तकनीकी


आई.टी.एक्ट की धारा असंवैधानिक

अरूण कुमार पाठक

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे0 चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन की बेंच ने 24 मार्च 2015 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, जिसे साइबर लॉ भी कहा जाता है, की धारा-66। को असंवैधानिक करार दिया है और इसे तत्काल प्रभाव से निरस्त भी कर दिया है। श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया रिट याचिका तथा नौ अन्य याचिकाओं का निपटारा करते हुये माननीय उच्चतम न्यायालय की पीठ ने यह आदेश पारित किया है। इसके साथ ही माननीय उच्चतम न्यायालय ने केरल पुलिस एक्ट की धारा 118(क्) को भी असंवैधानिक करार दिया तथा कहा कि यह भी संविधान के अनुच्छेद 19(1) का उल्लंघन करती है। माननीय न्यायमूर्ति द्वय ने अपने निर्णय में कहा कि यह धारा-66। संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत दिये गये अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार का हनन करती है। धारा-66। की भाषा अस्पष्ट है। यह न तो आरोपी को पता है और न ही सरकारी अथॉरटी को कि क्या अपराध है और क्या नहीं? ब्रिटेन का उदाहरण देते हुए न्यायमूर्ति द्वय ने कहा कि इसी तरह के मामले में दो अलग-अलग निर्णय आये। ऐसे में जब कानून की व्याख्या करने वाले इसकी अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं तो सुरक्षा एजेंसियो द्वारा इसकी गलत व्याख्या का खतरा हमेशा बरकरार रहेगा। 

क्या है धारा-66।: आई.टी. एक्ट,2000: साइबर लॉ की धारा-66। आई.टी. एक्ट, 2000 में वर्ष 2008 में हुए संशोधन के बाद शामिल की गयी। फरवरी 2009 में इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और तभी से यह लागू हुयी।
धारा-66।: संसूचना सेवा द्वारा आक्रामक संदेश भेजने के लिए दण्ड- कोई व्यक्ति जो किसी कम्प्यूटर संसाधन या किसी संसूचना के साधन से- किसी सूचना को, जो अत्यधिक आक्रामक या धमकाने वाले प्रकृति की है, या किसी सूचना को, जिसको वह मिथ्या होना जानता है, किन्तु क्षोभ, असुविधा, खतरा, रूकावट, अपमान, क्षति या आपराधिक अभित्रास, शत्रुता, घृणा या वैमनस्य फैलाने के प्रयोजन के लिए, लगातार ऐसे कम्प्यूटर संसाधन या किसी संसूचना युक्ति का उपयोग करके। किसी इलेक्ट्रॉनिक डाक या इलेक्ट्रॉनिक डाक संदेश को ऐसे संदेशों के उद्गम के बारे में संबोधित या पाने वाले को क्षोभ या असुविधा कारित करने या प्रवंचित या भ्रमित करने के प्रयोजन के लिए, भेजता है तो वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से दण्डनीय होगा। 

