइट
को 3 फीट
से 5.7
फीट तक घटा-बढ़ा
सकता है।
इसमें एक
मेन
कम्प्यूटर
और कई मिनी
कम्प्यूटर
होने के बाद
भी इसका वजन
लगभग साढ़े 15
किलोग्राम
है। इसके
सिर पर एक
एलसीडी
मॉनीटर लगा
है जो वेब
कैमरे से
भेजी गई
इमेज
दिखाता है।
इसकी एक आंख
में 5
मेगा
पिक्सल्स
का वीडियो
कैमरा लगा
हुआ है जो
इसे देखने
में मदद
करता है।
वहप नीचे
देखने के
लिए इसके
सिर पर एक कम
रेसोल्यूशन
का कैमरा
फिट है।
सुनने के
लिए इसमें
तीन
माइक्रोफोन
फिट हैं, जो
टेली-कम्प्यूटर
के पास
आडियो
भेजते हैं।
वहप इसमें
हाई
क्वालिटी
स्पीकर्स
लगा है जो
कम्प्यूटर
की आवाज़ को
रोबोट के
सामने खड़े
शख्स तक
पहुंचाता
है। जल्द
बाजार में
आने वाले इस
रोबोट की
कीमत 10
हजार 500
पाउंड
होगी।
इंटरनेट
पायरेसी का
बढ़ता जाल
पायरेसी
के चलते
दुनियाभर
के फिल्म और
सॉफ्टवेयर
उद्योग को
भारी
आर्थिक
नुकसान
उठाना पड़
रहा है।
चाहे भारत
हो या
अमेरिका,
पायरेसी का
जाल बुरी
तरह से अपना
विस्तार
करता जा रहा
है।
इंटरनेट
के बढ़ते
जाल के साथ-साथ
इसके जरिये
होने वाली
इंटरनेट
पायरेसी का
ग्राफ भी
बढ़ता जा
रहा है।
गैरकानूनी
रूप से किसी
भी फिल्म,
संगीत,
सॉफ्टवेयर
या फिर गेम
को डाउनलोड
करना तो
पायरेसी
करने वालों
के बाएं हाथ
का खेल है।
पायरेसी के
चलते
दुनियाभर
के फिल्म
उद्योग और
सॉफ्टवेयर
उद्योग को
भारी
आर्थिक
नुकसान
सहना पड़
रहा है।
चाहे भारत
हो या
अमेरिका,
पायरेसी का
जाल बुरी
तरह से अपना
विस्तार
करता जा रहा
है।
बॉलीवुड की
फिल्मों का
क्रेज अब
अमेरिका
में भी बढ़
रहा है
लेकिन इसके
साथ ही वहां
हिंदी
फिल्मों पर
खतरा
मंडराने
लगा है। यह
खतरा है-
इंटरनेट
पायरेसी का,
क्योंकि
कोई भी
फिल्म या
उसका संगीत
जारी होने
से पहले ही
वह पायरेसी
का शिकार हो
जाता है।
अगर समय
रहते
इंटरनेट
पायरेसी पर
काबू नहप
पाया गया तो
इसका खतरा
बढ़ता
जाएगा।
इसका
दुष्परिणाम
इस उद्योग
से जुड़े
लाखों
लोगों को
झेलना
पड़ेगा।
इंटरनेट
पायरेसी के
परिणाम और
उसे रोकने
को लेकर कई
संस्थाएं
अध्ययन
करवा रही
हैं। हाल ही
में
इंटरनेशनल
चैम्बर ऑफ
कॉमर्स के
लिए पेरिस
की टेरा
कंसल्टेंट्स
द्वारा
कराये गये
अध्ययन के
अनुसार,
यूरोपियन
म्यूजिक,
फिल्म,
टेलीविजन
और
सॉफ्टवेयर
की होने
वाली
ऑनलाइन
पायरेसी के
कारण आने
वाले पांच
बरसों में
दस लाख
लोगों के
बेरोजगार
होने और 240
अरब पौंड के
बिजनेस को
नुकसान
पहुंचने का
खतरा मंडरा
रहा है।
इंटरनेट
पायरेसी पर
हुए इस
नयेअध्ययन
ने स्पष्ट
किया है कि
यह खतरा
गैरकानूनी
रूप से
डाउनलोडिंग
करने से
लगातार
बढ़ता जा
रहा है।
अध्ययन में
पाया गया कि
इस तरह की
इंडस्ट्री
ने 2008 में
सवा करोड़
लोगों को
जॉब देते
हुए 860 अरब पौंड
का बिजनेस
किया।
लेकिन उसी
साल इस
इंडस्ट्री
ने 10 अरब पौंड
का घाटा
उठाया,
जिससे 186,000
लोगों को
अपनी नौकरी
से हाथ धोना
पड़ा।
गैरकानूनी
