विशेष

(12/Mar/2015)

डॉ.शिवगोपाल मिश्र से मनीष श्रीवास्तव की बातचीत

कृपया अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं शिक्षा के बारे में बतायें। 
मेरा जन्म एक किसान परिवार में हुआ। पिता दर्जा चार तक पढ़े थे और खेती करते थे और मेरी माता निरक्षर थीं। उनकी आठ सन्तानों में मैं पाँचवीं सन्तान था। उन्होंने अपने सारे पुत्रों को पढ़ने भेजा। सबसे बड़े भाई पिता की मृत्यु के बाद खेती कराने लगे। हमारे पास 150 बीघा जमीन थी, छह बैल, कई भैसें, और गाएं थीं। हमारे पास बहुत बड़ा जंगल था। मेरे एक बड़े भाई हाईस्कूल तक पढ़ कर डाकखाने में नौकर हो गये थे। मेरी प्रारम्भिक पढ़ाई गांव से 4 मील दूर स्थित प्राइमरी पाठशाला में हुई। उसके बाद मैं भईया के पास फतेहपुर गवर्नमेंट हाईस्कूल में पढ़ने चला गया। पढ़ने में तेज था अतः मेरे अध्यापक ही नहीं, मेरे घर वाले भी मेरा आदर करते थे। हाईस्कूल में मैंने अंग्रेजी, हिन्दी, भूगोल तथा सामान्य विज्ञान विषय ले रखे थे। विज्ञान के प्रति विशेष रुचि जगी-कारण कि मेरे विज्ञान के शिक्षक मेरा विशेष ध्यान रखते थे। इसके बाद मैं इलाहाबाद चला आया जहाँ मेरे तीसरे भाई रेलवे में नौकरी करते थे। मैंने यहीं से इंटर (साइंस) और फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एससी एवं एम.एससी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। एम.एससी के अन्तिम वर्ष में मैंने कृषि रसायन विषय चुना, उसी में उत्तीर्ण होकर विश्वविख्यात रसायनशास्त्री एवं मृदा विज्ञानी प्रो. नीलरत्न धर के निर्देशन में शोध कार्य किया और फिर शीलाधर मृदा शोध संस्थान में पहले प्रवक्ता, फिर रीडर, प्रोफेसर और अन्त में निदेशक बना। वहीं से 1992 में अवकाश प्राप्त किया। अध्यापन के दौरान 50 से अधिक शोध छात्रों का निर्देशक रहा। उसी काल में अनेक शोधपत्र लिखे तथा कुछ पुस्तकें लिखीं । 