स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजन के लिए, ‘इलेक्ट्रॉनिक डाक’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक डाक संदेश’ पदों से किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रणाली, कम्प्यूटर संसाधन या संचार युक्ति में सृजित या प्रेषित या प्राप्त किया गया कोई संदेश या सूचना अभिप्रेत है, जिसके अन्तर्गत पाठ, आकृति, आडियो, वीडियो और किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के ऐसे संलग्नक भी है, जो संदेश के साथ भेजे जाए।
ऐसा नहीं है कि धारा-66। के विरूद्ध माननीय उच्चतम न्यायालय ने इतना कठोर निर्णय एक बारगी ले लिया है। इससे पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय ने धारा-66। के सम्बन्ध में 16 मई 2013 को सभी राज्यों के गृह विभाग तथा पुलिस प्रमुखों को एडवाइजरी जारी करके निर्देश दिया था कि साइबर लॉ की धारा-66। के तहत तब तक मामले दर्ज नहीं किये जायंेगे जब तक कि आईण्जीण् या डीण्सीण्पीण् जैसे शीर्ष स्तर के अधिकारियों से इजाजत नहीं ले ली जाती है। लेकिन एक अचानक घटी घटना ने माननीय उच्चतम न्यायालय को ऐसा कठोर निर्णय लेने के लिए बाध्य कर दिया। 18 मार्च 2015 को उत्तर प्रदेश के बरेेली जनपद के रहने वाले 11वीं कक्षा के एक छात्र 19 वर्षीय गुलशेर उर्फ विक्की ने सोशल मीडिया पर उण्प्रण् के शहरी विकास मंत्री आजम खान के नाम से एक आपत्ति जनक पोस्ट शेयर किया था, जिस पर रामपुर जनपद की पुलिस ने विक्की के विरूद्ध मुकदमा धारा-66। के तहत पंजीकृत करके उसे जेल भेज दिया था, जिसे बाद में अगले दिन जमानत भी मिल गयी थी लेकिन आईण्टीण् एक्ट की धारा-66। के विरूद्ध जनहित याचिका माननीय उच्चतम न्यायालय में दायर करने वाली छात्रा दिल्ली विश्वविद्यालय की विधि की छात्रा श्रेया सिंघल ने इस मामले को माननीय उच्चतम न्यायालय में उठा दिया। इस मामले में श्रेया सिंघल का पक्ष मशहूर विधिवेत्ता सोली सोराब जी ने रखा और माननीय उच्चतम न्यायालय ने धारा-66। को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया। 
माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति द्वय ने इस निर्णय के साथ आई.टी. एक्ट धारा-69। को खारिज करने की मांग ठुकरा दिया है अर्थात इन्टरनेट पर किसी भी सामग्री को ब्लाक करने का अधिकार सरकार के पास बना रहेगा। 

शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे की अंत्येष्टि के दिन पूरी मुम्बई बंद थी। इस बात को लेकर मुम्बई के पालघर क्षेत्र मंे रहने वाली शाहीन धाड़ा ने फेसबुक पर अपना यह मैसेज पोस्ट किया था, ‘हर दिन हजारों लोग मरते हैं, लेकिन दुनिया फिर भी चलती है। लेकिन एक राजनेता की मृत्यु से सभी बौखला जाते हैं। आदर कमाया जाता है और किसी का सम्मान करने के लिए लोगों के साथ जबरदस्ती नहीं की जा सकती। मुंबई आज डर के कारण बन्द हुयी है, न कि सम्मान भाव से।’
शाहीन के इस पोस्ट को रेणु श्री निवासन ने ‘लाइक’ किया था। मुंबई पुलिस ने धारा-66। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत शाहीन और रेणु श्रीनिवासन को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया था। 
श्रेया सिंघल ने आई.टी. एक्ट, 2000 की धारा-66। के तहत रेणु श्रीनिवासन और शाहीन की गिरफ़्तारी के बाद मा. उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके गिरफ्तारी के प्रावधान को चुनौती दी थी। इस मामले की सुनवायी करते हुए मा0 उच्चतम न्यायालय ने 16 मई 2013 को एडवाइजरी जारी की थी कि ऐसे मामलों में आई.जी./पुलिस कमिश्नर स्तर के अधिकारी ही गिरफ़्तारी का आदेश कर सकते हैं। इसके साथ ही इस जनहित याचिका पर इस साल सुनवाई पूर्ण करके 26 फरवरी 2015 को अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया था।  

