विज्ञान


महान वैज्ञानिक, व्यक्तित्व और चिन्तक

कालीशंकर

कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपने महाकाव्य रष्मिरथी में एक जगह लिखा है,

‘तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग में प्रषस्ति अपने करतब दिखला के,
मूल हीन की ओर देखकर गलत कहें या ठीक, 
वीर खींचकर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।’ 
ये पंक्तियाँ हमारे दिवंगत महामहिम पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम पर पूरी तरह से चरितार्थ होती हैं। 27 जुलाई, 2015 को आई.आई.एम. षिलांग में ‘दी लिवेबुल प्लैनेट अर्थ (आवासीय ग्रह पृथ्वी)’ पर व्याख्यान देते समय षाम को 6ः30 बजे कलाम साहब को दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया को अलविदा कह कर चले गये। उनके निधन से सारा देष षोक में डूब गया। उन्हें पास के बेथैनी अस्पताल में तुरंत ले जाया गया तथा वहांॅ उन्हें सघन केयर इकाई (इन्टेंसिव केयर यूनिट) में भर्ती किया गया। षाम 7ः45 बजे उन्हें मृत घोषित किया गया। यह भारत और दुनिया के लिए एक दुखद क्षण था।
अपने स्कूल के दिनों में वे औसत दर्जे के विद्यार्थी माने जाते थे लेकिन उन्हें एक प्रतिभाषाली और मेहनती विद्यार्थी माना जाता था जिसे सीखने और अध्ययन करने की बड़ी तीव्र लालसा थी- विषेषकर गणित के विषय में। रामनाथपुरम के हाईस्कूल से अपनी षिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने त्रिचुरापल्ली के सेन्ट जोसेफ कालेज से 1954 में भौतिकी में ग्रेजुएषन किया। इस कोर्स की समाप्ति पर वे इसके प्रति ज्यादा उत्साहित नहीं थे। 1955 में उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में एरोस्पेस इंजीनियरिंग कोर्स के लिए दाखिला लिया। वहाँ जिस समय डॉ. कलाम एक सीनियर स्तर प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, वहाँ के डीन उनके कार्य की प्रगति से संतुष्ट नहीं थे और डॉ. कलाम को उनकी छात्रवृत्ति बन्द करने की धमकी दी। डीन ने कहा कि प्रोजेक्ट 3 दिन में समाप्त हो जाना चाहिए। डॉ. कलाम ने समय सीमा के अन्दर काम पूरा कर दिया तथा डीन उनसे बहुत प्रभावित हुए। डीन ने बाद में उनसे कहा, ‘मैं तुम्हें तनाव के अन्दर रख रहा था जिससे तुम मुष्किल समय सीमा में काम पूरा कर सको।’ डॉ. कलाम एक फाइटर पायलट बनना चाहते थे तथा यह अवसर उनके हाथ से बहुत संकीर्ण सीमा से निकल गया। भारतीय वायु सेना में 8 पद ही उपलब्ध थे, जबकि वे नौवें स्थान पर थे।
डॉ. कलाम ने अपने जीवन के 4 दषक एक वैज्ञानिक और विज्ञान प्रषासक के रूप में डी.आर.डी.ओ. और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में बिताये तथा भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम तथा रक्षा मंत्रालय के मिसाइल विकास प्रयासों से घनिष्ठता से जुड़े रहे। इसीलिए बैलिस्टिक मिसाइल और प्रमोचन यान तकनीकी (लांॅच वेहिकल टेक्नॉलॉजी) के विकास में अभूतपूर्व सहयोग देने के कारण उन्हें ‘भारत का मिसाइल मानव’ (मिसाइल मैन आफ इण्डिया) कहा जाता है। 1998 में भारत के पोखरणप्प् परमाणु परीक्षण, जो 1974 में भारत के द्वारा किये गये प्रथम मूल परमाणु परीक्षण के बाद किया गया, में उन्होंने एक महान संस्थानिक, तकनीकी और राजनीतिक भूमिका निभाई। उन्हें अनेक महान सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है जिसमें भारत रत्न भी षामिल है।
एक महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक
1960 में मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी से ग्रेजुएषन करने के बाद डॉ. कलाम ने डी.आर.डी.ओ. के एरोनाटिकल विकास संस्था को एक वैज्ञानिक के रूप में ज्वाइन किया। उन्होंने अपने कैरियर की षुरूआत भारतीय थल सेना के लिए एक हेलीकाप्टर की डिजाइन से षुरू की लेकिन वे डी.आर.डी.ओ. में अपने कार्य से संतुष्ट नहीं थे। डॉ. कलाम विख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई के द्वारा गठित और उनके निर्देषन में काम कर रही समिति इनकास्पर (इण्डियन नेषनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च-अन्तरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति) का भी एक हिस्सा थे। इनकास्पर समिति का गठन 1962 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के आदेष से डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में किया गया था जिसका प्रमुख कार्य भारत में अन्तरिक्ष विज्ञान की आधारषिला रखना था। उस समय यह समिति टाटा इन्टीट्यूट ऑफ फन्डामेन्टल रिसर्च का एक भाग थी जिसके निदेषक प्रो. एम.जी.के. मेनन थे। इनकास्पर समिति के निर्णय पर भारत की दक्षिणी टिप थुम्बा में टर्ल्स (थुम्बा भूमध्यरेखीय राकेट प्रमोचन स्टेषन) की स्थापना की गई। डॉ. कलाम (जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने) इनकास्पर संस्था के राकेट इंजीनियरों की प्रारंभिक टीम में थे। बाद में इनकास्पर संस्था ने इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) का स्वरूप लिया। अपने इसरो दिनों की याद करते हुए एक बार डॉ. कलाम ने कहा था, ‘यह मेरी प्रथम स्टेज थी जिसमें मैंने तीन महान गुरूओं- डॉ. विक्रम साराभाई, प्रो. सतीष धवन और ब्रम्ह प्रकाष से नेतृत्व प्रदायक (लीडरषिप) की षिक्षा ली।