आप विज्ञान जगत की सम्मानित संस्था विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री तथा संस्था द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘विज्ञान’ के संपादक हैं। आपकी पत्रिका ‘विज्ञान’ को विज्ञान की प्रथम पत्रिका होने का गौरव प्राप्त है। खुशी की बात है कि पत्रिका प्रकाशन के सौ वर्ष पूरे हो गये हैं और आपके द्वारा यह वर्ष शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। कृपया हमें संस्था से जुड़े अपने अनुभवों, इसके उद्देश्य और भविष्य की योजनाओं के बारे में बतायें। 
विज्ञान परिषद् प्रयाग से मेरा जुड़ाव 1952 में हुआ। मैं एम.एससी में था तो मेरे गुरुवर डॉ. हीरालाल निगम ने, जो उस समय विज्ञान परिषद से प्रकाशित ‘विज्ञान’ पत्रिका के सम्पादक भी थे, एक लेख लिखने के लिए कहा। वह लेख छपा और मैं तब से ‘विज्ञान’ पत्रिका में लिखने लगा। किन्तु विज्ञान परिषद् की गतिविधियों से जुड़ने में प्रो. सत्यप्रकाशजी का हाथ था। मैं रसायन विभाग में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हो चुका था। यह वर्ष 1956 था। सत्यप्रकाशजी एम.एससी. प्रीवियस में मुझे पढ़ा चुके थे और वे मेरे हिन्दी अनुराग से परिचित थे। मैंने 1952 तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन की विशारद तथा साहित्यरत्न की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली थीं फलतः मेरी हिन्दी अच्छी हो चुकी थी। 1956 में पहले मैं ‘विज्ञान’ के सम्पादक मण्डल में सम्मिलित हुआ फिर 1958 में जब सत्यप्रकाशजी ने ‘विज्ञान परिषद् अनुसन्धान पत्रिका’ निकालने की योजना बनाई तो मुझे उसका प्रबन्ध सम्पादक बनाकर पत्रिका प्रकाशित कराने का पूरा जिम्मा मुझे सौंप दिया। तत्पश्चात मैं 1959 में ‘विज्ञान’ का सम्पादक बना, फिर 1977 में विज्ञान परिषद् का प्रधानमंत्री बना। मेरे ऊपर विज्ञान परिषद् के अधिकारियों का पूरा भरोसा था फलतः मैं अध्यापन के कार्य से मुक्त होकर नित्य ही विज्ञान परिषद् भवन में घंटों काम करता रहता था। विज्ञान परिषद् के सभी पदाधिकारी अवैतनिक होते रहे हैं। मैं विश्वविद्यालय में सेवारत रहकर विज्ञान परिषद् का कार्य करता रहा। मुझे विज्ञान परिषद् में डॉ. सत्यप्रकाश, डॉ. गोरख प्रसादजी के अलावा विज्ञान परिषद् के सभी सभापतियों से विचार-विमर्श करने का अवसर मिला। मुझे डॉ. आत्माराम, डॉ. एम.जी.के.मेनन तथा डॉ. मंजु शर्मा जैसे उच्च वैज्ञानिकों का स्नेह भी मिला। मैंने विज्ञान परिषद् के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान प्रसार, सी एस आई आर,नई दिल्ली, शब्दावली आयोग से विभिन्न योजनाएं प्राप्त कर उन्हें पूरा कराया। अनेकानेक सेमिनार संपन्न कराये, अनेक स्मृति व्याख्यानों का आयोजन किया और विज्ञान परिषद में अनेक पुरस्कारों की स्थापना में सहयोग किया। विज्ञान परिषद् के शताब्दी वर्ष के लिए जो कुछ भी नया हो सकता था, उसे सम्पन्न कराने का प्रयास किया। दिल्ली तथा स्थानीय प्रकाशकों से सहयोग प्राप्त कर विज्ञान परिषद् से जुड़े विज्ञान लेखकों से पुस्तकें लिखवा कर प्रकाशित की। 1970-80 के दशक में उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के लिए अनेक ग्रन्थों के लेखन एवं प्रकाशन का प्रबन्ध किया। मैंने पत्र व्यवहार द्वारा विज्ञान लेखकों तथा वैज्ञानिकों को ‘विज्ञान’ तथा ‘अनुसंधान पत्रिका’ में सहयोग करने के लिए लिखा। अपने कार्यकाल में विज्ञान लेखकों को सम्मानित करने की प्रथा चलाई । यही नहीं, उनके सम्मान में ‘विज्ञान’ के ‘विशेषांक’ भी निकाले । 
विज्ञान परिषद् की स्थापना (1913) का उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान का प्रचार-प्रसार करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘विज्ञान’ मासिक का प्रकाशन 1915 से शुरू हुआ जो निरन्तर 100 वर्षों से अनवरत जारी है। यही नहीं, विज्ञान परिषद ने 1960 तक 5 दर्जन लोकप्रिय विज्ञान पुस्तकें प्रकाशित कर ली थीं। देश में परिवर्तन होने और आर्थिक कारणों से विज्ञान परिषद् द्वारा पुस्तक प्रकाशन का कार्य बन्द कर दिया गया किन्तु 1970 के बाद परिषद् किसी न किसी तरह विज्ञान पुस्तकों के प्रकाशन में सहयोग करता रहा। 2000 के दशक में परिषद् ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग तथा सीएसआईआर के आर्थिक सहयोग से कई महत्वपूर्ण प्रकाशन किये जिनमें डॉ0 मेघनाद साहा तथा डॉ. आत्माराम के सम्पूर्ण कृतित्व को, जो अंग्रेजी में था, उसका अनुवाद करा कर हिन्दी में प्रकाशित किया। यही नहीं, विज्ञान प्रसार के सहयोग से ‘विज्ञान लेखन के सौ वर्ष’ के दो खण्डों का सम्पादन करके हिन्दी विज्ञान लेखन के इतिहास लेखन हेतु पृष्ठभूमि तैयार की। शब्दावली आयोग के लिए ‘जैव प्रौद्योगिकी पारिभाषिक कोश’ तैयार कराकर यह दिखा दिया कि सरकारी क्षेत्र के अलावा भी पारिभाषिक कोश तैयार हो सकते हैं। 
विज्ञान परिषद प्रयाग के लिए उसका शताब्दी वर्ष राष्ट्रभाषा हिन्दी तथा विज्ञान की किसी संस्था के लिए सौ वर्ष की सेवा का सुफल के रूप में जाना जायेगा। हमने यह सिद्ध कर दिया है कि विज्ञान के नवीन से नवीन ज्ञान को हिन्दी में व्यक्त किया जा सकता है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि विज्ञान की हिन्दी ही राष्ट्रभाषा हिन्दी का असली स्वरूप है। हम इसी के द्वारा जगद्गुरु बनने का सपना संजोये हैं। इक्कीसवीं सदी को सूचना, संचार और प्रौद्योगिकी की सदी होना है। विज्ञान परिषद् अब हिन्दी ‘विज्ञान’ एकेडमी के रूप में बनने को उद्यत है जो देश के कर्णधारों को हिन्दी के विषय में समुचित मन्त्रणा दे सकेगी । 