रूप से
ऑनलाइन
डाउनलोडिंग
और दूसरों
को पायरेसी
तकनीक के
बारे में
अवगत कराने
का ट्रंड
लगातार चल
रहा है
जिससे यह
कारोबार
दिन-दूना
रात-चौगुना
फल&फूल रहा
है। इसके
परिणामस्वरूप
2015
तक दस लाख
बीस हजार से
ज्यादा
लोगों के
बेरोजगार
होने और
लगभग 240
अरब पौंड के
नुकसान
होने का
अनुमान है।
कैंसर का
पता लगाएगी 'इलेक्ट्रॉनिक
नाक'
वैज्ञानिकों
ने दावा
किया है कि
अंतरिक्ष
शटल एंडेवर
में हवा की
गुणवत्ता
का पता
लगाने के
लिए
अमेरिकी
स्पेस
एजेंसी
नासा
द्वारा
विकसित की
गई 'इलेक्ट्रॉनिक
नाक' का
इस्तेमाल
मस्तिष्क
कैंसर का
पता लगाने
में भी किया
जा सकता है।
ब्रैन
मैपिंग
फाउंडेशन
की अगुवाई
में किए गए
अध्ययन में
पाया गया है
कि यह 'इलेक्ट्रॉनिक
नाक'
मस्तिष्क
की सामान्य
व
कैंसरग्रस्त
कोशिकाओं
की गंध के
आधार पर
उनका पता
लगा लेती
है। इसके
अलावा यह
स्टेम सेल
के
विस्थापन
को भी परखने
में सक्षम
है। इसकी इन
खूबियों से
बीमारी का
चित्रमय
विश्लेषण
करना
मुमकिन हो
गया है। यह
निष्कर्ष
मस्तिष्क
और शरीर के
अन्य अंगों
की
कोशिकाओं
पर कई
प्रयोगों
के बाद
निकाला है।
ब्रेन
मैपिंग
फाउंडेशन
से जुड़े
वैज्ञानिक
बाबैक
काटेब का
कहना है कि
यह अध्ययन
भविष्य में
किए जाने
वाले शोध
कार्य़ों
के लिए
बुनियाद बन
सकता है।
ब्रेन
म्यूजिक से
होगी
थकान कम
आपको
यह जानकर
ताज्जुब
होगा कि
हमारा
दिमाग खुद
संगीत की
धुनें पैदा
करता है। ये
धुन
प्राकृतिक
रूप से
हमारे शरीर
की थकान दूर
करती है और
उबासी को
मिटाकर
हमारे अंदर
उत्साह
जगाती है।
अब
वैज्ञानिक
इन धुनों को
डिकोड करने
की कोशिश कर
रहे हैं। वे
पियानों के
जरिए इन
धुनों को
बनाने की
कोशिश कर
रहे हैं।
अगर वे
कामयाब रहे
तो ऑफिस में
दिन भर काम
के बोझ से
थककर जब आप
पस्त होकर
घर लौटेंगे,
तो इस ब्रेन
म्यूजिक के
जरिए कुछ ही
मिनटों में
फिर से खुद
को तरोताजा
बना
सकेंगे।
अमेरिका के
डिपार्टमेंट
ऑफ होमलैंड
सिक्युरिटी
के साइंस
एंड
टेक्नोलॉजी
(एसएंडटी)
डायरेक्टरेट
ने इस विषय
में स्टडी
शुरू की है।
उनका मकसद
ऐसा ब्रेन
म्यूजिक
बनाना है,
जिसकी
फ्रीक्वेंसी,
ड्यूरेशन
और आवाज ठीक
वैसी ही हो,
जैसा हमारे
दिमाग के
म्यूजिक का
होता है।
इससे
इनसोमिन्या
(नपद न आने की
बीमारी),
थकान और
भागदौड़ के
कारण पैदा
होने वाले
सिरदर्द
जैसी आम
समस्याओं
से निजात
मिल सकेगी।
एसएंडटी के
प्रोग्राम
मैनेजर
रॉबर्ट
बर्न्स के
मुताबिक,
वैज्ञानिक
अभी ब्रेन
म्यूजिक के
जरिए दिमाग
की दो
स्थितियों
को कंट्रोल
करने की
कोशिश कर
रहे हैं।
पहली,
रिलैक्स
करना यानी
थकान कम
करना और नपद
की
क्वालिटी
सुधारना।
और दूसरी,
अलर्ट
बनाना, ताकि
किसी चीज पर
ज्यादा
बेहतर
तरीके से
ध्यान
केंौित
किया जा सके
और निर्णय
लेने की
क्षमता को
बेहतर
बनाया जा
सके।
संकलन
: विनीता, रवि
qqq
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