वर्ष 1969 में डॉ. कलाम का ट्रान्सफर इसरो में कर दिया गया जहाँ पर वे भारत के प्रथम उपग्रह प्रमोचन वेहिकल (एस.एल.वी.प्प्प्) के परियोजना निदेषक बने जिसने जुलाई 1980 में पृथ्वी समीप कक्षा में भारत के रोहिणी उपग्रह को सफलता पूर्वक प्रस्तरित (डिप्लाय) किया। 1970 और 1990 के बीच में डॉ. कलाम ने ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन वेहिकल (पी.एस.एल.वी.) और एस.एल.वी.प्प्प् पर कार्य किया तथा दोनों ही परियोजनाएँ सफल रहीं। पी.एस.एल.वी. आज इसरो का सबसे सफल और विष्वसनीय प्रमोचन यान है जिसकी हालिया उड़ान 10 जुलाई, 2015 को हुई। इसने वर्ष 2014 तक 71 उपग्रह अन्तरिक्ष में प्रमोचित किये जिनमें 31 भारतीय और 40 विदेषी उपग्रह हैं।
1965 में डॉ. कलाम ने स्वतंत्र रूप से एक्सपैन्डेबुल राकेट परियोजना पर डी.आर.डी.ओ. में काम षुरू किया तथा इसके लिए डॉ. कलाम को सरकार की स्वीकृति मिल गई तथा उन्होंने कार्यक्रम में और विस्तार किया। इसमें और भी अभियन्ताओं की नियुक्ति की गई। 1963.64 के दौरान वे अमरीकी संस्था के लैंगले अनुसंधान केन्द्र (हैम्पटन, वर्जीनिया), गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेन्टर, मेरीलैन्ड तथा वैलप्स फ्लाईट फैसिलिटी को विजिट किया। डॉ. राजा रमन्ना ने डॉ. कलाम को देष के प्रथम परमाणु परीक्षण में आमंत्रित किया (प्रतिनिधि के तौर पर) लेकिन वे इसमें भाग नहीं ले सके। डॉ. कलाम ने दो परियोजनाओं प्रोजेक्ट डेविल और प्रोजेक्ट वैलियन्ट का निर्देषन किया जिनके द्वारा सफल एस.एल.वी. कार्यक्रम से बैलिस्टिक मिसाइल तकनीकी विकसित की जा सकती थी। 1980 में सरकार ने डॉ. कलाम के निर्देषन में (जिसके वे निदेषक थे) एक उच्च कोटि के मिसाइल कार्यक्रम का प्रारंभ किया। डॉ. कलाम ने ‘अग्नि’ मिषन के अन्तर्गत अनेक मिसाइलें विकसित कीं। इसमें सतह-से-सतह मिसाइल ‘पृथ्वी’ भी षामिल थी।
जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 के बीच डॉ. कलाम प्रधान मंत्री के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार तथा डी.आर.डी.ओ. के सचिव रहे। इसी दौरान पोखरण परमाणु परीक्षण किया गया जिसमें डॉ. कलाम ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और तकनीकी भूमिका अदा की। टेस्टिंग चरण में आर चिदम्बरम के साथ डॉ. कलाम ने प्रमुख परियोजना समन्वयक की भूमिका निभाई। प्रेस मीडिया ने इस दौरान डॉ. कलाम को देष का सर्वोच्च परमाणु वैज्ञानिक बना दिया। 1988 में हृदय रोग विषेषज्ञ डॉ. सोमा राजू के साथ डॉ. कलाम ने सस्ता कोरोनरी स्टेन्ट बनाया जो हृदय रोगियों के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुआ। इसका नाम ‘कलाम-राजू स्टेन्ट’ रखा गया। वर्ष 2012 में इन दोनों लोगों ने हेल्थ केयर के लिए (ग्रामीण क्षेत्रीय लोगों हेतु) एक टैबलेट कम्प्यूटर बनाया। इसका नाम ‘कलाम-राजू टैबलेट’ रखा गया।
अपनी पुस्तक ‘इण्डिया-2020’ में डॉ. कलाम ने बहुत जोर देकर एक कार्यान्वयन योजना की पैरवी की है जिसके अन्तर्गत भारत को ‘ज्ञान के सुपर पावर’ एवं विकसित देष के रूप में बनाने की योजना है। अपने द्वारा भारत के परमाणु कार्यक्रम के कार्यों को वे इस रूप में देखते थे कि इससे भारत एक भावी सुपर पॉवर की श्रेणी में पहुँचेगा। वे कहते थे कि मैंने 5 क्षेत्रों को चुना है जिनमें भारत के पास एकीकृत कार्यों की अपूर्व क्षमता है तथा ये कार्य हैं- स कृषि एवं फूड प्रोसेसिंग, स षिक्षा एवं स्वास्थ्य की देखभाल, स सूचना और संचार तकनीकी, 
स बुनियादी सुविधाएँ, विष्वसनीयता और गुणवत्तापूर्ण विद्युत पावर देष के सभी भागों के लिए, सतही यातायात और ढांचागत सुविधायें एवं स जटिल तकनीकों के सन्दर्भ में आत्म निर्भरता। 
ये पांच चीजें आपस में एक दूसरे से बंधी हुई हैं तथा यदि समन्वित रूप में इन्हें प्रयोग किया जाए तो ये देष की सुरक्षा, आर्थिक उन्नति और भोजन के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा सकती है।


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