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विज्ञान समाचार
कार्बन डाइऑक्साइड का इंजेक्शन वजन घटाएगा!
ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए
जिम्मेदार गैस कार्बन डाइऑक्साइड अब आपका वजन घटाने में भी मददगार हो
सकती है। इटली की सिएना यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस गैस का एक ऐसा
इंजेक्शन बनाने का दावा किया है, जो शरीर के विभिन्न स्थानों की चर्बी
घटाएगा।
शोधकर्ताओं ने इस नए
इंजेक्शन का इस्तेमाल उन 48 महिलाओं पर किया, जिनके घुटनों, जांघों और
पेट पर चर्बी जमा थी। प्रयोग के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि महिलाओं की
जांघों का आकार औसतन दो सेंटीमीटर तक कम हो गया। कार्बोक्सी थेरैपी
नामक इस नए इलाज में एक पतली सुई की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड को त्वचा
के भीतर इंजेक्ट किया जाता है। गैस आसपास के उत्तकों में घुल जाती है,
जिससे रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती हैं। चौड़ी रक्त वाहिकाओं से खून की
आपूर्ति अधिक होती है, जिसके साथ उस स्थान तक अधिक ऑक्सीजन और पोषक
तत्व पहुंचते हैं।
हालांकि यूनिवर्सिटी
कॉलेज ऑफ लंदन के प्रोफेसर निक फिनर ने कहा कि इस थेरैपी से मोटे लोगों
की कमर कम जरूर हो जाएगी, लेकिन यह स्थाई इलाज नहीं है।
डाक
विभाग की मोबाइल मनीऑर्डर सेवा जल्द
इस वर्ष में भारतीय डाक
विभाग ग्राहकों के लिए क्रांतिकारी सेवा की पेशकश करने की योजना बना रहा
है। जल्द ही भारतीय डाक विभाग मोबाइल फोन से मनीऑर्डर भेजने की सेवा
शुरू कर सकता है।
हालांकि इसके लिए
दूरसंचार विभाग से डाक विभाग को मंजूरी लेना बाकी है। साथ-साथ इसी साल
डाक विभाग कई तकनीकी सेवाएं शुरू करने की योजना बना रहा है। 2009 में
डाक विभाग ने ई-सेवा शुरू की थी और अब मोबाइल फोन से मनीऑर्डर की योजना
शुरू की जा रही है। इससे पहले रिजर्व बैंक ने मोबाइल से पैसे के
स्थानांतरण की सुविधा शुरू करने की मंजूरी दी थी। इस सेवा के जरिए अगर
ग्राहक किसी दूसरे शहर में है और वह अपने गांव पैसा भेजना चाहता है तो
उसे नजदीकी डाक घर में जाकर मोबाइल से मनीआर्डर भेजने की बात कहनी होगी।
इसके बाद डाकघर अधिकारी संबंधित गांव के नजदीकी डाकघर को फोन करेगा और
उस गांव में भेजने वाले के घर पर मनीआर्डर देने की सूचना देगा। इसके
कुछ ही देर बाद उसके गांव में पैसा मिल जाएगा। अधिकारी के मुताबिक
मोबाइल फोन सेवा की बढ़ रही गति और ब्रॉडबैंड कनेक्शन की वजह से डाक
विभाग ने इस सेवा का लाभ उठाने का फैसला लिया है। अभी एटीएम से विमान
के टिकट बुक करने कीसेवा भी डाक विभाग देने के लिए योजना बना रहा है।
अधिकारी ने बताया कि अगले तीन सालों में तीन लाख गांवों में ब्राड बैंड
की सुविधा देने की योजना है। 2012 तक आधे देश में ब्रॉड बैंड का
नेटवर्क तैयार हो जाने की उम्मीद है। इस माध्यम से ग्रामीण इलाकों में
ई-मेडिसिन, ई-हेल्थ जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। डाकघर में विदेशी मुद्रा
उपलब्ध कराने की भी बात चल रही है और इसके लिए थामस कुक कंपनी के साथ
करार की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इन सब सेवाओं के साथ डाक विभाग
2010 से मोबाइल मनीआर्डर, ई-मेडिसीन, ई हेल्थ, रेलवे आरक्षण, विदेशी