धारा-66। को निरस्त करने का आधार: न्यायमूर्ति द्वय ने अपने फैसले के लिए निम्न बिन्दुओं को आधार बनाया। आई.टी. एक्ट की धारा-66। से लोगों की जानकारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है जबकि भारतीय संविधान में लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तथा जानने का अधिकार प्राप्त है। धारा-66। में प्रयुक्त शब्द ‘चिढ़ाने वाला’, ‘असहज करने वाला’ और ‘बेहद अपमानजनक’ जैसे शब्द अस्पष्ट हैं क्योंकि कानून लागू करने वाली एजेंसी और अपराधी के लिए अपराध के तत्वों को जानना कठिन है। किसी एक व्यक्ति के लिए जो बात अपमानजनक हो सकती है वह दूसरे व्यक्ति के लिए नही हो सकती है। न्याय भावना को स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति द्वय ने कहा कि एक ही सामग्री को देखने के बाद जब न्यायिक तौर पर प्रशिक्षित मस्तिष्क अलग-अलग निष्कर्षोें पर पहुँच सकता है तो कानून लागू करने वाली एजेन्सियाँ और दूसरों के लिए फैसला करना कितना कठिन होता होगा कि क्या अपमानजनक है और क्या बेहद अपमानजनक है। धारा-66। आई.टी. एक्ट में जो कंटेट है, उसमें काफी कुछ भा.द.सं. की धारा 268 (लोक न्यूसेंस) मंे कवर हो जाता है। 
फरवरी, 2009 से लागू होने वाली आई.टी. एक्ट, 2000 की यह धारा शुरू से ही विवादित रही है। वर्ष 2012 से अब तक 10 ऐसे महत्वपूर्ण मामले आये जो इस धारा के बने रहने पर प्रश्नचिन्ह साबित हुए और अंततः इस धारा को दफन होना ही पड़ा। यह चर्चित 10 मामलेे निम्नवत हैं: 

