विशेष


जीवन के हर पहलू से जुड़ा है विज्ञान

डॉ.बी.के.त्यागी से डॉ.मनीष मोहन गोरे की बातचीत

 

एक शख्स अपनी युवावस्था से विज्ञान लोकप्रियकरण आन्दोलन से जुड़ गया। जीवन के हर पहलू में विज्ञान को तलाशता रहा और उसे लेकर लोगों को जागरूक बनाने के प्रयास किये। बच्चों के लिए विज्ञान क्लब की बात हो, आदिवासी समुदायों के मध्य विज्ञान जागरूकता का सवाल हो या रेडियो पर विज्ञान की एक्सेस का मुद्दा हो इन सब बातों के लिए अगर एक भारत में उपयुक्त विज्ञान संचारक के बारे में कोई पूछे तो एक नाम सामने आता है और वो है बी.के.त्यागी। प्रस्तुत है त्यागी जी से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

 

आपकी दृष्टि में भारत जैसे बहुसंस्कृति, बहुधार्मिक और बहुभाषी देश में वैज्ञानिक चेतना और विज्ञान संचार की क्यों जरूरत है?
इस सवाल को संबोधित करते हुए मैं यह बताना चाहूँगा कि जब हमारा देश आजाद हुआ था तो हमारी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन आने लगा था। ये बदलाव ग्लोबल थे और हम भी इनसे अछूते नहीं थे। उस दौर में विकास की नई इबारत लिखने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्राथमिकता दी जा रही थी। वैज्ञानिक और तकनीकी विकास ने देश की प्रगति को गति दी तथा विज्ञान किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का इंजन माना जाने लगा। हमारे देश में भी आजादी के बाद १९५८ में भारतीय संसद द्वारा साइंस पालिसी रिजोल्यूशन (प्रथम विज्ञान नीति) लाया गया जिसके अंतर्गत वैज्ञानिक भारत की नींव रखी गई और प्रयोगशालाओं/शोध संस्थानों की शंृखला स्थापित की गई। जहाँ तक विज्ञान लोकप्रियकरण की बात है, उसमें यह मूल विचार था कि जब तक सब लोगों में विज्ञान और इसकी प्रक्रिया को लेकर एक ललक नहीं पैदा होगी, जीवन के हर पहलू में इसे आत्मसात नहीं किया जाएगा तब तक सामाजिक-आर्थिक विकास को हासिल करना संभव नहीं। इस तरह आजादी के बाद देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था परिवर्तन का मुख्य आधार बनाया गया था क्योंकि भारत जैसे बहुसंस्ति, बहुधार्मिक और बहुभाषिक देश में इसकी उपयोगिता कहीं अधिक है।

क्या इस चेतना के प्रसार के लिए यहाँ उपयुक्त वातावरण और शिक्षा का स्तर आप मौजूद पाते हैं?
विज्ञान लोकप्रियकरण लोगों की भाषा में करने के प्रयास भारत सहित पूरी दुनिया में जारी हैं। यूरोपीय देशों के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में भी इसे एक पूर्ण अकादमिक विषय के रूप में शामिल किया जा चुका है। भारत सरकार की राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) ने भी ऐसे पाठ्यक्रम कुछ विश्वविद्यालयों में आरम्भ किये हैं। यहाँ से प्रोफेशनल तौर पर प्रशिक्षित विज्ञान संचारक बाहर निकल रहे हैं जो इस दिशा में आगे काम कर रहे हैं। लोगों को भी इसका महत्व अब समझ में आ रहा है। इस प्रकार देश के अंदर विज्ञान संचार के मुताबिक वातावरण भी अब धीरे-धीरे अनुकूल बन रहा है।