मुद्रा आदि की सेवाएं प्रदान कर सकेगा, जिसका लाभ ग्रामीण इलाकों के
लोग उठा सकेंगे। डाकघर में रेलवे टिकट कई शहरों में पहले से बिक रहे
हैं।
नई-नई सुविधायें
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शहर में रह रहे लोग आसानी से भेज सकेंगे गांव में पैसा।
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डाक घर में विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने पर चल रही है बातचीत।
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ब्रॉड बैंड कनेक्शन में आ रही तेजी के कारण डाक विभाग ने लिया
निर्णय।
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विमान के टिकट बुक करने की सेवा भी शुरू करने की तैयारी।
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इस समय रेल टिकट बुक कर रहा है डाक विभाग।
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विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने की भी बात चल रही है।
टेक्नॉलॉजी बनेगी नई संजीवनी
आने वाला दशक भारत को
स्वास्थ्य और फार्मा क्षेत्र में काफी मजबूती के साथ स्थापित करेगा। यह
ऐसा दौर होगा जिसमें हर किसी को अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होंगी
और कई रोगों के इलाज के लिए नई दवाओं की खोज के मामले में भारतीय दवा
उद्योग शीर्ष पांच देशों में शामिल होगा और पूरी दुनिया को सस्ती एवं
बेहतर दवाएं मुहैया कराने वाला सक्षम राष्ट्र होगा।
अगले दशक के दौरान देश में स्टेम सेल उपचार की
पद्धति स्थापित हो जाएगी। इससे डायबिटीज, कैंसर, खराब लीवर आदि गंभीर
रोगों का इलाज संभव होने लगेगा। स्टेम सेल किसी भी अंग में ढल सकती है।
अत इससे शरीर के नष्ट हो चुके हिस्सों को फिर से बनाने का दौर शुरू होगा।
भारत में फिलहाल स्टेम सेल के उपचार संबंधी कानून नहीं हैं, लेकिन आने
वाले दशक में कानून भी अपनी जगह होंगे और स्टेम सेल पर शोध भी परवान
चढ़ेगा।
नया दशक कैंसर मरीजों के
लिए भी आशा की किरण लेकर आएगा। कैंसर के टीके काफी प्रचलित होंगे और
व्यक्ति की जरूरतों के मुताबिक टीके एवं दवा बनने का सिलसिला चालू हो
जाएगा। मानव जीनोम के पढ़े जाने के बाद अब नई और विशिष्ट दवाएं विकसित
की जाने लगेंगी। सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि अधिकतर नई दवाओं की खोज
और उन पर शोध भारत में हो सकेगा। बीते दशकों में भारत जहां जेनेरिक
दवाओं के क्षेत्र में अपना लोहा मनवा चुका है, वहीं अब नई दवाओं की खोज
में भी उसकी अच्छी धाक होगी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी पहल
क्लोनिंग के रूप में देखने को मिलेगी। वैसे तो क्लोनिंग यानी एक ही जीव
की दूसरी प्रतिलिपि बनाना, मानवों से अधिक उच्च प्रजाति के पशुओं को
विकसित करने में अधिक उपयोग में लाई जाएगी, लेकिन पर्यटन के तहत देश
में स्टेम सेल पद्धति द्वारा उपचार के लिए विकसित देशों से भी मरीज आने
लगेंगे। देश में सूचना तकनीक (आईटी) के प्रचार-प्रसार से अगले दस वर्षों
में टेलीमेडिसिन की पहुंच सुदूर क्षेत्रों में होगी और आईटी का प्रसार
होने से टेलीमेडिसिन के जरिए सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी विशेषज्ञों
की राय उन तक पहुंच सकेगी। इसके अलावा विशिष्ट पहचान संख्या (यूआईडी)