21 वर्ष की अल्पायु मंे आपने विज्ञान लेखन की शुरूआत की थी। वे कौन से प्रेरक रहे जिनसे प्रेरित होकर आपने विज्ञान क्षेत्र में आजीवन अपनी सेवायें देने का निर्णय लिया था।
प्रारम्भ में मैंने यह नहीं सोचा था कि हिन्दी विज्ञान लेखन की दिशा में मुड़ जाऊँगा। वस्तुतः अध्यापन के दौरान मुझे लगा कि यदि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनना है तो उसमें केवल अनुवाद कार्य नहीं किया जाना है। उसमें मौलिक लेखन होना है। मेरे गुरुजनों में डॉ. सत्यप्रकाश, डॉ. गोरख प्रसाद, डॉ. आत्माराम तथा प्रो. फूलदेव सहाय वर्मा ने मुझे यह मार्ग दिखाया। उनके सम्पर्क में आकर मैंने अनुभव किया कि मुझे हिन्दी विज्ञान लेखन में न केवल स्वयं अपितु अपने शिष्यों और सहयोगियों को भी प्रोत्साहित करना है और आज मैं देखता हूं कि मेरे लेखक मित्रों की संख्या दिल्ली, जोधपुर, बनारस में काफी है। वे अपने-अपने विशेष विषयों पर मौलिक लेखन कर रहे हैं और भविष्य के लिए नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं। अब कई महिलाएँ भी विज्ञान लेखन में प्रवृत्त हैं।
 
विज्ञान प्रचार-प्रसार की कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय योजनाओं में आपने योगदान दिया है। इन योजनाओं से जुड़े अनुभवों को हमसे साझा करें।
मैं पहले ही उन संस्थाओं का उल्लेख कर चुका हँू जिनसे सहायता लेकर अथवा जिनको सहायता पहुँचा कर मैंने विज्ञान लेखन के क्षेत्र को व्यापक बनाने का प्रयत्न किया है। मैंने ‘विज्ञान’ पत्रिका का ‘विज्ञान कथा’ विशेषांक निकाल कर विज्ञान कथा लेखकों को आकृष्ट किया और फैजाबाद में डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय के नेतृत्व में ‘विज्ञान कथा समिति’ की स्थापना कराई और उसके पहले अधिवेशन के लिए विज्ञान परिषद् से आर्थिक सहयोग दिलाया। यह समिति नये-नये विज्ञान कथाकारों को जन्म दे चुकी है। 