  • अंबिकेश महापात्र और सुब्रत सेनगुप्ता, जादवपुर, अप्रैल 2012- जादवपुर यूनिवर्सिटी मंे प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र और उनके पड़ोसी सुब्रत सेन गुप्ता को पं. बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी के कार्टून को अन्य साइटो पर पोस्ट करने पर गिरफ़्तार कर लिया गया था, यह कार्टून ममता बनर्जी द्वारा उस वक्त के रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को केन्द्रीय केबिनेट से हटाने को लेकर बना था। 
  • एयर इंडिया के कर्मचारी, मुंबई, मई 2012- एयर इंडिया के क्रू मेंबर्स मयंक मोहन और के.बी.जे. राव को मंुबई पुलिस ने प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं पर अपमानजनक चुटकुले शेयर करने के लिए अरेस्ट किया था, दोनों पर तिरंगे के अपमान का आरोप भी लगा था, दोनों का कहना था कि ये चीजें पहले ही इंटरनेट पर थी, उन्होंने तो बस शेयर किया। 
  • किश्तवाड़ मामला, जम्मू-कश्मीर, अक्टूबर 2012- किश्तवाड़ के तीन मामलों मंे लोगों को अरेस्ट करके 40 दिन के लिए जेल भेज दिया गया था, क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर ईश निंदा वाला वीडियो फेसबुक पर डाल दिया था, इनमें से एक ने पोस्ट पर कमेंट किया था, उन्हें आई0टी0 एक्ट इस्तेमाल करते हुए धार्मिक विद्वेष फैलाने का आरोपी बनाया गया था। 
  • असीम त्रिवेदी, मुंबई, सितंबर 2012- कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को मुंबई पुलिस ने संसद और राष्ट्रीय प्रतीकों का मजाक बनाने के आरोप में अरेस्ट किया था, उन्होंने ये कार्टून अपनी वेबसाइट और फेसबुक पेज पर शेयर किए थे, जिसके बाद वे वायरल हो गए थे। 
  • रवि श्रीनिवासन, पुडुचेरी, अक्टूबर 2012- बिजनेसमैन रवि श्रीनिवासन को ट्विटर पर पी. चिदम्बरम (तत्कालीन वित्त मंत्री) के बेेटे के खिलाफ आपत्तिजनक मैसेज लिखने के आरोप में अरेस्ट किया गया था। 
  • पालघर की दो लड़कियां, मुंबई, नवम्बर 2012- पालघर में रहने वाली दों लड़कियों, शाहीन धाड़ा और रेणु श्रीनिवासन को गिरफ्तार कर लिया गया था, उनमें से एक ने पोस्ट डाली थी और दूसरी ने उसे लाइक किया था, पोस्ट में बाल ठाकरे के निधन पर शिवसेना द्वारा बंद का आह्वान किए जाने पर सवाल किए थे। इसी में दिल्ली विधि विश्वविद्यालय की छात्रा श्रेया सिंघल ने मा. उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इसके अतिरिक्त पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टिज ने भी इस प्रकरण में मा. उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। 
  • कंवल भारती, उत्तर प्रदेश, अगस्त 2013- कवि व लेखक कंवल भारती  को अगस्त 2013 में फेसबुक पर एक मैसेज डालने पर अरेस्ट किया गया था, उन्होंने रेत माफिया पर नकेल कसने वाली आई.ए.एस. दुर्गाशक्ति नागपाल को सस्पेंड करने पर उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की थी। 
  • राजीश कुमार, केरल, अगस्त 2014- सीपीआई-एम कार्यकर्ता राजीश कुमार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक फोटो और अभद्र टिप्पणियां पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसमें से एक तस्वीर में प्रधानमंत्री के मुंह पर जूते का निशान बना हुआ था। 
  • देवू छोडांकर, गोवा, मई 2013- जहाज बनाने के काम में लगे छोड़ांकर के खिलाफ फेसबुक पर नरेन्द्र मोदी के ऊपर आपत्तिजनक कमेन्ट पोस्ट करने पर मामला दर्ज किया गया था। पुलिस का कहना था कि इस कमेन्ट के जरिए देवू साम्प्रदायिक और सामाजिक सौहार्द्र को बिगाड़ने के लिए बड़ा प्लान बनाने की कोशिश में थे। 
  • स्कूल का छात्र, रामपुर, मार्च 2015- बरेली में 11वीं में पढ़ने वाले एक छात्र गुलशेर उर्फ विक्की को उत्तर प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आजम खान के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट डालने के आरोप में अरेस्ट कर लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में उ0प्र0 पुलिस से यह बताने के लिए कहा है कि किन हालात में उक्त छात्र को गिरफ्तार करने की नौबत आन पड़ी। 

इस प्रकरण के पश्चात ही दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा श्रेया सिंघल ने मामले को पुनः उच्चतम न्यायालय में उठाया। जिस पर मा. उच्चतम न्यायालय ने उ.प्र. सरकार को नोटिस जारी किया था, लेकिन उ.प्र. सरकार का जबाब आता उससे पहले ही मा. उच्चतम न्यायालय ने इस धारा को असंवैधानिक , अस्पष्ट और अति करने वाली करार देते हुए निरस्त कर सोशल मीडिया की आजादी पर अपनी मुहर लगा दिया। कोर्ट ने धारा-66। को ‘मनमाना’ ‘अतिशयपूर्ण’ और ‘असंतुलित’ करार दिया।
माननीय उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय पर खुशी जाहिर करते हुए माननीय उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति आर. एस. सोढ़ी ने कहा कि, ‘धारा-66। अनुच्छेद 19(1) के मूल भावना के खिलाफ थी।ऐसे में इसे हटना ही था। राईट ऑफ स्पीच और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन हर नागरिेक का अधिकार है और धारा-66। कहीं न कहीं इसका हनन था। इसमें आलोचना और असहमति पर भी जेल जाने की गुंजाइश रहती थी।’ 
जनहित याचिका दायर करने वाली विधि छात्रा श्रेया सिंघल ने माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि,’’इस फैसले से संविधान में मिले फ्रीडम ऑफ स्पीच के अधिकार को और मजबूती मिलेगी, हालांकि सोशल साइट पर कुछ भी लिखने की आजादी के बारे में मेरी लड़ाई का मकसद हेट स्पीच को बढ़ावा देना नहीं है। अगर हेट स्पीच का मामला बनता है तो ऐसी कई अन्य धाराएं है, जिसके तहत कार्यवाही हो सकती है।’’ 
अब भी नियंत्रण में ही बोलें, क्योंकि अभी है अन्य कानून- धारा-66। आई.टी. एक्ट,2000 पर प्रतिबन्ध लगने के बाद भी अभी भी भा.द. संहिता में कई ऐसी धाराएं है जिनके तहत अनियंत्रित ढंग से अपनी भावनाओं का इजहार करने पर कार्यवाही हो सकती है। ये हैं-