परियोजना के पूरा होने के साथ ही लोगों के स्वास्थ्य डाटा एवं उनकी
विशेष रुचियों के आंकड़े भी एक बड़े और नए कारोबार का हिस्साहोंगे।
टेलीमेडिसिन में वायरलेस ब्रॉडबैंड कनेक्शन के जरिए देश के हर गांव में
तेज गति से डाटा टासफर करने वाले इंटरनेट कनेक्शन होंगे जिससे मरीजों
की पूरी रिपोर्ट भी डाक्टरों के पास पहुंच सकेगी। इसी के मद्देनजर
देश-विदेश की प्रमुख आईटी कंपनियां स्वास्थ्य क्षेत्र में विभिन्न
समाधानों के लिए निवेश कर रही हैं। आईटी का उपयोग पूरे स्वास्थ्य
क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए किया जा रहा है। टेलीमेडिसिन, पिक्चर
आरकाइविंग एंड कम्युनिकेशन सिस्टम्स व स्वास्थ्य सेवा सूचना प्रणाली
कुछ ऐसी आईटी व्यवस्थाएं हैं, जिनसे स्वास्थ्य क्षेत्र में आईटी की
पहुंच और मजबूत होती जा रही है।
सपने
होंगे साकार
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स्टेम सेल उपचार होगा सच।
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डायबिटीज व कैंसर का भी इलाज होगा संभव।
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भारत फार्मा रिसर्च में होगा शीर्ष पर।
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नई दवाओं की खोज में भी देश की होगी धाक।
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क्लिनिकल टायल में भारत होगा विश्व के शीर्ष पांच देशों में।
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दुनिया को सस्ती व बेहतर दवाएं मुहैया कराने वाला राष्ट्र होगा
भारत।
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क्लोनिंग के रूप में देखने को मिलेगी बड़ी पहल।
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सुदूर क्षेत्रों में भी हो जाएगी टेली-मेडिसिन की पहुंच।
ग्रीन एनर्जी के नाम अगले दस साल
अगले दस वर्षों के दौरान बिजली के क्षेत्र में काम
करने का तरीका ही बदल जाएगा। मौजूदा समय में ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी
कंपनियां तकनीक में बदलाव के लिए छोटी कंपनियों से गठजोड़ करने के
साथ-साथ उनको प्रोजेक्ट के ठेके देने पर विवश हो जाएंगी। कोयले की कमी
से जूझ रहे थर्मल पावर प्लांटों को विदेशों से कोयला मंगाना पड़ेगा। ऐसे
में कोयले को विदेशों से लाकर भारतीय बिजली कंपनियों के प्लांटों तक
पहुंचाने का कारोबार अगले कुछ वर्षों में तेजी से फैलेगा। आने वाले दस
साल बिजली उत्पादन के क्षेत्र में सौर, पवन ऊर्जा, पनबिजली व परमाणु
ऊर्जा के होंगे।
पिछले कई सालों से सिर्फ पावर प्लांट स्थापित करने
की होड़ में लगी बिजली कंपनियों के लिए आने वाले दस साल ढेर सारी
चुनौतियां लेकर आने वाले हैं। ये चुनौतियां कोयले की कमी की होंगी, ये
चुनौतियां बेहतर तकनीक की होंगी और ये चुनौतियां बेहतर मानव संसाधन की
होंगी, जिनकी मांग एवं सप्लाई अगले कुछ सालों में बदल जाएंगी।
दरअसल, ये बदलाव अचानक
नहीं आ रहे हैं, बल्कि पिछले कुछ सालों से इसके संकेत सरकार और बिजली
कंपनियों सभी को मिलने शुरू हो गए थे। जहां तक भारत का सवाल है, पिछले
दो सालों से जिस तरह से कोयले की कमी के कारण थर्मल पावर प्लांट बंद
होने शुरू हुए हैं और नए प्लांटों के लिए कोयले की आपूर्ति मुश्किल हो
रही है, उसे देखते हुए कंपनियों के प्रबंधकों के माथे पर बल पड़ने शुरू