हमारे देश में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विशुद्ध रूप से विज्ञान में रूचि लेने वालों तथा विज्ञान का प्रचार-प्रसार करने वालों की कमी है। इस समस्या का कारण आप किसे मानते हैं हमारी शिक्षा प्रणाली को या उत्कृष्ट विज्ञान पाठ्यसामग्री के अभाव तथा सरकारी स्तर पर किए गये प्रयासों की कमी को।
आपका यह प्रश्न अटपटा लगता है कि विज्ञान में रुचि लेने वालों या विज्ञान का प्रचार प्रसार करने वालों की कमी है। जब मैंने विज्ञान लेखन शुरू किया तो हॉबी के रूप में किया। उस समय दिल्ली के कई लेखक समाचार पत्रों, हिन्दी पत्रिकाओं तथा कुछेक विज्ञान पत्रिकाओं में तेजी से लिख रहे थे। कई सम्पादक उन्हें प्रोत्साहित कर रहे थे। इनमें श्री नारायण दत्तजी अग्रणी थे। तब रमेश दत्त शर्मा, देवेन्द्र मेवाड़ी, श्री प्रेमानन्द चन्दोला, प्रमोद जोशी, श्री गुणाकर मुले खूब लिख रहे थे। मैं उस समय ‘भारत की सम्पदा’ के सम्पादन में लगा था। ‘विज्ञान प्रगति’ धीरे-धीरे अपना प्रभाव जमा रही थीं। विज्ञान लोक, विज्ञान जगत आदि पत्रिकाएं शुरू हो रही थी। एक-एक विज्ञान लेखक को कई-कई पत्रिकाओं में लिखना पड़ रहा था। तब विज्ञान पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या में भी वृद्धि हो रही थी। किन्तु क्रमशः 1980 तक पत्रिकाओं के मूल्य में वृद्धि होने लगी और ग्राहक संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से विद्यार्थियों के लाभ हेतु सामग्री को प्रधानता दी जाने लगी। स्पष्ट है कि गम्भीर पाठकों की रुचि घटने लगी। उसे तो वैविध्य चाहिए। फिर 2000 के बाद सामयिक घटनाओं पर लम्बे सचित्र लेख छपने लगे, तो पाठकों को ऊब छूटने लगी। ‘विज्ञान प्रगति’ ओैर ‘आविष्कार’ की सामग्री कुछ ऐसी ही होने लगी। यदि उनके प्रति कोई आकर्षण था तो वह विज्ञान लेखकों का था जिन्हें अच्छा मानदेय प्राप्त होने लगा था। अब इतर पत्रिकाओं में ही अन्य उपयोगी विज्ञान सामग्री छप सकती थी। किन्तु तब तक अनेक पत्रिकाएं अपना दम तोड़ चुकी थीं। ‘विज्ञान’ ही एकमात्र पत्रिका रह गई जो नवोदित लेखकों से लेकर जमे जमाये लेखकों के लिए लेखन क्षेत्र बनी रही किन्तु उसकी आर्थिक स्थिति कभी भी पुष्ट नहीं रही अतः वह चाह कर भी अधिक आकर्षक एवं रंगीन काया वाली नहीं बन पाई। फिर भी 2002 के बाद चार रंगों में प्रकाशन शुरू हुआ, पृष्ठ संख्या भी बढ़ी किन्तु ‘विज्ञान’ की इस नीति ने कि हम ‘विज्ञापनों’ को स्थान नहीं देंगे, आज भी आर्थिक संकट का कारण बनी हुई है । 
मैं न तो पाठ्य सामग्री के अभाव, या सरकारी स्तर पर किये गये प्रयासों में कमी को दोष देना चाहूँगा। वस्तुः आज की शिक्षा प्रणाली व्यावसायिक बन चुकी है। छात्रों को पाठ्यक्रम के अलावा इतर सामग्री पढ़ने की फुरसत ही नहीं है। उनके अभिभावक भी उन्हीं की राह पर हैं। यदि विज्ञान पत्रिकाओं को कोई पढ़ता है तो वे जिज्ञासु हैं जो ज्ञान के भूखे रहते हैं, जीवन में विज्ञान को आत्मसात करना चाहते हैं। ऐसे लोगों की संख्या कम है। किन्तु जो भी ज्ञान विज्ञान पत्रिकाओं द्वारा परोसा जा रहा है वह व्यर्थ नहीं जा रहा है, वह मुद्रित होकर संचित हो रहा है और हिन्दी की समृद्धि का सूचक बनता जा रहा है। पाठकों की संख्या का उतना महत्व नहीं जितना कि उनकी रुचि के परिष्कार का है। धीरे-धीरे ही इसमें सुधार आवेगा। किसी संस्था, सरकार या पाठकों पर यह दोषारोपण नहीं किया जा सकता। विभिन्न संस्थाओं को स्थिर होकर अपना कार्य करते जाना है। स्थिति सुधर कर रहेगी । 
वैज्ञानिक जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। आपके नजरिये से ये योजनाएं अपने मकसद में कितना कामयाब हो रही हैं।
वैज्ञानिक जागरूकता लाने के लिए हमारी लोकप्रिय सरकारें जो भी योजनाएं चलाती रही हैं, उनमें खानापूर्ति अधिक होती आई है क्योंकि चुने हुए लोग ही इन योजनाओं से परिचित होकर निर्धारित धन का उपयोग करते रहे हैं। इन योजनाओं का आम प्रचार नहीं हुआ, न ही जो परिणाम प्राप्त हुए उन्हें विज्ञापित किया गया। यदि यही धन पहले से कार्य कर रही निष्ठावान संस्थाओं को दिया जाता तो शायद बेहतर परिणाम निकलते। 