अभी तक हमारे देश में विज्ञान संचार के स्वरूप में जो भी सरकारी और गैर सरकारी प्रयास हुए, उन पर आपकी त्वरित प्रतिक्रिया क्या होगी?
अगर इतिहास पर नजर डालें तो भारत में विज्ञान लोकप्रियकरण को लेकर जो प्रयास हुए उसमें देश के अनेक राज्यों में महत्वपूर्ण प्रयास हुए। असम विज्ञान समिति, विज्ञान परिषद प्रयाग, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, केरल शास्त्र साहित्य परिषद, महाराष्ट्र विज्ञान परिषद, कर्नाटक राज्य विज्ञान परिषद ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। ये जितने राज्यों के विज्ञान परिषद हैं, इनका आंदोलन आजादी से पहले शुरू हुआ तथा आजादी के बाद और परिष्कृत होता गया। पंजाब के विज्ञान संचारक रूचि राम साहनी को खोजकर निकाला गया। वे गलियों के नुक्कड़ पर रसायन विज्ञान से जुड़े प्रयोगों को रोचक ढंग से प्रदर्शित करके लोगों को विज्ञान की जानकारी दिया करते थे। विज्ञान प्रसार द्वारा रूचि राम के जीवन पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण किताब इसके प्रकाशन योजना के अंतर्गत लाई गई। रूचि राम जैसे प्रयास देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे थे। इन्हें पहली बार भारत सरकार की एनसीएसटीसी द्वारा एक मंच पर लाया गया और एक समेकित प्रयास के रूप में कार्य योजना का निर्माण हुआ। इसके अलावा सीएसआईआर की प्रकाशन एवं सूचना निदेशालय (पीआईडी) नामक विज्ञान संचार संस्था आजादी के तुरंत बाद अस्तित्व में आई जहाँ से विज्ञान प्रगति और साइंस रिपोर्टर नामक दो महत्वपूर्ण लोकविज्ञान पत्रिकाओं के प्रकाशन शुरू हुए। इन पत्रिकाओं ने बच्चे-बड़े सभी लोगों के ज्ञान-विज्ञान का संस्कार किया। ये पत्रिकाएँ आज भी अनवरत प्रकाशित हो रही हैं। आजकल पीआईडी को निस्केयर (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना स्रोत संस्थान) कहते हैं। 
देश में विज्ञान संचार की दिशा में विज्ञान संचारकों को तैयार करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास (प्रशिक्षण और कार्यशाला के माध्यम से) एनसीएसटीसी द्वारा किया गया। इससे पहले ज्यादातर विज्ञान संचार और लेखन का काम वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता था।  एनसीएसटीसी के समांतर विज्ञान लोकप्रियकरण के मुख्य मकसद के साथ राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद (एनसीएसएम) और विज्ञान प्रसार का उदय हुआ। एनसीएसएम ने देश के अनेक राज्यों में राष्ट्रीय विज्ञान केन्द्रों की स्थापना की जो बच्चों में वैज्ञानिक जागृति और रूचि उत्पन्न करने का जरिया बने। विज्ञान प्रसार ने अपने अनेक अनोखे विज्ञान संचार कार्यक्रमों के माध्यम से विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के प्रयास १९८९ से आरम्भ किये। 

क्या विज्ञान प्रसार अधिकतर बाल-केंद्रित रहा? क्या समाज के दूसरे तबकों को ध्यान में रखकर जो प्रयास हुए, वे नाकाफी हैं?
यह एक भ्रांत धारणा है कि विज्ञान संचार संस्थाओं के अधिकतर प्रयास बाल-केंद्रित हैं। इस धारणा के पीछे मुख्य वजह है कि बच्चों के कार्यक्रमों (बाल विज्ञान कांग्रेस, विज्ञान क्लब आदि) को मीडिया अन्य कार्यक्रमों की अपेक्षा अधिक हाइलाइट करती रही है। मगर वास्तविकता ऐसी नहीं है। यदि हम एनसीएसटीसी, निस्केयर और विज्ञान प्रसार जैसी संस्थाओं के मैंडेट देखें तो हम पायेंगे कि उनमें समाज के हर वर्ग के लिए विज्ञान संचार के उद्देश्य निहित हैं। हमारे देश के संविधान के द्वारा भी सभी नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकास का मौलिक कर्तव्य दिया गया है (अनुच्छेद ५१ एख्एच,)। भारत की सभी विज्ञान संचार संस्थाओं के लिए महिला, किसान, उद्यमी, व्यवसायी, बुनकर, शिल्पकार जैसे समाज के हर वर्ग के लोग लक्ष्य वर्ग होते हैं और उनके लिए अलग-अलग स्तर पर संचार गतिविधियों के आयोजन किये जाते हैं। 