हो गए हैं। कई कंपनियों ने तो विदेशों से कोयला आयात कर अपने प्लांट को
चलाने का बंदोबस्त किया है। अगले कुछ सालों में थर्मल प्लांट को चलाने
के लिए सबसे बड़ी समस्या कोयले की होगी। देश की सबसे बड़ी बिजली कंपनी
एनटीपीसी को अपने प्लांट चलाने के लिए सालाना 15 करोड़ टन कोयले की
जरूरत होती है, जिसमें से 11.4 करोड़ टन कंपनी को कोल इंडिया से मिल
जाता है। शेष कोयले की पूर्ति के लिए कंपनी 1.2 करोड़ टन कोयला आयात
करती है। साथ ही कई बार कोयले की कमी के कारण कंपनी कई प्लांटों को तय
क्षमता से कम पर भी चलाती है।
यही कारण है कि कंपनी
अब इंडोनेशिया में अपने लिए कोयले की खदानें ढूंढ रही है। कंपनी ने वहां
कई ब्लॉक भी देख लिए हैं, जिनको खरीदने की बातचीत कंपनी कर रही है। साथ
ही विदेशी खदानों से भारत में कोयला लाने और उसे प्लांटों तक पहुंचाने
के लिए कंपनी खुद की
टासपोर्ट कंपनी तक बनाने की दिशा में काम कर रही
है। कोयले की कमी और आने वाले समय में इसकी सप्लाई में ज्यादा कमी के
अंदेशे को देखते हुए एनटीपीसी भी इस कोशिश में है कि वह न्यूक्लियर
एनर्जी, हाइड और सौर ऊर्जा तकनीक पर ज्यादा ध्यान दें। इसमें कच्चे
माल की बहुत कम जरूरत पड़ती है। कंपनी ने इसी को देखते हुए उत्तरांचल
और हिमाचल में कई हाइडा प्रोजेक्ट शुरू किए हैं, जिनमें से तपोवन
प्रोजेक्ट अगले दो सालों में उत्पादन शुरू कर देगा। कंपनी ने
न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन के साथ भी एक संयुक्त उपक्रम बनाकर
न्यूक्लियर पावर प्लांट की दिशा में काम शुरू किया है।
इसी तरह एनएचपीसी भी
अगले पांच सालों के दौरान हाइडःाs क्षेत्र में अपनी उत्पादन क्षमता को
5000 मेगावाट से बढ़ाकर 10,000 मेगावाट करने जा रही है। यह कंपनी
मध्यप्रदेश में 100 मेगावाट का एक सौर ऊर्जा प्लांट लगाने पर भी काम कर
रही है। इसी तरह बाकी कंपनियां भी यह समझ रही हैं कि ग्रीन एनर्जी में
ही उज्जवल भविष्य निहित है। यानी अगले कुछ सालों में विंड टरबाइन, सौर
पैनल, न्यूक्लियर टरबाइन और इनसे जुड़ी तकनीकों का ही जमाना होगा। कुछ
कंपनियों ने इसको भांपकर इस दिशा में काम शुरू भी कर दिया है।
अगले
दशक का सूरते-हाल
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सौर, पवन ऊर्जा, पनबिजली व परमाणु ऊर्जा पर रहेगा कंपनियों का
ध्यान।
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सौर पैनल, विंड व न्यूक्लियर टरबाइन से जुड़ी तकनीकों का ही होगा
जमाना।
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इनसे जुड़े उद्योग-धंधे बढ़ेंगे खूब तेजी से।
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बिजली क्षेत्र में बदल जाएगा काम करने का तरीका।
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बड़ी कंपनियां तकनीक में बदलाव के लिए छोटी कंपनियों से करेंगी
गठजोड़।
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कोयले को विदेश से लाकर बिजली प्लांटों तक पहुंचाने का कारोबार तेजी
से फैलेगा।
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रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करेगी गैस
अगला दशक पूरी तरह से
गैस आधारित होगा। देश के विभिन्न क्षेत्रों खासकर केजी बेसिन और पूर्वी