 

  • अगर किसी व्यक्ति ने, चाहे वह ऑनलाइन हो या ऑफ लाइन, किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ मानहानि से सम्बन्धित बातें हों तो भा.द.वि. की धारा 499 और धारा 500 के तहत शिकायत दर्ज की जा सकती है। मामला साबित होने पर 02 वर्ष की सजा हो सकती है। 
  • अगर किसी कंटेंट में देशद्रोह या देश की संप्रभुता को चुनौती देेने वाली बातें लिखी गयी हांे तो भा.द.वि. की धारा 124। के तहत शिकायत दर्ज की जा सकती है। इसमें उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है। 
  • अगर किसी कंटेंट में दो संप्रदाय,क्षेत्र,भाषा के बीच नफरत पैदा करने वाला कंटेंट हो तो उस प्रकरण में धारा- 153 भा.द.वि. के तहत अभियोग पंजीकृत हो सकता है और 03 वर्ष तक की सजा हो सकती है। 
  • अगर कोई कंटेंट ऐसा है, जिससे किसी इलाके की शांति के लिए खतरा है तो भा.द.वि. की धारा-504 के तहत शिकायत दर्ज हो सकती है। 
  • ऐसा कंटेंट, जिसके तहत जानबूझ कर लोगों में अफवाह फैलाने की कोशिश की जा रही हो तो भा.द.वि. की धारा-505 के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है तथा 03 वर्ष की सजा हो सकती है। 
  • ऐसा कंटेंट जिससे पब्लिक न्यूसेंस (लोक शांति) को खतरा पैदा होता हो, भा.द.वि. की धारा-268 का अपराध है। इसके अतिरिक्त भी भा.द.वि. में जो परिभाषित नहीं है, उससे अलग किसी भी तरीके से लोक न्यूसेंस करेगा तो भा.द.वि. की धारा-290 के तहत जुर्माने से दण्डित किया जाएगा। स्पष्ट है कि कोई भी कंटेंट, जो भा.द.वि. के तहत अपराध है और वह प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक या ऑन लाइन के माध्यम से फैले तो ऐसा करने वालो के विरूद्ध भा.द.वि. की सम्बन्धित धारा में कार्यवाही होती रहेगी। 


माननीय उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने भले ही सोशल मीडिया की आजादी का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। सोशल मीडिया आम  आदमी के लिए अपनी भावनाएं प्रकट करने का माध्यम है। देश में सामाजिक जागरूकता लाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि ऐसा करने पर ही पाबंदी रहेगी तो लोक तंत्र के आदर्श और संकल्प कैसे फलीभूत हो सकते हैं? निश्चय ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति द्वय जे. चेलामेश्वर और आर.एफ. नरीमन का यह संयुक्त निर्णय स्वतंत्रता के अवरोधों को हटाने में सक्षम साबित होगा तथा भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जानने का अधिकार मानवीय गरिमा के साथ कायम रहेगा।

 
सरोजनी नायडू मार्ग सिविल लाइन्स,  इलाहाबाद- 211001 उत्तर प्रदेश