हमारा देश भिन्न-भिन्न प्रांतों का समूह है जिनकी अपनी स्थानीय बोली, भाषा तथा संस्कृति है। ऐसे में इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक जागरूकता लाने हेतु कौन से प्रयास सरकारी एवं स्थानीय स्तर पर किये जा सकते हैं।
आप यह जानना चाहते हैं कि विभिन्न प्रान्तों में उनकी भाषाओं के माध्यम से वैज्ञानिक जागरूकता लाने के कौन से प्रयास हो रहे हैं। देखिये, चाहे बंगाल हो, महाराष्ट्र या तमिलनाडु, हिन्दी प्रान्तों को छोड़ दीजिये, उनमें अपनी अपनी भाषाओं में प्रचुर वैज्ञानिक लेखन हुआ है और हो रहा है तथा स्त्री-पुरुष दोनों समूहों में वैज्ञानिक जागरूकता का स्तर हिन्दी प्रदेशों की तुलना में अधिक है। इसका कारण कि उनकी भाषाओं में लिखा वैज्ञानिक साहित्य जनसामान्य द्वारा भी खूब पढ़ा और सराहा जाता है। काश ! हम हिन्दी वाले भी ऐसा कर पाते। 

राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान पत्रिकाओं का भारी अभाव है। कुछ गिनती की पत्रिकाएँ सरकारी अनुदानों के जरिये ही प्रकाशित हो पा रही हैं। आमजन का विज्ञान से न जुड़ पाने का क्या यह भी एक कारण है।
आप यह कहना चाह रहे हैं कि सरकारी अनुदान से प्रकाशित होने के कारण विज्ञान पत्रिकाओं से आमजन नहीं जुड़ पा रहे हैं। बात ऐसी नहीं है। अभी तक हिन्दी प्रदेशों में वास्तविक वैज्ञानिक प्रवृत्ति का प्रसार नहीं हो पाया। पं. नेहरू ने 1946 में ही ैबपमदजपपिब जमउचमत की बात कही थी। शायद इसे राजनीतिक नारा मानकर लोग इससे दूर जाते रहे, यही भूल आम जनता ने की। विज्ञान जीवन स्तर को सुधारने का साधन है। आप उससे दूर रहकर अपना ही नुकसान करते आ रहे हैं।
 
हर दौर में जरूरत होती है कि स्तरीय नवोदित लेखकों का समूह तैयार किया जाए ताकि भविष्य के लेखन जगत को समृद्ध बनाया जा सके। क्या वर्तमान में कुछ ऐसे प्रयास हो रहे हैं?
स्तरीय नवोदित विज्ञान लेखकों का समूह पहले से तैयार है। उसे तैयार करने की आवश्यकता नहीं। उसे सभी तरह के प्रोत्साहन की आवश्यकता है। हमने विज्ञान परिषद् से प्रकाशित ‘विज्ञान’ पत्रिका के माध्यम से सदैव नवोदित विज्ञान लेखकों को अवसर प्रदान किया है और उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन दिया है। विज्ञान लेखकों की जीविका ही विज्ञान लेखन पर आश्रित है। उन्हें सरकारी तथा आम जनता का प्रोत्साहन चाहिए। वैसे भी विज्ञान लेखक संघ ;प्ैॅ।द्ध बना हुआ है किन्तु वह कुछेक महत्वाकांक्षी लेखकों का संघ बन कर रह गया है । 

आपके पास विज्ञान लेखन का सुदीर्घ अनुभव है। वर्तमान समय में हिन्दी में विज्ञान लेखन करने वालों को आप क्या सुझाव देना चाहेंगे ताकि वे उन सावधानियों के माध्यम से पाठकों हेतु बेहतर लेखन कर सके।
आज के सारे विज्ञान लेखक अनुभव सम्पन्न हैं। वे जागरूक हैं अपने लेखन कर्म के प्रति। मैं उनसे केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि वे विज्ञान लेखन को तपस्या के रूप में लें, वे स्वाध्याय करें, अन्यों का लिखा भी पढ़ें। कर्मण्येवाधिकारस्ते- वाक्य को मोटो बनावें। उनका कार्य पुरस्कृत होगा । 