तटों पर मिलने वाले विपुल गैस भंडार को देखते हुए देश में गैस की कमी
नहीं होगी। सिटी गैस परियोजनाओं की बाढ़ सी आ जाएगी। इसका उपयोग सीएनजी
से लेकर पीएनजी तक धड़ल्ले से होगा। गैस का उपयोग न केवल बिजली संयंत्रों,
उर्वरक संयंत्रों, कुकिंग और वाहनों के लिए होगा बल्कि गैस से ही
टेलीविजन चलाने से लेकर इस्तरी करने की भी विधा विकसित हो जाएगी।
देश को मिलने वाले गैस
स्रोत में एक बड़ा हिस्सा समुद्र की गहराइयों में छुपे गैस
हाइडट का
भी होगा। इस स्रोत का दोहन करने पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा से कई दशकों
तक पूरे देश की प्राकफढतिक गैस की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।
अभी पिछले दिनों भारत ने कफढष्णा गोदावरी बेसिन की तलहटी में 128 मीटर
मोटी परत के गैस
हाइडट को खोजने में सफलता पाई। इस प्रकार के गैस
हाइडट की तलाश में कामयाबी पाने वाले देशों के क्लब में भारत भी तीसरे
देश के रूप में शामिल हो गया। भारत के अलावा, अमेरिका और जापान को ही
गैस हाइडट की खोज में सफलता मिली है।
देश
में लगभग 20 हजार खरब घन मीटर गैस हाइडट के भंडार हैं, जो समुद्र की
अथाह गहराइयों या अन्य स्थानों पर गहरे पानी में परत दर परत जमी हुई
है। गैस हाइडट से प्राकफढतिक गैस बनाने और इसे व्यवसायिक तौर पर
योग्य बनाने के लिए देश भर में कई स्थानों पर वैज्ञानिक संगठन अनुसंधान
और विकास कार्यक्रम चला रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि देश में समुद्र
के गहरे पानी में छुपे गैस
हाइडट के भंडारों का यदि पांच फीसदी भी
प्राकफढतिक गैस के तौर पर उपयोग में लाया जा सका तो देश भर में ऊर्जा
के क्षेत्र में यह एक बड़ी सफलता होगी। गैस हाइडट से प्राप्त गैस का
उपयोग बिजली उत्पादन के संयंत्रों पर किया जा सकेगा। यही नहीं, इस गैस
का उपयोग उर्वरक उत्पादन करने वाले संयंत्रों के लिए भी किया जा सकेगा,
जिससे देश में ऊर्जा एवं कफढषि उत्पादों की कमी को न केवल पूरा किया जा
सकेगा बल्कि उसका निर्यात भी किया जा सकेगा। देश में गैस की उपलब्धता
बड़े पैमाने पर होने के बाद गैस का उपयोग पानी गरम करने से लेकर एसी
चलाने, खाना बनाने से वाहन चलाने जैसे रोजमर्रा की अनेक जरूरतों के लिए
किया जा सकेगा। अगले दशकमें सरकार केजी बेसिन, बाड़मेर आदि नई गैस खोजों
को देखते हुए अलग नेशनल गैस ग्रिड प्राधिकरण बनाने की योजना भी बना रही
है।
खुद
ब खुद डाइव होगी कार
यह कल्पना अपने आप में
कितनी सुखद हो सकती है कि आप कार की बैक सीट पर बैठे हैं और कार खुद ब
खुद डाइव हो रही है। या रोज सुबह कार डाइव करके ऑफिस जाते समय आपको
अक्सर यह ख्याल आता होगा कि काश आराम से ऊंघते हुए चले जाते और कार खुद
ब खुद आफिस पहुंच जाती। ऐसी कल्पना करने वालों के लिए खुशखबरी है।
वैज्ञानिक ऐसी कार बनाने के लिए कमर कस चुके हैं और अपने आप डाइव होने
वाली कार की कल्पना को साकार रूप देने के काम में जुट चुके हैं। माना
जा रहा है कि अगले 10 सालों में ऐसी कार सड़कों पर अपना जलवा दिखाने
लगेगी। वैज्ञानिकों ने इन कारों को सेल्फ डाइव व्हीकल नाम दिया है।
डेली टेलीग्राफ के मुताबिक, यूरोपियन टीम सेल्फ डाइव व्हीकलों के रोड
टेस्ट अगले साल से शुरू करने वाली है।
साइंटिस्टों की यह टीम एक ब्रिटिश कंपनी की देखरेख