भारत में रेडियो और लोक कला माध्यमों को विज्ञान लोकप्रियकरण के उद्देश्य से किस प्रकार उपयोग में लाया गया?
दूसरे अनेक जनसंचार माध्यमों के समांतर रेडियो आज भी एक ऐसा जनमाध्यम है जो न केवल एक बेहद प्रभावी माध्यम है बल्कि देश के कोने-कोने तक इसकी पहुँच है। इस माध्यम की इसी खूबी को ध्यान में रखकर विज्ञान संचार संस्थाओं ने अपने असंख्य कार्यक्रम रेडियो के लिए निर्मित किये हैं। विज्ञान प्रसार द्वारा निर्मित ११० कडि़यों वाले रेडियो धारावाहिक ‘मानव का विकास’ का प्रसारण देश के अनेक क्षेत्रों में किया गया। यह धारावाहिक अत्यंत लोकप्रिय हुआ था जिसकी आज भी मिसाल दी जाती है। इसके बाद ‘धरती मेरी धरती’ और ‘सितारों की सैर’ जसी अनेक रेडियो धारावाहिक बनाये गये और नये कार्यक्रमों का निर्माण चल रहा है। 
लोककला और लोकसंगीत के संयोग से भी विज्ञान की जानकारी सुगम ढंग से लोगों को दी जा सकती है। इस विचार को ध्यान में रखकर विज्ञान के अनेक कार्यक्रम लोक कला माध्यमों के लिए किये गये जो बेहद सफल रहे।     

आज सोशल मीडिया जैसे नये संचार माध्यम उभरकर सामने आये हैं। क्या इन माध्यमों का उपयोग विज्ञान संचार के लिए उपयुक्त और प्रामाणिक सामग्री के साथ किया जा सकता है?
यह कार्य बिलकुल किया जा सकता है और इस दिशा में प्रयास भी चल रहे हैं। लेकिन जैसा कि आपने जिक्र किया वैज्ञानिक जानकारी की प्रामाणिकता जो कि एक अहम मुद्दा है। मीडिया में वैज्ञानिक जानकारी का भंडार पसरा हुआ है लेकिन उनकी प्रामाणिकता को लेकर हमें विचार करने की आवश्यकता है। अभी जिस फार्मेट में ये सामग्रियाँ उपलब्ध हैं, वे सर्वग्राह्य नहीं हो सकतीं। वो कहें कि एक बुद्धिजीवी वर्ग को अपील कर सकता है। लेकिन विज्ञान संचार तो समाज के हर वर्ग और खास तौर पर आमजन की बात करता है। इसलिए उन्हें विभिन्न लक्ष्य वर्ग की आवश्यकताओं के अनुसार प्रस्तुत करने की भी जरूरत है। विज्ञान प्रसार और दूसरी विज्ञान संचार संस्थाओं ने भी इस दिशा में प्रयास आरम्भ कर दिए हैं। 