आपके नजरिये में क्या विज्ञान प्रसार हेतु राष्ट्रीय स्तर पर संचालित संस्थाएँ अपना कार्य बखूबी कर पा रही हैं? 
यदि आपका संकेत विज्ञान कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय संस्था से है, तो मैं कहूँगा कि वह प्रदर्शन मात्र है, मेला है। सरकार को चाहिए कि विज्ञान संचार से संलग्न संस्थाओं का ठीक से वित्तपोषण करें और उनसे परामर्श ले। 

कृपया आपने सुदीर्घ अनुभव से हमें बतायें कि वे कौन से कारण हैं जो आमजन तथा विज्ञान बुद्धिजीवियों के आपस में जुड़ने मंे बाधक बनते हैं या वे उपाय जिनके माध्यम से आमजन से सीधे जुड़ा जा सके। 
आमजन तथा विज्ञान बुद्धिजीवियों को परस्पर पास लाने के लिए आवश्यक है कि वे एक दूसरे की भाषा समझें। मेरी दृष्टि में बुद्धिजीवियों को अब हिन्दी में अपना सारा कार्य करके आमजन को लाभान्वित होने देना चाहिए। वे अंग्रेजी का मोह त्याग दें, हिन्दी राष्ट्रभाषा है। अन्य किसी राष्ट्र में विदेशी भाषा को उतनी मान्यता नहीं दी जाती जितनी कि हमारे देश में। राष्ट्रीय भावना के लिए हिन्दी प्रेम आवश्यक है। 

विकसित देश हमसे विज्ञान तथा तकनीकी अनुसंधानों में कोसों आगे हैं। इन क्षेत्रों में हम स्वयं को बेहतर कैसे बना सकते हैं ताकि हम भी इन देशों के समकक्ष आ सकें।
विकसित देश हमसे विज्ञान तथा तकनीकी अनुसन्धान में इसलिए आगे हैं कि हमारी प्रतिभाएं विदेशों में जा बसी हैं और उन्होंने ही उन्हें विकसित किया है। यदि विदेश-गमन बन्द हों और विदेशों के प्रवासी भारतीय वैज्ञानिक देश में आ सकें तो हम भी विज्ञान तथा तकनीकी अनुसंधान में उनसे आगे बढ़ जावें। अभी भी हम कोई कम नहीं हैं। 

हमारे देश में जब उदारीकरण की शुरूआत हुई तो नये-नये क्षेत्रों में आकर्षक कॅरियर सामने आये जिनमें भारतीय छात्रों ने ज्यादा रूचि ली। आज स्थिति यह है कि छात्रों की विज्ञान मंे अधिक रूचि नहीं रह गई है और जो कुछ इस क्षेत्र में सक्रिय हैं उनमें इतनी गुणवत्ता नहीं है। आपके दृष्टिकोण से ऐसे क्या प्रयास किये जा सकते हैं कि छात्रों की रुचि विज्ञान में पुनः जागे, उनके अंदर की नवोन्मेषी प्रवृत्ति का विकास हो सके और वे इसे कॅरियर के रूप में अपनायें।  
छात्रों में विज्ञान के प्रति रुचि तभी उत्पन्न हो सकेगी जब अच्छे अध्यापक अध्यापन करेंगे, विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में आधुनिक उपकरणों से लैस प्रयोगशालाएं होंगी और छात्रों को नवाचारों के लिए प्रोत्साहित किया जावेगा। 

आप पिछले पांच दशकों से जन-जन में विज्ञान चेतना का प्रसार कार्य कर रहे हैं। इस लंबी यात्रा को आप कितना सार्थक मानते हैं।
मैं नहीं, आप मेरी सार्थकता निश्चित करें। वैसे तो मैंने यथाशक्ति भरसक प्रयास किया है और जिस संस्था से विगत अर्द्धशताब्दी से जुड़ा रहा, वह शताब्दी वर्ष मना कर अपनी सार्थकता सिद्ध कर रही है। 

अंत में, विज्ञान संचारकों, विज्ञान प्रेमियों हेतु आप कोई संदेश देना चाहेंगे। 
विज्ञान संचारकों एवं विज्ञानप्रेमियों से मेरा इतना ही कहना है कि वे जो भी कार्य करें, पूरे मनोयोग से करें, औरों को साथ लेकर चलें। विजयश्री उनके स्वागत हेतु खड़ी मिलेगी। 


विज्ञान परिषद प्रयाग
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