में काम कर रही है। इस प्रोजेक्ट का नाम साट या सेफ रोड
टांस फॉर द
एन्वॉयरनमेंट रखा गया है। सेल्फ डाइव कार के आईडिए के पीछे की थ्योरी
कार पूलिंग पर बेस्ड है और बड़ी दिलचस्प है। इसके तहत छह से आठ कारों
की एक रोड टड बनाई जाएगी। इसके तहत छह से आ” कारों की एक रोड
टन
बनाई जाएगी। मतलब ये कारें
टन के डिब्बों की तरह एक दूसरे के पीछे
चलेंगी। ये सभी कारें एक दूसरे से इनको लीड करने राले लीड व्हीकल से
नेविगेशन सिस्टम और टांसमीटर यूनिट के माध्यम से जुड़ी होंगी।
यह लीड व्हीकल कोई टैक्सी, बस या टक हो सकता है।
इसे कोई इंसान ही डइव कर रहा होगा, जो पूरे कारवां पर नजर रखेगा। अब
चूंकि पीछे चलने वाली कारों के
डाइवरों के पास कोई काम नहीं होगा तो
वे बातचीत, चैटिंग या आराम कुछ भी कर सकेंगे। जैसे ही कोई कार अपनी
मंजिल के करीब आएगी, उसमें बैठा शख्स इसका कंटाल अपने हाथ में ले लेगा
और इस कारवां से अलग होकर साइड में आ जाएगा। पिछली कार आगे बढ़ाकर गैप
भर देगी। सवाल उठता है, इसका फायदा क्या होगा। वैज्ञानिक इसके दो फायदे
बताते हैं। पहला, इससे ईधन की बचत होगी। वह इसलिए कि जब कारें एक दूसरे
के नजदीक चलेंगी तो उन्हें हवा के खिलाफ कम ताकत लगानी होगी। इससे 20
फीसदी ईंधन बचेगा। दूसरा फायदा यह है कि एक-दूसरे के करीब चलने से ये
सड़क का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगी।
साट परियोजना का सड़क
पर तीन सालों का परीक्षण 2011 में शुरू होगा और इसे ब्रिटेन, स्पेन और
स्वीडन की सड़कों पर अंजाम दिया जाएगा। द टेलीग्राफ ने ऑटोमोटिव
इंजीनियरिंग कंपनी रिकार्डो यूके के कोआर्डिनेटर के हवाले से कहा कि
साट प्रोजेक्ट यूरोपियन इंडसटा और शैक्षणिक संस्थाओं की तकनीक,
कौशल और विशेषज्ञता का अनूठा मिश्रण होगा। उन्होंने कहा कि सेल्फ डाइव
तैयार करने का मकसद सुरक्षित और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाने
वाली रोडन को प्रोत्साहित करना है।
साट प्रोजेक्ट का मकसद सुरक्षित और पर्यावरण के
लिए लाभदायक
रोडटन की कल्पना को साकार करना है। इसके लिए सड़कों के
इंफ्रास्टक्चर में अतिरिक्त निवेश की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सांसों
को समझेगा मोबाइल
अब
मोबाइल की टिन-टिन से इरीटेट होने की जरूरत नहीं है। अमेरिका की एक
कंपनी ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे मोबाइल आपकी सांसों से
नियंत्रित होगा। आपको इसके लिए एक हेडसेट लगाना होगा और काल आने पर
हेडसेट में अपनी सांस बाहर निकाल कर आप काल रिसीव कर सकेंगे। इस तकनीक
का इस्तेमाल मोबाइल तक ही सीमित नहीं। भविष्य में सेना के जवान,
फैक्टा में काम करने वाले कर्मचारी और वीडियो गेम्स के शौकीन इसका
इस्तेमाल करते हुए नजर आ सकते हैं। माइक्रोसॉप्टसहित कई नामी गिरामी
कंपनियों ने इस तकनीक के व्यवसायिक इस्तेमाल को लेकर दिलचस्पी दिखाई
है।
आपके व्यस्ततम पलों
में अक्सर आपके मोबाइल पर आने वाली काल आपको डिस्टर्ब करती है। आज के
सूचना तकनीकी युग में आप आने वाली काल को इग्नोर भी नहीं कर सकते हैं।
ऐसे में एक ऐसे मोबाइल की कल्पना कितनी सुखद लगती है कि जिससे बिना बटन
दबाए सिर्फ हेडसेट में अपनी सांस बाहर निकाल कर आप कॉल रिसीव कर सकते
हैं। वक्त बे वक्त आने वाली काल से इरीटेट होने के दिन अब गए। जी हाँ!