भारत के सन्दर्भ में विज्ञान लोकप्रियकरण की दिशा में क्या कुछ किया जाना रह गया है?
एक तरफ यदि समाज के हर वर्ग तक विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के जो विविध प्रयोग भारत में किये गये वो दुनिया में कहीं नहीं हुए। इस मामले में हम अद्वितीय हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश हमने उन सभी प्रयासों को डाक्यूमेंट नहीं किया। उदाहरण के लिए एनसीएसटीसी ने विज्ञान जत्था जैसे विज्ञान लोकप्रियकरण के महाभियान चलाये जिसका कोई उपयुक्त डाक्यूमेंटेशन नहीं है। देश में क्षेत्रीय स्तर पर भी बेहद महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं मगर उनके डाक्यूमेंटेशन भी नहीं हैं। विज्ञान संचार का एक अकादमिक विषय के रूप में सैद्धांतिक विकास होना चाहिए था, वो नहीं हुआ है। इस विधा को लेकर शोध का क्षेत्र भी यहां खाली पड़ा है। इन दिशाओं में प्रयास शुरू हुए हैं। लेकिन इनमें करने को बहुत कुछ है और अनेक संभावनाएं भी हैं। 

विज्ञान संचार के व्यक्तिगत और संस्थागत प्रयासों का लक्ष्य वर्गों तक कितना प्रभाव हुआ तथा इसके फलस्वरूप उन्होंने अपने जीवन में कितना वैज्ञानिक नजरिया अपनाया, इसको कैसे मेजरमेंट किया जा सकता है?
भारत में विज्ञान संचार की आज ऐसी स्थिति है कि यहाँ विज्ञान लोकप्रियकरण एक आंदोलन का रूप ले चुका है। अब सरकार की सहायता के बिना भी ये प्रयास चलते रहेंगे। हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उन व्यक्तियों का और उन संस्थाओं का जो विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं। आपने जो सवाल किया है कि विज्ञान संचार के प्रभाव को कैसे मेजरमेंट करें। तो इस बारे में हमारे पास अभी ना तो कोई विधि है और ना ही कोई युक्ति है जो इन प्रयासों का मापन कर सके। इस दिशा में विज्ञान संचार गतिविधियों से जुड़े शोध को बढ़ावा देकर इस मेजरमेंट को किया जाना संभव है। इस फील्ड में शोध का क्षेत्र खाली पड़ा है। इस कार्य में वैज्ञानिक, विज्ञान संचारक, जनसंचार के अलावा अकादमिक जगत के लोगों की भागीदारी जरूरी होगी।  

देश के दीर्घकालिक विकास में विज्ञान संचार किस तरह अपनी भूमिका निभा सकता है?
यह एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तय किया गया है जिसमें भारत भी एक सिग्नेटरी है। इसमें पर्यावरण, ऊर्जा, सामाजिक समता जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। इसमें सामाजिक और आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया जाता है। इन मुद्दों का भारत के सामाजिक-राष्ट्रीय विकास से सीधा संबंध है। इसलिए दीर्घकालिक विकास के जितने भी लक्ष्य हैं उन्हें सभी सरकारी विकास योजनाओं और कार्यक्रमों में शामिल किया गया है। यहां पर विज्ञान संचार की भूमिका इस तरह आती है कि लोगों की दैनिक जरूरत से जुड़े मुद्दों को लेकर व्यापक जनभागीदारी में यह मददगार साबित होता है। पानी का ही उदाहरण ले लीजिये। स्वच्छ और पीने योग्य शुद्ध पानी आज एक बड़ी चुनौती है। विज्ञान संचार के प्रयासों से इसके बारे में हमें वैज्ञानिक और प्रमाणिक समझ मिलती है और पानी का विज्ञान आमजन के समझ में आ जाता है। इसी तरह ऊर्जा और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों को लेकर जागरूकता उत्पन्न करने में विज्ञान संचार अहम भूमिका निभाता है। इस दिशा में विज्ञान प्रसार और राज्य विज्ञान परिषदों के द्वारा काफी कुछ प्रयास चल रहे हैं। सस्टेनेबल डेवलपमेंट को केंद्र में रखकर विज्ञान प्रसार ने एक रेडियो धारावाहिक भी बनाया है।  

आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। इस सार्थक संवाद के लिए आपको ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ परिवार की ओर से हार्दिक धन्यवाद ! 
आपको और ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ परिवार को भी मेरी ओर से धन्यवाद एवं शुभकामनाएं।

 

mmgore@vigyanprasar.gov.in
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