आने वाले दिनों में अब आप ऐसा ही मोबाइल खरीद सकेंगे। सांसों से
नियंत्रित होने वाली क्रांतिकारी तकनीक की बदौलत अब ऐसा हो सकेगा। इस
तकनीक का नाम सेंसावाप्ट है। कंपनी के अनुसार अगर चीजें तय योजना के
मुताबिक रहीं तो सांसों से नियंत्रित होने वाली तकनीक का इस्तेमाल
विकलांगों के लिए सहायक उपकरण बनाने से लेकर तमाम तरह के गैजेट्स और
हैंड-फ्री मोबाइल के निर्माण में किया जा सकता है। द टेलीग्राफ अखबार
ने कंपनी के सूत्रों के हवाले से बताया है कि सेंसा वाप्ट
माइक्रो-इलेक्ट-मैकेनिकल सिस्टम्स यानी एक छोटी चिप से युक्त है जिसे
अन्य डिवाइसों जैसे वीडियो गेम या हैंड फ्री मोबाइल सेट में भी लगाया
जा सकता है। कंपनी का कहना है कि वह वीडियो गेम्स को नई ऊंचाइयों पर ले
जाने के लिए सांसों से नियंत्रित होने वाली तकनीक के बारे में बड़ी
वीडियो गेम निर्माता कंपनियों से बातचीत कर रही है। अगर वीडियो गेम में
इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है तो वीडियो गेम वर्ल्ड में एक नई
क्रांति आ जाएगी और यूजर्स को वीडियो गेम्स इस्तेमाल करने का नया अनुभव
होगा। माइक्रोसॉप्ट ने इस तकनीक का व्यवसायिक इस्तेमाल करने में
दिलचस्पी दिखाई है और अपने प्रोजेक्ट नटाल के साथ मोशन सेंसटिव
टेक्नॉलॉजी पर भारी निवेश किया है। आने वाले दिनों में और कई नामी
गिरामी कंपनियां इस तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल में दिलचस्पी दिखा
सकती हैं।
कंपनी के सह संस्थापक
सेलिने विगनाल ने कहा कि इस तकनीक की मदद से आप क्रीन के आस-पास कर्सर
या कैरेक्टर उतनी ही एक्यूरेसी के साथ मूव करा सकते हैं जितनी एक्यूरेसी
से अंगुली से माउस को मूव कराया जाता है। उन्होंने कहा कि इस तकनीक में
काफी संभावनाएं निहित हैं। यहां तक कि इसका इस्तेमाल सेना के जवान और
फैक्टा के कामगार भी कर सकते हैं। सेना के जवान और कामगार अपने दोनों
हाथों से लगातार काम करते हैं और ऐसे में इस तकनीक की मदद से वे अपने
काम को रोके बिना मोबाइल पर बातचीत कर सकते हैं। हाल ही में लासवेगास
में कंज्युमर इलेकटानिक शो में इस तकनीक का प्रदर्शन किया गया और
डिमांस्टशन प्रोडक्ट पर दिखाया गया कि क्रीन के आसपास कर्सर को मूव
कराने के लिए यूजर्स हेडसेट में सांस ले सकते हैं। हेडसेड में चार छोटे
सेंसर्स लगे होते हैं। क्रीन पर सेंसर को घुमाने के लिए यूजर्स को अपनी
सांस दाएं से बाएं और ऊपर से नीचे मूव करानी होती है जैसे कि एक मेज पर
काल्पनिक पिंग पांग बाल घुमानी होती है। गैजेट एक्सपर्ट इस तकनीक में
निहित असीम संभावनाओं को लेकर उत्साहित हैं। लेकिन कुछ लोगों में इस
बात को लेकर संदेह है कि इस तकनीक की मदद से मुख्यधारा के प्रोडक्ट
तैयार किए जा सकते हैं। गिज्मोडो वेबसाइट के कांटब्युटिंग एडीटर ने
कहा कि यह तकनीक बेहद शानदार है और इसमें असीम संभावनाएं निहित हैं।
हालांकि इस तकनीक में निहित संभावनाओं का दोहन करने के लिए जरूरत है कि
बड़े मैन्युफैक्चरर इसको एडाप्ट करें। हालांकि यह सवाल अपनी जगह पर
लाजिमी है कि वीडियो गेमर्स अपने सिर पर हेडसेट लगाना चाहेंगे या नहीं।
मैं इस बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकता।
बीपीओ कारोबार के लिए आईबीएम करेगी भर्तियां
आईटी कंपनी आईबीएम भारत में बीपीओ कारोबार बढ़ाने
जा रही है। इसके लिए कंपनी इस साल करीब 5,000 भर्तियांकर सकती है।
बीपीओ पोलैंड के सीनियर एडवायजरी कंसल्टैंट सेल्बी मैचेंहास ने बताया
कि भारत के कई क्षेत्रों में बीपीओ सेवा बढ़ाने की योजना है। इसके लिए
साल के दौरान करीब 5,000 कर्मचारियों की भर्ती की जाएगी। उन्होंने बताया
कि अर्थव्यवस्था में सुधार दिख रहा है। आने वाले दिनों में इससे
कारोबार बढ़ाने में मदद मिलेगी। लिहाजा कंपनी मानव संसाधन को भी
दुरुस्त करने में जुटी हुई है।
गौरतलब है कि पिछले साल के दौरान मंदी की वजह से
कई आईटी कंपनियों की सेहत खराब हो गई थी। लेकिन अब हालात सुधरते देख
आईबीएम जैसी कई कंपनियां विस्तार योजनाओं में जुट गई हैं। फिलहाल देश
में मुंबई, हैदराबाद, पूणे, गुड़गांव और कोलकाता में आईबीएम के बीपीओ
सेंटर हैं। विस्तार योजनाओं के तहत कंपनी और यूनिट खोलने पर विचार कर
रही है।
पिछले साल मंदी की वजह से कंपनी ने कोई विस्तार
योजना पर काम नहीं किया। लिहाजा कंपनी में बहाली भी नहीं हुई। हालांकि
इसके बावजूद कंपनी को कर्मचारियों की छंटनी करने की जरूरत नहीं पड़ी।
सेल्बी ने बताया कि कॉस्ट कटिंग के तौर पर पिछले साल भारत में कोई छंटनी
नहीं की गई है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में आईबीएम को कई सरकारी
कंपनियों से ऑर्डर मिले हैं। साथ ही निजी क्षेत्र से भी कंपनी को तेजी
से प्रोजेक्ट हासिल हो रहे हैं।
आखिरकार बन ही गया विश्व का पहला मोलीक्यूलर टाजिस्टर
वैज्ञानिकों ने विश्व का पहला मोलीक्यूलर
टाजिस्टर बनाने में सफलता हासिल कर ली है। इलेक्टानिक के क्षेत्र
में इस कामयाबी को बहुत बड़ा कदम माना जा रहा है। आज से करीब 60 साल
पहले बेल प्रयोगशाला में पहली बार प्रयोगात्मक
टाजिस्टर बनाए गए थे।
उसके बाद से अब जाकर वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में दूसरी बड़ी सफलता
अर्जित कर समाप्ति की ओर बढ़ रहे वर्ष 2009 को इतिहास के पन्नों पर
अंकित कर दिया।
हालांकि जानकारों के अनुसार इस खोज के बाद भी
आणविक कम्प्यूटर बनाने में अभी भी दशकों का समय लग सकता है। वैज्ञानिक
मार्क रीड ने दो दशक पहले 1990 में यह पता लगा लिया था कि किसी अकेले
अणु को दो इलेक्टिक् संपर्कों के बीच रोका जा सकता है। तब से शोधकर्ता
इस बात का प्रयास कर रहे थे कि इस खोज की मदद से क्रियाशील
टाजिस्टर अणु बना लिया जाए। वैज्ञानिकों का यह सपना अब जाकर ठोस आकार ले पाया
है। खास बात यह है कि नया आविष्कार करने वाले वैज्ञानिकों के दल में
स्वयं मार्क भी शामिल थे और मोलीक्यूलर
टाजिस्टर का आविष्कार उन्हीं
के अध्ययन पर आधारित है।
टाजिस्टरों को अर्द्धचालक भी कहा जाता है।
टाजिस्टरों का मूल काम इलेक्टिक संकेतों के संवर्धन का होता है। इनका
विकास वैक्यूम ट्यूबों को प्रतिस्थापित करने के लिए किया गया था। यह
वैक्यूम ट्यूबें आकार में बड़ी और अविश्वसनीय थी। ये बिजली की भी बहुत
अधिक खपत करती थीं। सिलीकान और उसके जैसे तत्वों से बनने वाले
टाजिस्टरों ने इन ट्यूबों को हमेशा के लिए हटा दिया और
इलेक्टनिक
उपकरणों का आकार घटाने में बड़ी हिस्सेदारी की। इस वजह से
टाजिस्टरों के आविष्कार को बीसवीं सदी की एक बड़ी उपलब्धि भी माना गया।
सामने आएंगे ऐतिहासिक
परिणाम :- येल विश्वविद्यालय और ग्वांजू इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड
टेक्नॉलॉजी, दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों के एक दल ने पता लगाया है कि
रासायनिक पदार्थ बेंजीन का अणु जब स्वर्ण धातु के अणु के साथ जुड़ता है
तो उसका व्यवहार एक सामान्य सिलिकान
टाजिस्टर की तरह हो जाता है। इस
खोज के बाद यह माना जा सकता है कि वैज्ञानिकों ने नैनो विज्ञान के
विकास की ओर एक और कदम बढ़ा दिया है। इस खोज की मदद से अब
इलेक्टिनिक
उपकरणों का आकार घटाने में मदद मिलेगी एवं कम्प्यूटरों की गणना में तेजी
आ जाएगी। इसके अलावा आणविक कम्प्यूटर के विकास को भी बल मिलेगा।
संकलन
:- विनीता, रवि
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